संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभण्डासुर अहंकार वर्णन ] [ २७६
परस्य कटके चाराः प्रेषणीयाः प्रयत्नतः ।
तेषां बलाबलं ज्ञेयं जयसंसिद्धिमिच्छता ॥५१
चारचक्षुर्दृढप्रज्ञः सदाशंकितमानसः ।
अशंकिताकारवांश्च गुप्तमन्त्रः स्वमंत्रिषु ॥५२
षडुपायान्प्रयुञ्जानः सर्वत्राभ्यर्हिते पदे ।
विजयं लभते राजा जाल्मो मक्षु विनश्यति ॥५३
अविमृश्यैव यः कश्चिदारम्भः स विनाशकृत् ।
विमृश्य तु कृतं कर्म विशेषज्जयदायकम् ॥५४
तिर्यगित्यपि नारीति क्षुद्रा चेत्यपि राजभिः ।
नावज्ञा वैरिणां कार्या शक्तेः सर्वत्र सम्भवः ॥५५
स्तंभोत्पन्नेन केनापि नरतिर्यग्वपुर्भृता ।
भूतेन सर्वभूतानां हिरण्यकशिपुर्हतः ॥५६
जो कुछ भी करता है वह सब विचार करके ही करना चाहिए क्यों-कि भली भाँति विचार का करना ही परम गति है । बिना भली भाँति से विचार के जो भी कुछ किया जाता है वह मूल के सहित ही सम्पूर्ण विनष्ट हो जाया करता है ।५०। शत्रु के कटक में दूत प्रयत्न पूर्वक भेजने चाहिए । अपनी विजय की सिद्धि की इच्छा रखने वाले को चाहिए कि शत्रु के बल और अबल का पहिले ज्ञान प्राप्त कर लेवे ।५१। जो दूतों के द्वारा ही देखने वाला है—जिसकी प्रतिज्ञा सुदृढ़ है—जो सदा ही शङ्कित मन वाला है—जो अशङ्कित आकार वाला है—जो अपने मन्त्रियों में गुप्त मन्त्रणा वाला होता है । ये छे उपाय हैं इनका प्रयोग करने वाला जो सदा अभ्यर्हित पद पर स्थित रहता है वही राजा विजय का लाभ प्राप्त किया करता है । जो जाल्म होता है उसका शीघ्र विनाश हो जाया करता है ।५२-५३। कोई भी कार्य का आरम्भ बिना आगा-पीछा सोचे ही कर दिया जाया करता है वह विनाश करने वाला ही हुआ करता है । जिसका भली भाँति विचार करके पीछे जो कर्म किया गया है वह विशेष रूप से जय देने वाला ही हुआ करता है ।५४। यह तिर्यग् है—यह नारी है अथवा यह क्षुद्रा है—इन बातों से भी राजाओं को कभी भी बैरियों की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए क्योंकि शक्ति तो ऐसी विलक्षण है कि वह सभी जगह हो सकती है । देखिये, ऐतिहासिक