संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८३
इनका तो जो भी कुछ साहस होता है वह वृथा ही कल्पित हुआ करता है । ये कार्य और अकार्य में मोहित ही हुआ करती हैं तथा ये विनाश की ओर अनुधावन किया करती हैं ।७३। अथवा ऐसा भी हो कि उस स्त्री को आगे करके ये देवगण यदि पीछे से आते हैं तो कोई भी क्यों न होवें—चाहे वे महोरग हों—साध्य हों या दुर्मंद सिद्ध भी होंवें । ब्रह्मा तथा पद्मनाभ और रुद्र भी क्यों न हों । या सुराधिप इन्द्र भी होवे और दिक्पाल होवें उन सबको पीस देने में मैं एक ही परम समर्थ हूँ । मुझे इन सबका कुछ भी भय नहीं है ।७५। अथवा मेरी सेनाओं में जो भी सेनानी हैं वे बड़े रण दुर्मंद हैं । वे तो बैरियों को पक्वकर्करिका के समान पीस देने की अवेक्षा ही कर रहे हैं ।७६। उन सेनानियों के कुछ प्रथित नाम मैं बतलाता हूँ—कुटिलाक्ष—कुरण्ड—कटंक—कालवाशित—वज्रदन्द—वज्रमुख—वज्रलोमा—बलाहक हैं ।७७।
सूचीमुखः फलमुखो विकटो विकटाननः ।
करालाक्षः कर्कटको मदनो दीर्घजिह्वकः ॥७८
हुंबको हलमुल्लुंचः कर्कशः कल्किवाहनः ।
पुल्कसः पुण्ड्रकेतुश्च चण्डबाहुश्च कुक्कुरः ॥७९
जंबुकाक्षो जृभणश्च तीक्ष्णशृंगस्त्रिकंटक ।
चतुर्गुंप्तश्चतुर्बाहुश्चकाराक्षश्चतुः शिराः ॥८०
वज्रघोषश्चोर्ध्वकेशो महामायो महाहनुः ।
मखशत्रुर्मखारस्कन्दी सिंहघोषः शिरालकः ॥८१
अंधकः सिंधुनेत्रश्च कूपकः कूपलोचनः ।
गुहाक्षो गंडगल्लश्च चण्डधर्मो यमांतकः ॥८२
लङ्घनः पट्टसेनश्च पुरजित्पूर्वमारकः ।
स्वर्गशत्रुः स्वर्गबलो दुर्गाख्यः स्वर्गकण्टकः ॥८३
अतिमायो बृहन्माय उपमाय उलूकजित् ।
पुरुषेणो विषेणश्च कुन्तिषेणः परूषकः ॥८४
सूचीमुख—फलमुख—विकट—विकटानन—करालाक्ष--कर्कटक-मदन—दीर्घजिह्वक—हुम्बक-—हलमुल्लुंच—कर्कश—कल्कि—वाहन—पुल्कश—