संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८१
करने वाले कौन-कौन हैं ।६६। उस विषंग छोटे भाई के द्वारा जब इस रीति से भंडासुर से कहा गया था तो उसने कहा था कि जो महान् ओज वाले हैं उनके लिए विचार का करने की क्या आवश्यकता है । हमारी सेना में महान् सत्वधारी हैं और सैकड़ों तो अक्षौहिणी सेना के अधिप हैं । वे इतने समर्थ हैं कि जलधि के जल का भी पान कर सकते हैं और स्वर्ग को भी दग्ध कर सकते हैं । अरे ! पापसमाचार ! व्यर्थ ही स्त्रियों के विषय में तू क्या ऐसी शङ्का कर रहा है ।६२-६३।
तत्सर्वं हि मया पूर्वं चारद्वारावलोकितम् ।
अग्रे समुदिता काचिल्ललितानामधारिणी ॥६४
यथार्थनामवत्येषा पुष्पवत्पेशलाकृतिः ।
न सत्त्वं न च वीर्यं वा न संग्रामेषु वा गतिः ॥६५
सा चाविचारनिवहा किंतु मायापरायणा ।
तत्सत्त्वेनाविद्यमानं स्त्रीकदम्बकमात्मनः ॥६६
उत्पादितवती किं ते न चैवं तु विचेष्टते ।
अथ वा भवदुक्तेन न्यायेनास्तु महद्बलम् ॥६७
त्रैलोक्यल्लंघिमहिमा भण्डः केन विजीयते ॥६८
इदानीमपि मद्बाहुबलसंमर्द मूर्च्छिताः ।
श्वसितुं चापि पटवो न कदाचन नाकिनः ॥६६
केचित्पातालगर्भेपु केचिदम्बुधिवारिषु ।
केचिद्दिगंतकोणेषु केचित्कुञ्जेषु भूभृताम् ॥७०
यह सब तो मैंने पहिले ही दूतों के द्वारा देख लिया है । इसके आगे कोई ललिता नाम वाली स्त्री समुदित हुई है ।६४। यह यथार्थ नाम वाली है अर्थात् जो भी इसके नाम का अर्थ होता है वैसी ही है । पुष्प के समान तो इसका परम कोमल शरीर है । न तो उसमें कोई सत्व है और न वीर्य-पराक्रम ही । संग्रामों में ऐसी स्त्री की क्या गति हो सकती है ।६५। और वह तो अविचारों का समुदाय ही है किन्तु माया फैलाने में अवश्य ही वह परायणा है । उसके सत्त्व से ही उसका अपना स्त्रियों का समुदाय अविद्य-मान है ।६६। उनसे उसने क्या उत्पादन किया है और न इस प्रकार से