भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २६१

इत्युक्त-वा भंडदैत्येन्द्रं कुटिलाक्षोऽतिगर्वितः ।
स्वसैन्यं सज्जयामास सेनापतिभिरन्वितः ॥३०
दूतस्तु प्रेषितः पूर्वं कुटिलाक्षेण दानवः ।
स ध्वनन्ध्वजिनीयुक्तो ललितासैन्यमावृणोत् ॥३१
कृत्वा किलकिलारावं भटास्तत्र सहस्रशः ।
दोधूयमानैरसिभिर्निपेतुः शक्तिसैनिकैः ॥३२
ताश्च शक्तय उद्दंडाः स्फुरिटाट्टहासस्वनाः ।
देदीप्यमानशस्त्राभाः समयुध्यंत दानवैः ॥३३
शक्तीनां दानवानां च संशोभितजगत्त्रयः ।
समवर्तत संग्रामो धूलिग्रामतताम्बरः ॥३४
रथवंशेषु मूर्च्छन्त्यः करिकंठैः प्रपञ्चिताः ।
अश्वनिःश्वासविक्षिप्ता धूलयः खं प्रपेदिरे ॥३५

हमारे किङ्करों से ही वह अबला तो बहुत ही निराश होगी फिर भी आपकी आज्ञा थी और राजाओं का यह आचार भी है कि अपने नगर की सुरक्षा करनी चाहिए ।२६। भंडासुर से यह कहकर कुटिलाक्ष बहुत गर्व से युक्त हुआ था और सेनापतियों के साथ उसने अपनी सेना को सुसज्जित किया था ।३०। इसके अनन्तर कुटिलाक्ष ने एक दानव दूत को भेजा था। वह ध्वजिनी से संयुत ध्वनि करता हुआ आया था और उसने ललिता की सेना को आवृत्त कर लिया था। उसने किल-किल की ध्वनि की थी। वहाँ पर सहस्रों की संख्या में योद्धा थे और कम्पायमान असियों के द्वारा शक्ति के सैनिकों ने निपात किया था ।३१-३२। वे शक्तियाँ बहुत ही उद्दण्ड थी तथा स्फुरित अट्टहास के घोष वाली थीं। वे देदीप्यमान अस्त्रों की आभा से समन्वित थीं ओर उन्होंने दानवों के साथ भली भाँति से युद्ध किया था ।३३। उन शक्तियों का और दानवों का ऐसा अद्भुत संग्राम हुआ था जिससे ये तीनों लोक संशोभित थे तथा उस संग्राम में इतनी धूलि उड़ी थी वह नभोमण्डल तक छा गयी थी ।३४। रथों के बाँसों में छाई हुई उठकर गजों के कण्ठों तक फैल गई थी तथा अश्वों के निःश्वासों से विक्षिप्त होकर वे धूलियाँ ऊपर आकाश में पहुँच गयी थीं ।३५।