संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अवोचत विशुक्रस्तमग्रजं दानवेश्वरम् ।
मथ्यमानमहासिन्धुसमानार्गलनिस्वनः ॥३१
देव त्वदीयदोर्द्दण्डविध्वस्तबलविक्रमाः ।
पापिनः पामराचारा दुरात्मानः सुराधमाः ॥३२
शरण्यमन्यतः क्वापि नाप्नुवन्तो विषादिनः ।
ज्वलज्ज्वालाकुले वह्नौ पतित्वा नाशमागताः ॥३३
तस्माद्दे वात्समुत्पन्ना काचित्स्त्री बलगर्विता ।
स्वयमेव किलाश्नांक्षुस्तां देवा वासवादयः ॥३४
तैः पुनः प्रबलोत्साहैः प्रोत्साहितपराक्रमाः ।
बहुस्त्रीपरिवाराश्च विविधायुधमण्डिताः ॥३५
उन एक-एक की इतनी अधिक सेना थी जिसकी कोई गणना नहीं है । उनमें सबने अपने-अपने नाम का उच्चारण करके उस भण्डकेश्वर के लिये प्रणिपात किया था ।२६। उस दैत्येश्वर ने अत्यन्त धैर्ययुक्त नेत्रों से उन समस्त असुरों का समादर करते हुए कुछ क्षण तक चुप वह शान्त रहा था । फिर अग्रज दानवेश्वरों से विशुक्र बोला था - उस समय में उसका स्वर मथ्यमान सिन्धु के समान था ।३०-३१। हे देव ! आपकी भुजाओं से जिनका बल और विक्रम विध्वस्त हो गया है वे पापी, पामर आचरण वाले दुष्ट आत्मा अधम सुरगण विषाद युक्त होकर अन्य कहीं पर भी शरण को प्राप्त नहीं हुए थे । तथा जलती हुई ज्वालाओं से समाकुल वह्नि में गिर कर विनाश को प्राप्त हो गये थे ।३२-३३। उस देव से समुत्पन्न कोई स्त्री है जो अपने बल के अत्यधिक गर्व वाली है । वासव आदिक समस्त देवगण स्वयं ही उसकी शरण में गये हैं ।३४। उन्हीं के द्वारा जिन को परम प्रबल उत्साह हो रहा है उनके पराक्रम को प्रोत्साहन दिया है। उसके साथ बहुत सी स्त्रियों के परिवार भी विद्यमान हैं और वे सब अनेक प्रकार के आयुधों से भूषित हैं ।३५।
अस्माञ्जेतुं किलायांति हा कष्टं विधिवैशसम् ।
अबलानां समूहश्चेद्वलिनोऽस्मान्विजेष्यते ॥३६
तर्हि पल्लवभंगेन पाषाणस्य विदारणम् ।
ऊह्यमानमिदं हंतु परिहासाय कल्प्यते ॥३७
भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २७७
विडम्बना न किमसो लज्जाकरमिदं न किम् । अस्मत्सैनिकनासीरभटेभ्योऽपि भवेद्भयम् ॥३८॥
कातरत्वं समापन्नाः शक्राद्यास्त्रिदिवोकसः । ब्रह्मादयश्च निर्विष्णविग्रहा मद्वलीयुधैः ॥३९॥
विष्णोश्च का कथैवास्ते वित्रस्तः स महेश्वरः । अन्येषामिह का वार्ता दिक्पालास्ते पलायिताः ॥४०॥
अस्माकमिषुभिस्तीक्ष्णैरदृश्यैरंगपातिभिः । सर्वत्र विद्धवर्माणो दुर्मदा विबुधाः कृताः ॥४१॥
तादृशानामपि महापराक्रमभुजोषमणाम् । अस्माकं विजयायाद्य स्त्री काचिदभिधावति ॥४२॥
वे सब हम लोगों पर विजय प्राप्त करने के लिये आ रही हैं। हां ! बड़े ही कष्ट का विषय है । यह क्या विधाता का चेष्टित है । यदि यह अब-लाओं की समुदाय हमको जीत लेगा । वृक्ष तो फिर पत्तों के अंग से पाषाण का ही विदारण हो जायगा । जब इस हेतु पर विचार किया जाता है तो परिहास सा ही होता है।३७। क्या यह विडम्बना मात्र नहीं है और क्या यह लज्जा उत्पन्न करने वाली बात नहीं है ? जो हमारे सैनिकों की सेना से भी भय को प्राप्त होते हैं । ३८ । वे शक्र आदि देवगण कातरता को प्राप्त हुए हैं। हमारी सेना की आयुध शक्ति से ब्रह्मादिक भी निर्विष्ण विग्रह वाले होते हैं ।३९। विष्णु के विषय में तो कहा ही क्या जावे साक्षात् महेश्वर भी भयभीत है । अन्यों की तो बात ही क्या है सब दिक्पाल भी भाग गये हैं। ४०। हमारे परमाधिक तीक्ष्ण बाणों से जो अदृश्य हैं और अंग में गिरने वाले हैं सभी जगह वर्मों को भेदने वाले हैं ऐसे सब देवों को दुर्मद कर दिया है ।४१। हम ऐसे हैं जिनके भुजाँ में महापराक्रम की ऊष्मा है उनके ऊपर विजय प्राप्त करने के लिए इस समय में कोई स्त्री अभिधावन कर रही हैं॥४२॥
यद्यपि स्त्री तथाप्येषा नावमान्या कदाचन । अल्पोऽपि रिपुरात्मज्ञैर्नावमान्यो जिगीषुभिः ॥४३॥
तस्मात्तदुत्सारणार्थं क्षेपीयास्तु किङ्कराः । सकचग्रहमाकृष्य सानैतव्या मदोद्धता ॥४४॥
२७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
देव त्वदीय शुद्धान्तर्वर्तिनीनां मृगीदृशाम् । चिरेण चेटिकाभावं सा दुष्टा संश्रयिष्यति ॥४५
एकैकस्माद्भटादस्मात्सैन्येषु परिपंथिनः । शङ्कते खलु वित्रस्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥४६
अन्यद्देवस्य चित्तं तु प्रमाणमिति दानव । निवेद्य भण्डदैत्यस्य क्रोधं तस्य व्यवीवृधत् ॥४७
विषङ्गस्तु महासत्त्वो विचारज्ञो विचक्षणः । इदमाह महादैत्यमग्रजन्मानमुद्धतम् ॥४७
देव त्वमेव जानासि सर्वं कार्यमरिन्दम । न तु ते क्वापि वक्तव्यं नीतिवर्त्मनि वर्तते ॥४६
यद्यपि वह स्त्री है तो भी उसका अपमान कभी भी नहीं करना चाहिए। जो आत्मज्ञानी हैं उनके द्वारा छोटा भी शत्रु जीतने की इच्छा वालों के द्वारा कभी भी अपमानित नहीं होना चाहिए ।४३। इसलिए उसके उत्सारण के वास्ते किङ्कर अवश्य ही भेज देने चाहिए कि वे उस मद से उद्धता स्त्री के शिर के केशों को पकड़ कर उसे यहाँ ले आवें ।४४। हे देव ! आपके यहाँ अन्दर अवरोध में रहने वाली जो हरिण के समान नेत्रों वाली सुन्दरियाँ हैं उनकी दासी बनकर बहुत समय तक वह दुष्टा स्त्री उनकी सेवा किया करेगी ।४५। हमारे एक-एक योद्धा से ही परिपन्थी की सेनाओं में त्रैलोक्य विशेष रूप से त्रस्त होकर सम्पूर्ण चराचर शङ्कित होता है ।४६। हे दानव ! अन्य तो आपका चित्त ही प्रमाण है। ऐसा निवेदन करके उस भंडासुर का क्रोध और अधिक बढ़ा दिया था ।४७। महान् सत्व वाला जो विषंग वह विचक्षण और विचारों का ज्ञाता था। वह अपने बड़े भाई से यह बोला था जो कि उद्धत दैत्य था ।४८। हे देव ! आप तो स्वयं शत्रुओं के दमन करने वाले हैं आप स्वयं ही सब कार्य को जानते हैं। आपको किसी को भी कुछ भी नहीं बताना चाहिए क्योंकि आप नीति के मार्ग में रहा करते हैं ।४६।
सर्वं विचार्य कर्तव्यं विचारः परमा गतिः । अविचारेण चेत्कर्म समूलमवकृन्तति ॥५०
भण्डासुर अहंकार वर्णन ] [ २७६
परस्य कटके चाराः प्रेषणीयाः प्रयत्नतः ।
तेषां बलाबलं ज्ञेयं जयसंसिद्धिमिच्छता ॥५१
चारचक्षुर्दृढप्रज्ञः सदाशंकितमानसः ।
अशंकिताकारवांश्च गुप्तमन्त्रः स्वमंत्रिषु ॥५२
षडुपायान्प्रयुञ्जानः सर्वत्राभ्यर्हिते पदे ।
विजयं लभते राजा जाल्मो मक्षु विनश्यति ॥५३
अविमृश्यैव यः कश्चिदारम्भः स विनाशकृत् ।
विमृश्य तु कृतं कर्म विशेषज्जयदायकम् ॥५४
तिर्यगित्यपि नारीति क्षुद्रा चेत्यपि राजभिः ।
नावज्ञा वैरिणां कार्या शक्तेः सर्वत्र सम्भवः ॥५५
स्तंभोत्पन्नेन केनापि नरतिर्यग्वपुर्भृता ।
भूतेन सर्वभूतानां हिरण्यकशिपुर्हतः ॥५६
जो कुछ भी करता है वह सब विचार करके ही करना चाहिए क्यों-कि भली भाँति विचार का करना ही परम गति है । बिना भली भाँति से विचार के जो भी कुछ किया जाता है वह मूल के सहित ही सम्पूर्ण विनष्ट हो जाया करता है ।५०। शत्रु के कटक में दूत प्रयत्न पूर्वक भेजने चाहिए । अपनी विजय की सिद्धि की इच्छा रखने वाले को चाहिए कि शत्रु के बल और अबल का पहिले ज्ञान प्राप्त कर लेवे ।५१। जो दूतों के द्वारा ही देखने वाला है—जिसकी प्रतिज्ञा सुदृढ़ है—जो सदा ही शङ्कित मन वाला है—जो अशङ्कित आकार वाला है—जो अपने मन्त्रियों में गुप्त मन्त्रणा वाला होता है । ये छे उपाय हैं इनका प्रयोग करने वाला जो सदा अभ्यर्हित पद पर स्थित रहता है वही राजा विजय का लाभ प्राप्त किया करता है । जो जाल्म होता है उसका शीघ्र विनाश हो जाया करता है ।५२-५३। कोई भी कार्य का आरम्भ बिना आगा-पीछा सोचे ही कर दिया जाया करता है वह विनाश करने वाला ही हुआ करता है । जिसका भली भाँति विचार करके पीछे जो कर्म किया गया है वह विशेष रूप से जय देने वाला ही हुआ करता है ।५४। यह तिर्यग् है—यह नारी है अथवा यह क्षुद्रा है—इन बातों से भी राजाओं को कभी भी बैरियों की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए क्योंकि शक्ति तो ऐसी विलक्षण है कि वह सभी जगह हो सकती है । देखिये, ऐतिहासिक
२८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
घटना विद्यमान है—खम्भे से समुत्पन्न नर और तिर्यंग् (पशु) का वपु धारण करने वाले समस्त प्राणियों का भूत नरसिंह ने हिरण्यकशिपु जैसे महान् बलवान् को मार डाला था ॥५५-५६॥
पुरा हि चंडिका नाम नारी मायाविजृंभिणी । निशुम्भशुंभौ महिषं व्यापादितवती रणे ॥५७ तत्प्रसंगेन बहवस्तया दैत्या विनाशिताः । अतो वदामि नावज्ञा स्त्रीमात्रं क्रियतां क्वचित् ॥५८ शक्तिरेव हि सर्वत्र कारणं विजयश्रियः । शक्तेराधारतां प्राप्तैः स्त्रीपुंलिङ्गैर्न नो भयम् ॥५९ शक्तिस्तु सर्वतो भाति संसारस्य स्वभावतः । तर्हि तस्या दुराशायाः प्रवृत्तिर्ज्ञायतां त्वया ॥६० केयं कस्मात्समुत्पन्ना किमाचारा किमाश्रया । कियद्बला किसहाया वा देव तत्प्रविचार्य्यताम् ॥६१ इत्युक्तः स विषङ्गेण को विचारो महौजसाम् । अस्मद्बले महासत्त्वा अक्षौहिण्यधिपाः शतम् ॥६२ पातुं क्षमास्ते जलधीनलं दग्धुं त्रिविष्टपम् । अरे पापसमाचार किं वृथा शङ्कसे स्त्रियः ॥६३
प्राचीन समय में भी चण्डिका नाम वाली एक नारी ही तो थी जिसने रण में निशुम्भ-शुम्भ और महिष को मार डाला था ॥५७॥ उसी के प्रसंग से उसने बहुत से दैत्यों का विनाश कर दिया था । इसी कारण से मैं यही बतलाता हूँ कि यह समझ करके केवल स्त्री ही तो है, कभी भी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए ॥५८॥ शक्ति ही सर्वत्र विजय की श्री का कारण हुआ करती है । शक्ति के आधार को प्राप्त हैं उन स्त्री और पुरुषों से हम को भय नहीं है ॥५९॥ इस संसार की स्वभाव से ही शक्ति ही सर्व ओर विभात हुआ करती है । सो उस बुरे आशय वाली की क्या प्रवृत्ति है—आप को समझ लेना चाहिए ॥६०॥ हे देव ! आपको इन सभी बातों का विचार कर लेना चाहिए कि यह कौन है—किससे यह समुत्पन्न हुई है—इसके आचार क्या हैं— इसका आश्रय क्या है—इसका बल कैसा और कितना है—इसकी सहायता
भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८१
करने वाले कौन-कौन हैं ।६६। उस विषंग छोटे भाई के द्वारा जब इस रीति से भंडासुर से कहा गया था तो उसने कहा था कि जो महान् ओज वाले हैं उनके लिए विचार का करने की क्या आवश्यकता है । हमारी सेना में महान् सत्वधारी हैं और सैकड़ों तो अक्षौहिणी सेना के अधिप हैं । वे इतने समर्थ हैं कि जलधि के जल का भी पान कर सकते हैं और स्वर्ग को भी दग्ध कर सकते हैं । अरे ! पापसमाचार ! व्यर्थ ही स्त्रियों के विषय में तू क्या ऐसी शङ्का कर रहा है ।६२-६३।
तत्सर्वं हि मया पूर्वं चारद्वारावलोकितम् ।
अग्रे समुदिता काचिल्ललितानामधारिणी ॥६४
यथार्थनामवत्येषा पुष्पवत्पेशलाकृतिः ।
न सत्त्वं न च वीर्यं वा न संग्रामेषु वा गतिः ॥६५
सा चाविचारनिवहा किंतु मायापरायणा ।
तत्सत्त्वेनाविद्यमानं स्त्रीकदम्बकमात्मनः ॥६६
उत्पादितवती किं ते न चैवं तु विचेष्टते ।
अथ वा भवदुक्तेन न्यायेनास्तु महद्बलम् ॥६७
त्रैलोक्यल्लंघिमहिमा भण्डः केन विजीयते ॥६८
इदानीमपि मद्बाहुबलसंमर्द मूर्च्छिताः ।
श्वसितुं चापि पटवो न कदाचन नाकिनः ॥६६
केचित्पातालगर्भेपु केचिदम्बुधिवारिषु ।
केचिद्दिगंतकोणेषु केचित्कुञ्जेषु भूभृताम् ॥७०
यह सब तो मैंने पहिले ही दूतों के द्वारा देख लिया है । इसके आगे कोई ललिता नाम वाली स्त्री समुदित हुई है ।६४। यह यथार्थ नाम वाली है अर्थात् जो भी इसके नाम का अर्थ होता है वैसी ही है । पुष्प के समान तो इसका परम कोमल शरीर है । न तो उसमें कोई सत्व है और न वीर्य-पराक्रम ही । संग्रामों में ऐसी स्त्री की क्या गति हो सकती है ।६५। और वह तो अविचारों का समुदाय ही है किन्तु माया फैलाने में अवश्य ही वह परायणा है । उसके सत्त्व से ही उसका अपना स्त्रियों का समुदाय अविद्य-मान है ।६६। उनसे उसने क्या उत्पादन किया है और न इस प्रकार से
२८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विशेष चेष्टा ही करती है । अथवा आपके द्वारा कथित न्याय से महान् भी उसका बल होवे तो रहे ।६७। तीनों लोकों के द्वारा जिसकी महिमा का उल्लंघन नहीं होता है ऐसा यह भण्डासुर किसके द्वारा जीता जा सकता है अर्थात् इसको कोई भी पराजित नहीं कर सकता है ।६८। इस समय में भी देवगण मेरे बाहुबल के संमर्दन से मूच्छित किसी समय में भी श्वास लेने में भी समर्थ नहीं हैं ।६६। उनमें से कुछ तो पाताल के गर्भो में जा छिपे हैं और कुछ समुद्र के जलों में छिपे हुए हैं । कुछ दिशाओं के अन्त में कोणों में छिप रहे हैं तथा कुछ कुञ्जों में जाकर छिपाये हैं जो कि पर्वतों में है ।७०।
विलीना भृशवित्रस्तास्त्यक्तदारसुतश्रियः । भ्रष्टाधिकाराः पशवश्छन्नवेषाश्चरंति ते ॥७१
एतादृशं न जानाति मम बाहुपराक्रमम् । अबला न चिरोत्पन्ना तेनैषा दर्पमश्नुते ॥७२
न जानन्ति स्त्रियो मूढा वृथा कल्पितसाहसाः । विनाशमनुधावन्ति कार्याकार्यविमोहिताः ॥७३
अथ वा तां पुरस्कृत्य यद्यागच्छन्ति नाकिनः । यथा महोरगाः सिद्धाः साध्या वा युद्धदुर्मदाः ॥७४
ब्रह्मा वा पद्मनाभो वा रुद्रो वापि सुराधिपः । अन्ये वा हारितां नाथास्तान्संपेष्टु महं पटुः ॥७५
अथ वा मम सेनासु सेनान्यो रणदुर्मदाः । पक्वकर्करिकापेषमवपेक्ष्यंति वैरिणः ॥७६
कुटिलाक्षः कुरंडश्च करंकः कालवाशितः । वज्रदंतो वज्रमुखो वज्रलोमा बलाहकः ॥७७
ये सभी अपने दारा-पुत्र और श्री का त्याग करके अत्यधिक डरे हुए विलीन हो रहे हैं जिनके सब अधिकार भ्रष्ट हो गये हैं । एक पशु के समान ही अपना वेष छिपाये सब इधर-उधर विचरण कर रहे हैं ।७१। इस प्रकार के मेरा जो बाहुओं का पराक्रम है उसको वह नहीं जानती है कारण यही है कि एक तो वह स्त्री है दूसरे अभी-अभी उत्पन्न हुई है । इसी से वह इतना दर्प करती है ।७२। स्त्रियां तो स्वभाव से ही मूढ़ हुआ करती हैं ।
भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८३
इनका तो जो भी कुछ साहस होता है वह वृथा ही कल्पित हुआ करता है । ये कार्य और अकार्य में मोहित ही हुआ करती हैं तथा ये विनाश की ओर अनुधावन किया करती हैं ।७३। अथवा ऐसा भी हो कि उस स्त्री को आगे करके ये देवगण यदि पीछे से आते हैं तो कोई भी क्यों न होवें—चाहे वे महोरग हों—साध्य हों या दुर्मंद सिद्ध भी होंवें । ब्रह्मा तथा पद्मनाभ और रुद्र भी क्यों न हों । या सुराधिप इन्द्र भी होवे और दिक्पाल होवें उन सबको पीस देने में मैं एक ही परम समर्थ हूँ । मुझे इन सबका कुछ भी भय नहीं है ।७५। अथवा मेरी सेनाओं में जो भी सेनानी हैं वे बड़े रण दुर्मंद हैं । वे तो बैरियों को पक्वकर्करिका के समान पीस देने की अवेक्षा ही कर रहे हैं ।७६। उन सेनानियों के कुछ प्रथित नाम मैं बतलाता हूँ—कुटिलाक्ष—कुरण्ड—कटंक—कालवाशित—वज्रदन्द—वज्रमुख—वज्रलोमा—बलाहक हैं ।७७।
सूचीमुखः फलमुखो विकटो विकटाननः ।
करालाक्षः कर्कटको मदनो दीर्घजिह्वकः ॥७८
हुंबको हलमुल्लुंचः कर्कशः कल्किवाहनः ।
पुल्कसः पुण्ड्रकेतुश्च चण्डबाहुश्च कुक्कुरः ॥७९
जंबुकाक्षो जृभणश्च तीक्ष्णशृंगस्त्रिकंटक ।
चतुर्गुंप्तश्चतुर्बाहुश्चकाराक्षश्चतुः शिराः ॥८०
वज्रघोषश्चोर्ध्वकेशो महामायो महाहनुः ।
मखशत्रुर्मखारस्कन्दी सिंहघोषः शिरालकः ॥८१
अंधकः सिंधुनेत्रश्च कूपकः कूपलोचनः ।
गुहाक्षो गंडगल्लश्च चण्डधर्मो यमांतकः ॥८२
लङ्घनः पट्टसेनश्च पुरजित्पूर्वमारकः ।
स्वर्गशत्रुः स्वर्गबलो दुर्गाख्यः स्वर्गकण्टकः ॥८३
अतिमायो बृहन्माय उपमाय उलूकजित् ।
पुरुषेणो विषेणश्च कुन्तिषेणः परूषकः ॥८४
सूचीमुख—फलमुख—विकट—विकटानन—करालाक्ष--कर्कटक-मदन—दीर्घजिह्वक—हुम्बक-—हलमुल्लुंच—कर्कश—कल्कि—वाहन—पुल्कश—
२८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पुण्ड्रकेतु—चण्डबाहु—कुक्कुर—जम्बुकाक्ष—जृम्भण—तीक्ष्णशृङ्ग—त्रिक- ण्टक—चतुर्गुप्त—चतुर्बाहु—चकाराक्ष-चतुशिशरा—वज्रघोष—ऊर्ध्वकेश— महामाया—महाहन—मखशत्रु—मरखास्कन्दी—सहघोष—शिरालक— अन्धक—सिन्धु नेत्र—कूपक—कपलोचन—गुहाक्ष—गणगुह्ल-चण्डधर्म— यमान्तक—लड्डुन-—पट्टसेन—पुरजित्—पूर्वद्वारक—स्वर्गशत्रु—स्वर्गबल— दुर्गारथ—स्वगकण्टक—अतिमाय—बृहन्माय—उपमाय—उलूकजित्-पुरु- षेण—विषेण—कुन्तिषेण—परुषक ।७८-८४।
भलकश्च कशूरश्च मंगलोद्रघणस्तथा । कोल्लाटः कुजिलाश्वश्च दासेरो बभ्रुवाहनः ॥८५ दृष्टहासो दृष्टकेतुः परिक्षेप्तापकंचुकः । महामहो महादंष्ट्रो दुर्गतिः स्वर्गमेजयः ॥८६ षट्केतुः षड्वसुश्चैव षड् दन्त षट्प्रियस्तथा । दुःशठो दुर्विनीतश्च छिन्नकर्णश्च मूषकः ॥८७ अट्टहासी महाशी च महाशीर्षो मदोत्कटः । कुम्भोत्कचः कुम्भनासः कुम्भग्रीवो घटोदरः ॥८८ अश्वमेढ्रो महांडश्च कुम्भांडः पूतिनासिकः । पूतिदन्तः पूतिचक्षुः पूत्यास्यः पूतिमेहनः ॥८९ इत्येवमादयः शूरा हिरण्यकशिपोः समाः । हिरण्याक्षसमाश्चैव मम पुत्रा महाबलाः ॥९० एकैकस्य सुतास्तेषु जाताः शूराः परःशतम् । सेनान्यो मे मदोद्वृत्ता मम पुत्रंरनुद्रुताः ॥९१
भलक—कशूर—मङ्गल—द्रघण—कोल्लाट—कुजिलाश्व—दासेर— बभ्रुवाहन—दृष्टहास—दृष्टकेतु—परिक्षेप्ता—अपकञ्चुक—महामह—महा- दंष्ट्र—दुर्गति—स्वर्गमेजय—षट्केतु—षड्वसु—षड्दन्त—षट्प्रिय-दुःशट- दुर्विनीत—छिन्न कर्ण—मूषक—अट्टहासी—महाशी—महाशीर्ष-मदोत्कट- कुम्भोत्कच—कुम्भनास—कुम्भग्रीव—घटोदर—अश्वमेढ्रमहाण्ड-कुम्भाण्ड-पूति- नासिक—पूतिदन्त—पूति चक्षु-पूत्यास्य—पूतिमेहन—इत्यादिक इस प्रकार से ये शूर हिरण्यकशिपु के ही समान हैं। और मेरे महाबल वाले पुत्र
भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८५
हिरण्याक्ष के तुल्य हैं ।८५-६०। उनके एक-एक के सैकड़ों से भी अधिक पुत्र हैं बहुत ही शूर उत्पन्न हुए हैं । मेरे सेनानी मदोद्धत हैं और मेरे पुत्रों के पीछे दौड़ लगाने वाले हैं ।६१।
नाशयिष्यन्ति समरे प्रोद्धतानमराधमान् । ये केचित्कुपिता युद्धे सहस्राक्षौहिणी वराः । भस्मशेषा भवेयुस्ते हा हन्त किमुताबला ॥६२ मायाविलासाः सर्वेऽपि तस्याः समरसीमनि । महामायाविनोदाश्च कुप्युस्ते भस्मसाद्बलम् ॥६३ तद्वृथा शंकया खिन्नं मा ते भवतु मानसम् । इत्युक्त_वा भंडदैत्येन्द्रः समुत्थाय नृपासनात् ॥६४ उवाच निजसेनान्यं कुटिलाक्षं महाबलम् । उत्तिष्ठ रे बलं सर्वं संनाहय समंततः ॥६५ शून्यकस्य समंताच्च द्वारेषु बलमर्पय । दुर्गाणि संगृहाण त्वं कुरु क्षेपणिकाशतम् ॥६६ दुष्टाभिचाराः कर्तव्या मन्त्रिभिश्च पुरोहितैः । सज्जीकुरु त्वं शस्त्राणि युद्धमेतदुपस्थितम् ॥६७ सेनापतिषु ये केचिदग्रे प्रस्थापयाधुना । अनेकबलसंघातसहितं घोरदर्शनम् ॥६८
जब भी संग्राम होगा तब उसमें ये लोग प्रोद्धत और अधम अमरों का नाश कर देंगे । जो कोई भी युद्ध में कुपित होंगे परम श्रेष्ठ सहस्रों अक्षौहिणी सेनाएं हैं वे सब भस्मीभूत ही हो जांयगे । हा ! हन्त ! विचारी स्त्रियां क्या हैं अर्थात् युद्ध में ये क्या ठहर सकती हैं ।६२। उसके समर की सीमा में सभी माया के विलास वाले हैं तथा महामाया के विनोद से सम- न्वित हैं । जब वे मेरे शूर कोप करेंगे तब सम्पूर्ण बल भस्मसात् हो जायगा ।६३। सो व्यर्थ ही शंका से तुम्हारा मन खिन्न नहीं होवे । इतना यह कहकर भण्डदैत्येन्द्र नृप के आसन से उठकर खड़ा हो गया था ।६४। और महाबली कुटिलाक्ष सेनानी से बोला था । रे उठ जाओ और अपनी समस्त सेना को सब ओर से सज्जित करो ।६५। और शून्य के सब ओर द्वारों पर सेना लगा
२८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दो। तू दुर्गों को संग्रहण करो जहां पर सैकड़ों ही क्षेपणिकाएं होवें ।६६। मन्त्रियों और पुरोहितों के द्वारा दुष्ट अभिचार कर्मानुष्ठान करना चाहिए । तुम शस्त्रों को सज्ज्रित करो क्योंकि यह युद्ध अब उपस्थित हो गया है ।६७। सेनापतियों में जो कोई भी हैं उनको इसी समय हमारे सामने करो । जो अनेक बल के संघात के सहित घोर दर्शन वाले हैं ।६८।
तेन संग्रामसमये सन्निपत्य विनिर्जितम् ।
केशेष्वाकृष्य तां मूढां देवसत्त्वेन दर्पिताम् ॥६६
इत्याभाष्य चमूनाथे सहस्रत्रितयाधिपम् ।
कुटिलाक्षं महासत्त्वं स्वयं चान्तःपुरं ययौ ॥१००
अथापतन्त्याः श्रीदेव्या यात्रानिःसाणनिःस्वनाः ।
अश्रूयंत च दैत्येन्द्रैरतिकर्णज्वरावहाः ॥१०१
उसने संग्राम के समय में आगे समापतित होकर विजय प्राप्त की है। देवों के सत्त्व से बहुत ही दर्प वाली उसको महामूढ़ा को चोटी खींचकर खींच लाओ ।६६। तीन सहस्र के अधिप महान् सत्त्व वाले चमू के नाथ कुटिलाक्ष से यह कहकर वह भण्ड अन्तःपुर में चला गया था ।१००। इसके अनन्तर आक्रमण करके आती हुई श्री देवी की यात्रा के निःसाथ महान् घोर ध्वनियां दैत्येन्द्रों के द्वारा सुनायी दी थीं जो कानों को बहुत ही दुःखद हो रही थीं ।१०१।
—×—
दुर्मद कुरंड वध वर्णन
अथ श्रीललितासेना निस्साणाप्रतिनिस्वनः ।
उच्चचालासुरेन्द्राणां योद्धतो दुन्दुभिध्वनिः ॥१
तेन मर्दितदिक्केन क्षुभ्यद्गर्भपयोधिना ।
बधिरीकृतलोकेन चकम्पे जगतां त्रयी ॥२
मर्द्यन्ककुभां वृन्दं भिन्दन्भूधरकन्दराः ।
पुप्रोथे गगनाभोगे दैत्यनिःसाणनिस्वना ॥३
महानरहरिक्रुद्धहुङ्कारोद्धतिमद्धनिः ।
विरसं विररासोच्चैर्विबुधद्वेषिझल्लरी ॥४
भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८७
ततः किलकिलारावमुखरा दैत्यकोटयः । समनह्यन्त संक्रुद्धाः प्रति तां परमेश्वरीम् ॥५ कश्चिद्रत्नविचित्रेण वर्मणाच्छन्नविग्रहः । चकाशे जंगम इव प्रोत्तुङ्गो रोहणाचलः ॥६ कालरात्रिमिवोदग्रां शस्त्रकारेण गोपिताम् । अधुनीत भटः कश्चिदतिधौतां कृपाणिकाम् ॥७
इसके अनन्तर श्री ललिता देवी की सेना के निस्सरण की प्रतिध्वनि ने असुरेन्द्रों को उच्चालित कर दिया था जो कि दुन्दुभियों की अतीव उद्धत ध्वनि उस समय में हो रही थी ।१। दिशाओं के मर्दित करने वाली उससे पयोथियों का गर्भ भी क्षुब्ध हो गया था और समस्त लोक उस महान् भीषण एवं घोर ध्वनि से बहरा हो गया था। उस समय में तीनों भुवन कांप उठे थे ।२। इधर दैत्यों के निःसाण का घोष भी दिशाओं के समूह को मर्दित कर रहा था तथा पर्वतों की कन्दराओं का भेदन कर रहा था एवं नभो मण्डल में ऊपर उठ गया था ।३। महान् नरसिंह के क्रोध से निकलने वाली हुँकार के समान जो उद्धत ध्वनि थी वह देवों के शत्रुओं की झल्लरी बहुत ही अधिक विरसता उत्पन्न कर रही थी ।४। इसके उपरान्त किल-किल की ध्वनि से शब्दायमान दैत्यों की श्रेणियाँ हो रही थी । वे सभी परमेश्वरी उस देवी के प्रति बहुत ही क्रुद्ध होकर सन्नद्ध हुए थे ।५। वह बहुत ही ऊँचा रोहणाचल रत्नों से विचित्र कर्म (कवच) से ढके हुए शरीर वाला एक जङ्गम के ही समान शोभित हो रहा था ।६। कोई भट अपनी अतिधोत कृपाण को जो शस्त्रकार से गोपित थी कालरात्रि के ही समान उदग्र को हिला रहा था ।७।
उल्लासयन्कराग्रेण कुन्तपल्लवमेकतः । आरूढतुरगो वीथ्यां चारिभेदं चकार ह ॥८ केचिदारुह्यर्योधा मातंगांस्तुंगवष्मंणः । उत्पातवातसंपातप्रेरितानिव पर्वतान् ॥६ पट्टिशैर्मुद्गरैश्चैव भिदुरैर्भिन्दिपालकैः । द्रुघणैश्च भुशुण्डीभिः कुठारैर्मुद्गरैरपि ॥१०
२८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गदाभिश्च शतघ्नीभिस्त्रिशिखैर्विशिखैरपि । अर्धचक्रैर्महाचक्रै र्वक्रांगैरुरगाननैः ॥११ फणिशीर्षप्रभेदै श्च धनुर्भिः शार्ङ्गधन्विभिः । दण्डैः क्षेपणिकाशस्त्रै र्वज्रबाणैर्हृषद्वरैः ॥१२ यवमध्यैर्मुष्टिमध्यैर्बललैः खंड्लैरपि । कटारैः कोणमध्यैश्च फणिदन्तैः परः शतैः ॥१३ पाशायुधैः पाशतुण्डैः काकतुण्डैः सहस्रशः । एवमादिभिरत्युग्रैरायुधै र्जीवहारिभिः ॥१४
एक ओर अपने कर के अग्रभाग से भाला हाथ में लिये हुए अश्व पर समारूढ़ होकर वीथी में चरण करने वालों को तितर-बितर कर रहा था ।८। कुछ योधागण बहुत ही ऊंचे वपु वाले हाथियों पर समारूढ़ थे जो कि उत्पात वाली वायु के सम्पात से प्रेरित पर्वतों के ही तुल्य दिखाई दे रहे थे ।६। उस समय में बड़े-बड़े आयुधों के द्वारा प्रहार किये जा रहे थे—उनमें कतिपय आयुधों के नाम ये हैं—पट्टिश-मुद्गरभिदुर-भिण्डी पालक-द्रुहिण-भुशुण्डी—कुठार—मुसल—गदा—शतघ्नी—त्रिशिख—विशिख—अर्धचक्र-महाचक्र—वक्राङ्ग—उरगानन—फणि—शीर्ष—धनुष—दण्ड—क्षेपणिकास्त्र-वज्रवाण—दृषद्वर—यवमध्य—मुष्टिमध्य—वलल—खण्डल—कटार—कोण-मध्य—सैकड़ों से भी अधिक फणिदन्त—पाशायुध—पाशतुण्ड—सहस्रों काकतुण्ड—इस प्रकार से जीवों के विनाशक आयुधों का प्रयोग किया जा रहा था।१०-१४।
परिकल्पितहस्ताग्रा वर्मिता दैत्यकोटयः । अश्वारोहा गजारोहा गर्दभारोहिणः परे ॥१५ उष्ट्रारोहा वृकारोहा शुनकारोहिणः परे । काकादिरोहिणो गृध्रारोहाः कंकादिरोहिणः ॥१६ व्याघ्रादिरोहिणश्चान्ये परे सिंहादिरोहिणः । शरभारोहिणश्चान्ये भेरुण्डारोहिणः परे ॥१७ सूकरारोहिणो व्यालारूढाः प्रेतादिरोहिणः । एवं नानाविधैर्वाहैर्वाहिनो ललितां प्रति ॥१८
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २८६
प्रचेलुः प्रबलक्रोधसंमूर्च्छितनिजाशयाः ।
कुटिलं सैन्यभर्त्तारं दुर्मदं नाम दानवम् ।
दशाक्षौहिणिकायुक्तं प्राहिणोल्ललितां प्रति ॥१९
दिधक्षुभिरिवाशेषं विश्वं सह बलोत्कटैः ।
भटैर्युक्तः स सेनानी ललिताभिमुखे ययौ ॥२०
भिदन्पटहसंरावैश्चतुर्दश जगन्ति सः ।
अट्टहासान्वितन्वानो दुर्मदस्तन्मुखो ययौ ॥२१
परिकल्पिता हस्तों के अग्रवाली गर्वित दैत्यों की कोटियाँ हैं। कुछ अश्वों पर सवार थे—कुछ हाथियों पर आरूढ़ थे—और कुछ गर्दभों पर बैठे हुए थे ।१५। कुछ ऊँटों पर सवार—कुछ वृकों पर समारूढ़ तथा कुछ श्वानाें पर सवार थे। काक आदिकों पर भी सवार थे तथा गृध्रों पर और कंकों पर सवार कुछ हो रहे थे ।१६। कुछ व्याघ्र आदि पर सवार थे तथा कुछ सिंह आदि पर आरूढ़ थे। अन्य शरभों पर सवार थे सो कुछ भेरुण्डों पर समारूढ़ हो रहे थे ।१७। सूकरों पर कुछ दैत्य सवारी किये हुए थे एवं व्यालों पर और प्रेतों पर कुछ सवार थे। इस रीति से अनेक प्रकार के वाहनों पर बैठकर दैत्यगण ललिता देवी के प्रति आक्रमण कर रहे थे ।१८। प्रबल क्रोध से उनका अपना आशय भी मूर्च्छित हो रहा था। परम कुटिल दुर्मद नामक सेनापति को दश अक्षौहिणी सेना से संयुत करके ललितादेवी पर आक्रमण करने के लिए भेजा था ।१९। अपने अत्युत्कट बल के द्वारा सम्पूर्ण विश्व को दग्ध करने की इच्छा वाले की तरह ही भटों से युक्त वह सेनानी ललिता देवी के सामने गया था ।२०। वह अपने पटहों के महाघोषों से चौदह भुवनों का भेदन करता हुआ गया था। वह दुर्मद अट्टहास से समन्वित होकर उस देवी के समक्ष में प्राप्त हुआ था ।२१।
अथ भंडासुराज्ञप्तः कुटिलाक्षो महाबलः ।
शून्यकस्य पुरद्वारे प्राचीने समकल्पयत् ।
रक्षणार्थं दशाक्षौहिण्युपेतं तालजंघकम् ॥२२
अर्वाचीने पुरद्वारे दशाक्षौहिणिकायुतम् ।
नाम्ना तालभुजं दैत्यं रक्षणार्थमकल्पयत् ॥२३
२६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रतीचीने पुरद्वारे दशाक्षौहिणिकायुतम् । तालग्रीवं नाम दैत्यं रक्षार्थं समकल्पयत् ॥ २४ उत्तरे तु पुरद्वारं तालकेतुं महाबलम् । आदिदेश स रक्षार्थं दशाक्षौहिणिकायुतम् ॥ २५ पुरस्य सालवलये कपिशीर्षकवेश्मसु । मण्डलाकारतो वस्तुं दशाक्षौहिणीमादिशत् ॥ २६ एवं पञ्चाशता कृत्वाक्षौहिण्या पुररक्षणम् । शून्यकस्य पुरस्यैव तद्वृत्तं स्वामिनेऽवदत् ॥ २७ कुटिलाक्ष उवाच- देव त्वदाज्ञया दत्तं सैन्यं नगररक्षणे । दुर्मदः प्रेषितः पूर्वं दुष्टां तां ललितां प्रति ॥ २८
इसके पश्चात् भंडासुर की आज्ञा पाकर महान बलवान कुटिलाक्ष ने शून्यक के प्राचीन पुरद्वार पर रक्षा करने के लिए दश अक्षौहिणी सेना से समन्वित तालजंघ को कल्पित किया था ।२२। जो अर्वाचीन नगर का द्वार था उस पर दश अक्षौहिणी सेना से संयुत तालभुज नामक दैत्य को रक्षण के लिए नियुक्त किया था ।२३। पश्चिमके पुर द्वार पर भी दश अक्षौहिणियों से युक्त तालग्रीव नाम वाले दैत्य को कल्पित किया था ।२४। उत्तर मैं जो पुर द्वार था उस पर महान बली तालकेतु को रक्षा के लिए उसने आज्ञा प्रदान की थी वह भी दश अक्षौहिणी सेना से समन्वित था ।२५। नगर के साल वलय में कपि शीर्षक गृहों में मण्डल के आकार से वास करने के लिये दश अक्षौहिणी सेना को आदेश दिया था ।२६। इस रीति से पाँच सौ अक्षौ-हिणी सेना को पुर की रक्षा के लिये नियुक्त किया था । उस नगर शून्यक की सुरक्षा के पूरे प्रबन्ध का समाचार अपने स्वामी से निवेदन कर दिया था ।२७। कुटिलाक्ष ने कहा—हे स्वामिन् ! आपकी आज्ञा से नगर की सुरक्षा के लिए सेना नियुक्त करदी है और उस ललिता पर धावा करने के लिए जो कि बहुत ही दुष्टा स्त्री है पहिले ही दुर्मद को भेज दिया गया है ।२८।
अस्मत्किंकरमात्रेण सुनिराशा हि साबला । तथापि राज्ञामाचारः कर्त्तव्यं पुररक्षणम् ॥ २६
६. द्वितीय खण्ड — ललिता माहात्म्य (श्रीविद्या, भाण्डासुर-वध व उपसंहार)
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २६१
इत्युक्त-वा भंडदैत्येन्द्रं कुटिलाक्षोऽतिगर्वितः ।
स्वसैन्यं सज्जयामास सेनापतिभिरन्वितः ॥३०
दूतस्तु प्रेषितः पूर्वं कुटिलाक्षेण दानवः ।
स ध्वनन्ध्वजिनीयुक्तो ललितासैन्यमावृणोत् ॥३१
कृत्वा किलकिलारावं भटास्तत्र सहस्रशः ।
दोधूयमानैरसिभिर्निपेतुः शक्तिसैनिकैः ॥३२
ताश्च शक्तय उद्दंडाः स्फुरिटाट्टहासस्वनाः ।
देदीप्यमानशस्त्राभाः समयुध्यंत दानवैः ॥३३
शक्तीनां दानवानां च संशोभितजगत्त्रयः ।
समवर्तत संग्रामो धूलिग्रामतताम्बरः ॥३४
रथवंशेषु मूर्च्छन्त्यः करिकंठैः प्रपञ्चिताः ।
अश्वनिःश्वासविक्षिप्ता धूलयः खं प्रपेदिरे ॥३५
हमारे किङ्करों से ही वह अबला तो बहुत ही निराश होगी फिर भी आपकी आज्ञा थी और राजाओं का यह आचार भी है कि अपने नगर की सुरक्षा करनी चाहिए ।२६। भंडासुर से यह कहकर कुटिलाक्ष बहुत गर्व से युक्त हुआ था और सेनापतियों के साथ उसने अपनी सेना को सुसज्जित किया था ।३०। इसके अनन्तर कुटिलाक्ष ने एक दानव दूत को भेजा था। वह ध्वजिनी से संयुत ध्वनि करता हुआ आया था और उसने ललिता की सेना को आवृत्त कर लिया था। उसने किल-किल की ध्वनि की थी। वहाँ पर सहस्रों की संख्या में योद्धा थे और कम्पायमान असियों के द्वारा शक्ति के सैनिकों ने निपात किया था ।३१-३२। वे शक्तियाँ बहुत ही उद्दण्ड थी तथा स्फुरित अट्टहास के घोष वाली थीं। वे देदीप्यमान अस्त्रों की आभा से समन्वित थीं ओर उन्होंने दानवों के साथ भली भाँति से युद्ध किया था ।३३। उन शक्तियों का और दानवों का ऐसा अद्भुत संग्राम हुआ था जिससे ये तीनों लोक संशोभित थे तथा उस संग्राम में इतनी धूलि उड़ी थी वह नभोमण्डल तक छा गयी थी ।३४। रथों के बाँसों में छाई हुई उठकर गजों के कण्ठों तक फैल गई थी तथा अश्वों के निःश्वासों से विक्षिप्त होकर वे धूलियाँ ऊपर आकाश में पहुँच गयी थीं ।३५।
२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तमापतन्तमालोक्य दशाक्षौहिणिकावृतम् । संपत्सरस्वती क्रोधादभिदुद्राव संगरे ॥३६ सम्पत्करीसमानाभिः शक्तिभिः समधिष्ठिताः । अश्वाश्च दन्तिनो मत्ता व्यमर्दन्दानवीं चमूम् ॥३७ अन्योन्यतुमुले युद्धे जाते किलकिलारवे । धूलीषु धूयमानासु ताड्यमानासु भेरिषु ॥३८ इतस्ततः प्रववृधे रक्तसिन्धुर्महीयसी । शक्तिभिः पात्यमानानां दानवानां सहस्रशः ॥३८ ध्वजानि लुठितान्यासन्विBasicलूनानि शिलीमुखैः । विस्रस्ततत्तच्चिह्नानि समं छत्रकदम्बकैः ॥४० रक्तारुणायां युद्धोर्व्यां पतितैश्छत्रमण्डलैः । आलंभि तुलना संध्यारक्ताभ्रहिमरोचिषा ॥४१ ज्वालाकपालः कल्पाग्निरिव चारुपयोनिधौ । दैत्यसैन्यानि निवहाः शक्तीनां पर्यवारयन् ॥४२
उस दानव को अपने ऊपर चढ़कर आते हुए को देखकर जो कि दश अक्षौहिणी सेना से समावृत था सम्पत्सरस्वती देवी क्रोध से उस संग्राम में अभिद्रुत हो गयी थीं ।३६। सम्पत्करी के समान ही शक्तियों से वह समधि-ष्ठित थी । उसके अश्व ओर मदमत्त गज थे । उसने दानवों की उस सेना का विमर्दन कर दिया था ।३७। परस्पर में यह बहुत ही तुमुल युद्ध हुआ था जिसमें सभी ओर किल-किलाहट कीध्वनि होरही थी । धूलियाँ धूममान हो रही थीं और भेरियां बजायी जा रही थीं ।३८। इधर-उधर बहुत बड़ी रुधिर की नदी बह निकली थी । शक्तियों के द्वारा जो सहस्रों दानव मार-काट कर गिरा दिये थे उनके ही रुधिर की नदी बह चली थी ।३९। बाणों के द्वारा काटी गयी ध्वजाएं पड़ी हुई थी जिनमें उन-उनके छिन्न विस्रस्त हो गये थे तथा उनके ही साथ उन दानवों के छत्रों का समुदाय भी गिरा हुआ था ।४०। युद्ध की भूमि रुधिर से लाल हो गयी थी उसी में दानवों के छत्र पड़े हुए थे । उस समय में सन्ध्या कालीन चन्द्रमा की लालिमा से
दुर्मंद कुरंड वध वर्णन ] [ २६३
तुलना हो रही थी ॥४१॥ ज्वालाओं का समुदाय वाला कल्पान्त की अग्नि के ही समान चारु पयोनिधि में दैत्यों की सेनाओं को शक्तियों के समूह ने परिवारित कर दिया था ॥४२॥
शक्तिच्छन्दोज्ज्वलच्छस्त्रधारानिष्कृत्तकन्धराः ।
दानवान रणतले निपेतुर्मुण्डराशयः ॥४३
दुष्टौष्ठभ्रुकुटीक्रूरैः क्रोधसंरक्तलोचनैः ।
मुण्डैरखण्डमभवत्संग्रामधरणीतलम् ॥४४
एवं प्रवृत्ते समये जगच्चक्रभयंकरे ।
शक्तयो भृशसंक्रुद्धा दैत्यसेनासमर्दयन् ॥४५
इतस्ततः शक्तिशस्त्रैस्ताडिता मूर्च्छिता इति ।
विनेशुर्दानवास्तत्र संपद्देवीबलाहताः ॥४६
अथ भग्नं समाश्वास्य निजं बलमरिन्दमः ।
उष्ट्रमारुह्य सहसा दुर्मंदोऽभ्यद्रवच्चमूम् ॥४७
दीर्घग्रीवः समुन्नद्धः पृष्ठे निष्ठुरतोदनः ।
अधिष्ठितो दुर्मदेन वाहनोष्ट्रश्चचाल ह ॥४८
तमुष्ट्रवाहनं दृष्ट्वान्बीयुः क्रुद्धचेतसः ।
दानावनश्वसतसर्वान्भीताञ्छक्तिययुत्सया ॥४९
शक्तियों के समुदाय के जाज्वल्यमान शस्त्रों की धारों से कटे हुए दानवों की कन्धराएँ तथा मुण्डों की राशियाँ उस रणस्थल में भूमि पर पड़ी हुई थीं ॥४३॥ उन मुण्डों में दांतों से अपने होठों को चबाते हुए तथा भृकुटियां करते हुए और क्रोध से लाल नेत्र स्पष्ट दिखाई दे रहे थे और वे इतनी अधिक संख्या में थे कि समस्त धरणी तल एक समान हो गया था अर्थात् सर्वत्र नर मुण्ड ही मुण्ड दिखाई दे रहे थे ॥४४॥ इस प्रकार से जब महान् भीषण एवं परम घोर युद्ध हो रहा था तो उस समय में जबकि सम्पूर्ण जगत् के लिए वह बहुत ही भयंकर था वे सब शक्तियाँ अत्यन्त क्रुद्ध हो गयी थीं और उन्होंने दैत्यों की सेनाओं का विमर्दन कर दिया था ॥४५॥ सम्पद्देवी के सैनिकों से समाहत होकर वहाँ दानव इधर-उधर शक्तियों के
२१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
शस्त्रों से प्रताड़ित होकर मूर्च्छा को प्राप्त हो गये थे और अन्त में विनष्ट हो गये थे ।४६। इसके अनन्तर अरियों का दमन करने वाले दुर्मद ने भग्न हुए अपने सैनिकों को समाश्वासन दिया था और फिर एक ऊँट पर चढ़कर वह तुरन्त ही सेना के ऊपर आक्रमण करने लगा था ।४७। दीर्घग्रीव निष्ठुर-तोदन वाला समुन्नद्ध होकर पीछे दुर्मद के साथ अधिष्ठित था और उसका वाहन वह ऊँट वहाँ से चल दिया था ।४८। उस उष्ट्र के वाहन वाले दुष्ट के पीछे अन्य दानव भी बड़े ही क्रुद्ध होकर अनुगमन कर रहे थे और वे अन्य दानवों को समाश्वासन देते जा रहे थे जो कि शक्ति के साथ युद्ध करने में डरे हुए थे ।४९।
अवाकिरद्दिशो भल्लैरुल्लसत्फलशालिभिः ।
संपत्करीचमूचक्रं वनं वारिभिरिवांबुदः ॥५०
तेन दुःसहसत्त्वेन ताडिता बहुभिः शरैः ।
स्तंभितेवाभवत्सेना संपत्कर्याः क्षणं रणे ॥५१
अथ क्रोधारुणं चक्षुर्दधाना संपदम्बिका ।
रणकोलाहलगजमारूढायुध्यतामुना ॥५२
आलोलकंकणक्वाणरमणीयतरः करः ।
तस्याश्चाकृष्य कोदण्डमोर्वीमाकर्णमाहवे ॥५३
लघुहस्ततयापश्यन्नाकृष्टन्न च मोक्षणम् ।
ददृशे धनुषश्चक्रं केवलं शरधारणे ॥५४
आश्वकांबरसंपर्कस्फुटप्रतिफलत्फलाः ।
शराः सम्पत्करीचापच्युताः समदहन्नरीन् ॥५५
दुर्मदस्याथ तस्याश्च समभूद्युद्धमुद्धतम् ।
अभूदन्योन्यसंघट्टाद्विस्फुलिंगशिलीमुखैः ॥५६
उल्लसित फलों वाले भालों से समस्त दिशाओं को अवकीर्ण कर दिया था और सम्पत्करी देवी की सेना का जो समूह था उसको इसी तरह से ढक दिया था जैसे मेघ जलों के द्वारा वन को आवृत कर दिया करता है । ।५०। उस दुःसह सत्त्व वाले के द्वारा बहुत से बाणों से ताड़ित हुई संपत्करी
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २६५
देवी की सेना क्षण भर के लिए रणस्थल में स्तम्भित सी ही हो गयी थी। ।५१। इसके अनन्तर महान क्रोध से लाल नेत्रों को धारण करती हुई सम्पदम्बिका रण कोलाहल नामक गज पर समारूढ़ होकर इस दानव के साथ युद्ध करने लगी थी ।५२। कुछ थोड़ा चंचल कङ्कण की क्वणन की ध्वनि से विशेष सुन्दर उसके कर ने उस युद्ध में धनुष की मौर्वी को कानों तक खींचा था ।५३। हाथ के हलकेपन से न तो मौर्वी को खींचते हुए देखा था और न उसके छोड़ने को ही देखा था केवल शर के धारण करते ही देखा गया था जो धनुष पर लगाया था ।५४। शीघ्र ही अर्काम्बर के सम्पर्क से प्रतिफलित फल वाले शरसंपत्करी के चाप से गिरे हुए शत्रुओं का सन्दाह कर देते थे । ।५५। उस देवी का और दुर्मद का अत्यन्त ही अद्भुत युद्ध हुआ था जो कि परस्पर में एक दूसरे के संघट्ट से विस्फुलिंग निकलने वाले वाणों के द्वारा किया गया था ।५६।
प्रथमं प्रसृतैर्बाणैः सम्पद्देवीसुरद्विषोः ।
अन्धकारः समभवत्तिरस्कुर्वन्नहस्करम् ॥५७
तदन्तरे च बाणानामतिसंघट्टयोनयः ।
विस्फुलिंगा विदधिरे दधिरे भ्रमचातुरीम् ॥५८
तयाधिरूढः संश्रोण्या रणकोलाहलः करी ।
पराक्रमं बहुविधं दर्शयामास संगरे ॥५९
करेण कतिचिद्दैत्यान्पादघातेन कांश्चन ।
उदग्रदन्तमुसलघातैरन्यांश्च दानवान् ॥६०
बालकांडहतैरन्यान्फेत्कारैरपरान्रिपून् ।
गात्रव्यामर्द्दनैरन्यान्नखघातैस्तथापरान् ॥६१
पृथुमानाभिघातेन कांश्चिद्दैत्यान्व्यमर्दयत् ।
चतुरं चरितं चक्रे संपद्देवीमतंगजः ॥६२
सुदुर्मदः क्रुधा रक्तो दृढेनैकेन पत्रिणा ।
संपत्करीमुकुटगं मणिमेकमपाहरत् ॥६३
सम्पद्देवी और उस सुरों के शत्रु के प्रसृत बाणों से सर्व प्रथम ऐसा अन्धकार हो गया था जिसने सूर्य के तेज के आलोक को भी तिरस्कृत कर