भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तमापतन्तमालोक्य दशाक्षौहिणिकावृतम् । संपत्सरस्वती क्रोधादभिदुद्राव संगरे ॥३६ सम्पत्करीसमानाभिः शक्तिभिः समधिष्ठिताः । अश्वाश्च दन्तिनो मत्ता व्यमर्दन्दानवीं चमूम् ॥३७ अन्योन्यतुमुले युद्धे जाते किलकिलारवे । धूलीषु धूयमानासु ताड्यमानासु भेरिषु ॥३८ इतस्ततः प्रववृधे रक्तसिन्धुर्महीयसी । शक्तिभिः पात्यमानानां दानवानां सहस्रशः ॥३८ ध्वजानि लुठितान्यासन्विBasicलूनानि शिलीमुखैः । विस्रस्ततत्तच्चिह्नानि समं छत्रकदम्बकैः ॥४० रक्तारुणायां युद्धोर्व्यां पतितैश्छत्रमण्डलैः । आलंभि तुलना संध्यारक्ताभ्रहिमरोचिषा ॥४१ ज्वालाकपालः कल्पाग्निरिव चारुपयोनिधौ । दैत्यसैन्यानि निवहाः शक्तीनां पर्यवारयन् ॥४२

उस दानव को अपने ऊपर चढ़कर आते हुए को देखकर जो कि दश अक्षौहिणी सेना से समावृत था सम्पत्सरस्वती देवी क्रोध से उस संग्राम में अभिद्रुत हो गयी थीं ।३६। सम्पत्करी के समान ही शक्तियों से वह समधि-ष्ठित थी । उसके अश्व ओर मदमत्त गज थे । उसने दानवों की उस सेना का विमर्दन कर दिया था ।३७। परस्पर में यह बहुत ही तुमुल युद्ध हुआ था जिसमें सभी ओर किल-किलाहट कीध्वनि होरही थी । धूलियाँ धूममान हो रही थीं और भेरियां बजायी जा रही थीं ।३८। इधर-उधर बहुत बड़ी रुधिर की नदी बह निकली थी । शक्तियों के द्वारा जो सहस्रों दानव मार-काट कर गिरा दिये थे उनके ही रुधिर की नदी बह चली थी ।३९। बाणों के द्वारा काटी गयी ध्वजाएं पड़ी हुई थी जिनमें उन-उनके छिन्न विस्रस्त हो गये थे तथा उनके ही साथ उन दानवों के छत्रों का समुदाय भी गिरा हुआ था ।४०। युद्ध की भूमि रुधिर से लाल हो गयी थी उसी में दानवों के छत्र पड़े हुए थे । उस समय में सन्ध्या कालीन चन्द्रमा की लालिमा से

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