संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदुर्मंद कुरंड वध वर्णन ] [ २६३
तुलना हो रही थी ॥४१॥ ज्वालाओं का समुदाय वाला कल्पान्त की अग्नि के ही समान चारु पयोनिधि में दैत्यों की सेनाओं को शक्तियों के समूह ने परिवारित कर दिया था ॥४२॥
शक्तिच्छन्दोज्ज्वलच्छस्त्रधारानिष्कृत्तकन्धराः ।
दानवान रणतले निपेतुर्मुण्डराशयः ॥४३
दुष्टौष्ठभ्रुकुटीक्रूरैः क्रोधसंरक्तलोचनैः ।
मुण्डैरखण्डमभवत्संग्रामधरणीतलम् ॥४४
एवं प्रवृत्ते समये जगच्चक्रभयंकरे ।
शक्तयो भृशसंक्रुद्धा दैत्यसेनासमर्दयन् ॥४५
इतस्ततः शक्तिशस्त्रैस्ताडिता मूर्च्छिता इति ।
विनेशुर्दानवास्तत्र संपद्देवीबलाहताः ॥४६
अथ भग्नं समाश्वास्य निजं बलमरिन्दमः ।
उष्ट्रमारुह्य सहसा दुर्मंदोऽभ्यद्रवच्चमूम् ॥४७
दीर्घग्रीवः समुन्नद्धः पृष्ठे निष्ठुरतोदनः ।
अधिष्ठितो दुर्मदेन वाहनोष्ट्रश्चचाल ह ॥४८
तमुष्ट्रवाहनं दृष्ट्वान्बीयुः क्रुद्धचेतसः ।
दानावनश्वसतसर्वान्भीताञ्छक्तिययुत्सया ॥४९
शक्तियों के समुदाय के जाज्वल्यमान शस्त्रों की धारों से कटे हुए दानवों की कन्धराएँ तथा मुण्डों की राशियाँ उस रणस्थल में भूमि पर पड़ी हुई थीं ॥४३॥ उन मुण्डों में दांतों से अपने होठों को चबाते हुए तथा भृकुटियां करते हुए और क्रोध से लाल नेत्र स्पष्ट दिखाई दे रहे थे और वे इतनी अधिक संख्या में थे कि समस्त धरणी तल एक समान हो गया था अर्थात् सर्वत्र नर मुण्ड ही मुण्ड दिखाई दे रहे थे ॥४४॥ इस प्रकार से जब महान् भीषण एवं परम घोर युद्ध हो रहा था तो उस समय में जबकि सम्पूर्ण जगत् के लिए वह बहुत ही भयंकर था वे सब शक्तियाँ अत्यन्त क्रुद्ध हो गयी थीं और उन्होंने दैत्यों की सेनाओं का विमर्दन कर दिया था ॥४५॥ सम्पद्देवी के सैनिकों से समाहत होकर वहाँ दानव इधर-उधर शक्तियों के