भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

देव त्वदीय शुद्धान्तर्वर्तिनीनां मृगीदृशाम् । चिरेण चेटिकाभावं सा दुष्टा संश्रयिष्यति ॥४५

एकैकस्माद्भटादस्मात्सैन्येषु परिपंथिनः । शङ्कते खलु वित्रस्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥४६

अन्यद्देवस्य चित्तं तु प्रमाणमिति दानव । निवेद्य भण्डदैत्यस्य क्रोधं तस्य व्यवीवृधत् ॥४७

विषङ्गस्तु महासत्त्वो विचारज्ञो विचक्षणः । इदमाह महादैत्यमग्रजन्मानमुद्धतम् ॥४७

देव त्वमेव जानासि सर्वं कार्यमरिन्दम । न तु ते क्वापि वक्तव्यं नीतिवर्त्मनि वर्तते ॥४६

यद्यपि वह स्त्री है तो भी उसका अपमान कभी भी नहीं करना चाहिए। जो आत्मज्ञानी हैं उनके द्वारा छोटा भी शत्रु जीतने की इच्छा वालों के द्वारा कभी भी अपमानित नहीं होना चाहिए ।४३। इसलिए उसके उत्सारण के वास्ते किङ्कर अवश्य ही भेज देने चाहिए कि वे उस मद से उद्धता स्त्री के शिर के केशों को पकड़ कर उसे यहाँ ले आवें ।४४। हे देव ! आपके यहाँ अन्दर अवरोध में रहने वाली जो हरिण के समान नेत्रों वाली सुन्दरियाँ हैं उनकी दासी बनकर बहुत समय तक वह दुष्टा स्त्री उनकी सेवा किया करेगी ।४५। हमारे एक-एक योद्धा से ही परिपन्थी की सेनाओं में त्रैलोक्य विशेष रूप से त्रस्त होकर सम्पूर्ण चराचर शङ्कित होता है ।४६। हे दानव ! अन्य तो आपका चित्त ही प्रमाण है। ऐसा निवेदन करके उस भंडासुर का क्रोध और अधिक बढ़ा दिया था ।४७। महान् सत्व वाला जो विषंग वह विचक्षण और विचारों का ज्ञाता था। वह अपने बड़े भाई से यह बोला था जो कि उद्धत दैत्य था ।४८। हे देव ! आप तो स्वयं शत्रुओं के दमन करने वाले हैं आप स्वयं ही सब कार्य को जानते हैं। आपको किसी को भी कुछ भी नहीं बताना चाहिए क्योंकि आप नीति के मार्ग में रहा करते हैं ।४६।

सर्वं विचार्य कर्तव्यं विचारः परमा गतिः । अविचारेण चेत्कर्म समूलमवकृन्तति ॥५०