भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २७५

विशुक्रश्च विषंगश्च महाबलपराक्रमौ ।
त्रैलोक्यकंटकीभूतभुजदंडभयंकरौ ॥२५
अग्रजस्य सदैवार्ज्ञामविलंघ्य मुहुर्मुहुः ।
त्रैलोक्यविजये लब्धं वर्धयंतौ महद्यशः ॥२६
न तेन शिरसा तस्य मृद्नंतौ पादपीठिकाम् ।
कृतांजलिप्रणामौ च समुपाविशतां भुवि ॥२७
अथास्थाने स्थिते तस्मिन्नमरद्वेषिणां वरे ।
सर्वे सामंतदैत्येन्द्रास्तं द्रष्टुं समुपागताः ॥२८

वहाँ पर मेरु पर्वत के समान वपु वाले तथा बहुत से रत्नों से चित्रित अत्युत्तम सिंहासन पर दैत्येन्द्र संस्थित हो गया था।२२। वह दानवेश्वर स्फुरित मुकुटों में लगे हुए रत्नों की किरणों से सब दिशाओं को दीपित करता हुआ वहाँ पर समवस्थित हुआ था।२३। उस समय में उसके दो अनुजों के द्वारा वह सेवित हुआ था। वह आस्थान मण्डप महान् था तथा एक योजन के विस्तार से युक्त था। वहाँ पर एक बहुत ही ऊँचा सिंहासन था जिस पर यह दानवेन्द्र विराज मान हुआ था।२४। विशुक्र और विषंग ये दोनों इसके छोटे भाई बड़े ही अधिक बल और पराक्रम वाले थे और ये दोनों तीनों लोकों के लिये कण्डक के ही समान भुजदण्ड वाले तथा भयङ्कर थे।२५। ये दोनों ही अपने बड़े भाई की आज्ञा का कभी उल्लंघन नहीं किया करते थे और उन्होंने त्रैलोक्य के विजय करने में महान् यश प्राप्त किया था ।२६। उन्होंने अपने शिर को झुकाकर उसकी पाद पीठिका को प्रणाम किया था और अपने दोनों करों को जोड़कर ये भूमि में बैठ गये थे।२७। इसके अनन्तर जब वह सुरों का महान् शत्रु उस आस्थान मण्डप में समवस्थित हो गया था तो उसका दर्शन करने के लिए उस समय में समस्त सामन्त दैत्यों के साथ वहाँ पर समुपस्थित हो गये थे।२८।

तेषामेकैकसैन्यानां गणना न हि विद्यते ।
स्वं स्वं नाम समुच्चार्य प्रणेमुर्भण्डकेश्वरम् ॥२९
स च तानसुरान्सर्वानतिधीरकनीनकः ।
संभावयन्समालोकैः कियंतं चित्क्षणं स्थितः ॥३०