संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अवोचत विशुक्रस्तमग्रजं दानवेश्वरम् ।
मथ्यमानमहासिन्धुसमानार्गलनिस्वनः ॥३१
देव त्वदीयदोर्द्दण्डविध्वस्तबलविक्रमाः ।
पापिनः पामराचारा दुरात्मानः सुराधमाः ॥३२
शरण्यमन्यतः क्वापि नाप्नुवन्तो विषादिनः ।
ज्वलज्ज्वालाकुले वह्नौ पतित्वा नाशमागताः ॥३३
तस्माद्दे वात्समुत्पन्ना काचित्स्त्री बलगर्विता ।
स्वयमेव किलाश्नांक्षुस्तां देवा वासवादयः ॥३४
तैः पुनः प्रबलोत्साहैः प्रोत्साहितपराक्रमाः ।
बहुस्त्रीपरिवाराश्च विविधायुधमण्डिताः ॥३५
उन एक-एक की इतनी अधिक सेना थी जिसकी कोई गणना नहीं है । उनमें सबने अपने-अपने नाम का उच्चारण करके उस भण्डकेश्वर के लिये प्रणिपात किया था ।२६। उस दैत्येश्वर ने अत्यन्त धैर्ययुक्त नेत्रों से उन समस्त असुरों का समादर करते हुए कुछ क्षण तक चुप वह शान्त रहा था । फिर अग्रज दानवेश्वरों से विशुक्र बोला था - उस समय में उसका स्वर मथ्यमान सिन्धु के समान था ।३०-३१। हे देव ! आपकी भुजाओं से जिनका बल और विक्रम विध्वस्त हो गया है वे पापी, पामर आचरण वाले दुष्ट आत्मा अधम सुरगण विषाद युक्त होकर अन्य कहीं पर भी शरण को प्राप्त नहीं हुए थे । तथा जलती हुई ज्वालाओं से समाकुल वह्नि में गिर कर विनाश को प्राप्त हो गये थे ।३२-३३। उस देव से समुत्पन्न कोई स्त्री है जो अपने बल के अत्यधिक गर्व वाली है । वासव आदिक समस्त देवगण स्वयं ही उसकी शरण में गये हैं ।३४। उन्हीं के द्वारा जिन को परम प्रबल उत्साह हो रहा है उनके पराक्रम को प्रोत्साहन दिया है। उसके साथ बहुत सी स्त्रियों के परिवार भी विद्यमान हैं और वे सब अनेक प्रकार के आयुधों से भूषित हैं ।३५।
अस्माञ्जेतुं किलायांति हा कष्टं विधिवैशसम् ।
अबलानां समूहश्चेद्वलिनोऽस्मान्विजेष्यते ॥३६
तर्हि पल्लवभंगेन पाषाणस्य विदारणम् ।
ऊह्यमानमिदं हंतु परिहासाय कल्प्यते ॥३७