भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विशेष चेष्टा ही करती है । अथवा आपके द्वारा कथित न्याय से महान् भी उसका बल होवे तो रहे ।६७। तीनों लोकों के द्वारा जिसकी महिमा का उल्लंघन नहीं होता है ऐसा यह भण्डासुर किसके द्वारा जीता जा सकता है अर्थात् इसको कोई भी पराजित नहीं कर सकता है ।६८। इस समय में भी देवगण मेरे बाहुबल के संमर्दन से मूच्छित किसी समय में भी श्वास लेने में भी समर्थ नहीं हैं ।६६। उनमें से कुछ तो पाताल के गर्भो में जा छिपे हैं और कुछ समुद्र के जलों में छिपे हुए हैं । कुछ दिशाओं के अन्त में कोणों में छिप रहे हैं तथा कुछ कुञ्जों में जाकर छिपाये हैं जो कि पर्वतों में है ।७०।

विलीना भृशवित्रस्तास्त्यक्तदारसुतश्रियः । भ्रष्टाधिकाराः पशवश्छन्नवेषाश्चरंति ते ॥७१

एतादृशं न जानाति मम बाहुपराक्रमम् । अबला न चिरोत्पन्ना तेनैषा दर्पमश्नुते ॥७२

न जानन्ति स्त्रियो मूढा वृथा कल्पितसाहसाः । विनाशमनुधावन्ति कार्याकार्यविमोहिताः ॥७३

अथ वा तां पुरस्कृत्य यद्यागच्छन्ति नाकिनः । यथा महोरगाः सिद्धाः साध्या वा युद्धदुर्मदाः ॥७४

ब्रह्मा वा पद्मनाभो वा रुद्रो वापि सुराधिपः । अन्ये वा हारितां नाथास्तान्संपेष्टु महं पटुः ॥७५

अथ वा मम सेनासु सेनान्यो रणदुर्मदाः । पक्वकर्करिकापेषमवपेक्ष्यंति वैरिणः ॥७६

कुटिलाक्षः कुरंडश्च करंकः कालवाशितः । वज्रदंतो वज्रमुखो वज्रलोमा बलाहकः ॥७७

ये सभी अपने दारा-पुत्र और श्री का त्याग करके अत्यधिक डरे हुए विलीन हो रहे हैं जिनके सब अधिकार भ्रष्ट हो गये हैं । एक पशु के समान ही अपना वेष छिपाये सब इधर-उधर विचरण कर रहे हैं ।७१। इस प्रकार के मेरा जो बाहुओं का पराक्रम है उसको वह नहीं जानती है कारण यही है कि एक तो वह स्त्री है दूसरे अभी-अभी उत्पन्न हुई है । इसी से वह इतना दर्प करती है ।७२। स्त्रियां तो स्वभाव से ही मूढ़ हुआ करती हैं ।