संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रतीचीने पुरद्वारे दशाक्षौहिणिकायुतम् । तालग्रीवं नाम दैत्यं रक्षार्थं समकल्पयत् ॥ २४ उत्तरे तु पुरद्वारं तालकेतुं महाबलम् । आदिदेश स रक्षार्थं दशाक्षौहिणिकायुतम् ॥ २५ पुरस्य सालवलये कपिशीर्षकवेश्मसु । मण्डलाकारतो वस्तुं दशाक्षौहिणीमादिशत् ॥ २६ एवं पञ्चाशता कृत्वाक्षौहिण्या पुररक्षणम् । शून्यकस्य पुरस्यैव तद्वृत्तं स्वामिनेऽवदत् ॥ २७ कुटिलाक्ष उवाच- देव त्वदाज्ञया दत्तं सैन्यं नगररक्षणे । दुर्मदः प्रेषितः पूर्वं दुष्टां तां ललितां प्रति ॥ २८
इसके पश्चात् भंडासुर की आज्ञा पाकर महान बलवान कुटिलाक्ष ने शून्यक के प्राचीन पुरद्वार पर रक्षा करने के लिए दश अक्षौहिणी सेना से समन्वित तालजंघ को कल्पित किया था ।२२। जो अर्वाचीन नगर का द्वार था उस पर दश अक्षौहिणी सेना से संयुत तालभुज नामक दैत्य को रक्षण के लिए नियुक्त किया था ।२३। पश्चिमके पुर द्वार पर भी दश अक्षौहिणियों से युक्त तालग्रीव नाम वाले दैत्य को कल्पित किया था ।२४। उत्तर मैं जो पुर द्वार था उस पर महान बली तालकेतु को रक्षा के लिए उसने आज्ञा प्रदान की थी वह भी दश अक्षौहिणी सेना से समन्वित था ।२५। नगर के साल वलय में कपि शीर्षक गृहों में मण्डल के आकार से वास करने के लिये दश अक्षौहिणी सेना को आदेश दिया था ।२६। इस रीति से पाँच सौ अक्षौ-हिणी सेना को पुर की रक्षा के लिये नियुक्त किया था । उस नगर शून्यक की सुरक्षा के पूरे प्रबन्ध का समाचार अपने स्वामी से निवेदन कर दिया था ।२७। कुटिलाक्ष ने कहा—हे स्वामिन् ! आपकी आज्ञा से नगर की सुरक्षा के लिए सेना नियुक्त करदी है और उस ललिता पर धावा करने के लिए जो कि बहुत ही दुष्टा स्त्री है पहिले ही दुर्मद को भेज दिया गया है ।२८।
अस्मत्किंकरमात्रेण सुनिराशा हि साबला । तथापि राज्ञामाचारः कर्त्तव्यं पुररक्षणम् ॥ २६