भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २७७

विडम्बना न किमसो लज्जाकरमिदं न किम् । अस्मत्सैनिकनासीरभटेभ्योऽपि भवेद्भयम् ॥३८॥

कातरत्वं समापन्नाः शक्राद्यास्त्रिदिवोकसः । ब्रह्मादयश्च निर्विष्णविग्रहा मद्वलीयुधैः ॥३९॥

विष्णोश्च का कथैवास्ते वित्रस्तः स महेश्वरः । अन्येषामिह का वार्ता दिक्पालास्ते पलायिताः ॥४०॥

अस्माकमिषुभिस्तीक्ष्णैरदृश्यैरंगपातिभिः । सर्वत्र विद्धवर्माणो दुर्मदा विबुधाः कृताः ॥४१॥

तादृशानामपि महापराक्रमभुजोषमणाम् । अस्माकं विजयायाद्य स्त्री काचिदभिधावति ॥४२॥

वे सब हम लोगों पर विजय प्राप्त करने के लिये आ रही हैं। हां ! बड़े ही कष्ट का विषय है । यह क्या विधाता का चेष्टित है । यदि यह अब-लाओं की समुदाय हमको जीत लेगा । वृक्ष तो फिर पत्तों के अंग से पाषाण का ही विदारण हो जायगा । जब इस हेतु पर विचार किया जाता है तो परिहास सा ही होता है।३७। क्या यह विडम्बना मात्र नहीं है और क्या यह लज्जा उत्पन्न करने वाली बात नहीं है ? जो हमारे सैनिकों की सेना से भी भय को प्राप्त होते हैं । ३८ । वे शक्र आदि देवगण कातरता को प्राप्त हुए हैं। हमारी सेना की आयुध शक्ति से ब्रह्मादिक भी निर्विष्ण विग्रह वाले होते हैं ।३९। विष्णु के विषय में तो कहा ही क्या जावे साक्षात् महेश्वर भी भयभीत है । अन्यों की तो बात ही क्या है सब दिक्पाल भी भाग गये हैं। ४०। हमारे परमाधिक तीक्ष्ण बाणों से जो अदृश्य हैं और अंग में गिरने वाले हैं सभी जगह वर्मों को भेदने वाले हैं ऐसे सब देवों को दुर्मद कर दिया है ।४१। हम ऐसे हैं जिनके भुजाँ में महापराक्रम की ऊष्मा है उनके ऊपर विजय प्राप्त करने के लिए इस समय में कोई स्त्री अभिधावन कर रही हैं॥४२॥

यद्यपि स्त्री तथाप्येषा नावमान्या कदाचन । अल्पोऽपि रिपुरात्मज्ञैर्नावमान्यो जिगीषुभिः ॥४३॥

तस्मात्तदुत्सारणार्थं क्षेपीयास्तु किङ्कराः । सकचग्रहमाकृष्य सानैतव्या मदोद्धता ॥४४॥