भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २८६

प्रचेलुः प्रबलक्रोधसंमूर्च्छितनिजाशयाः ।
कुटिलं सैन्यभर्त्तारं दुर्मदं नाम दानवम् ।
दशाक्षौहिणिकायुक्तं प्राहिणोल्ललितां प्रति ॥१९
दिधक्षुभिरिवाशेषं विश्वं सह बलोत्कटैः ।
भटैर्युक्तः स सेनानी ललिताभिमुखे ययौ ॥२०
भिदन्पटहसंरावैश्चतुर्दश जगन्ति सः ।
अट्टहासान्वितन्वानो दुर्मदस्तन्मुखो ययौ ॥२१

परिकल्पिता हस्तों के अग्रवाली गर्वित दैत्यों की कोटियाँ हैं। कुछ अश्वों पर सवार थे—कुछ हाथियों पर आरूढ़ थे—और कुछ गर्दभों पर बैठे हुए थे ।१५। कुछ ऊँटों पर सवार—कुछ वृकों पर समारूढ़ तथा कुछ श्वानाें पर सवार थे। काक आदिकों पर भी सवार थे तथा गृध्रों पर और कंकों पर सवार कुछ हो रहे थे ।१६। कुछ व्याघ्र आदि पर सवार थे तथा कुछ सिंह आदि पर आरूढ़ थे। अन्य शरभों पर सवार थे सो कुछ भेरुण्डों पर समारूढ़ हो रहे थे ।१७। सूकरों पर कुछ दैत्य सवारी किये हुए थे एवं व्यालों पर और प्रेतों पर कुछ सवार थे। इस रीति से अनेक प्रकार के वाहनों पर बैठकर दैत्यगण ललिता देवी के प्रति आक्रमण कर रहे थे ।१८। प्रबल क्रोध से उनका अपना आशय भी मूर्च्छित हो रहा था। परम कुटिल दुर्मद नामक सेनापति को दश अक्षौहिणी सेना से संयुत करके ललितादेवी पर आक्रमण करने के लिए भेजा था ।१९। अपने अत्युत्कट बल के द्वारा सम्पूर्ण विश्व को दग्ध करने की इच्छा वाले की तरह ही भटों से युक्त वह सेनानी ललिता देवी के सामने गया था ।२०। वह अपने पटहों के महाघोषों से चौदह भुवनों का भेदन करता हुआ गया था। वह दुर्मद अट्टहास से समन्वित होकर उस देवी के समक्ष में प्राप्त हुआ था ।२१।

अथ भंडासुराज्ञप्तः कुटिलाक्षो महाबलः ।
शून्यकस्य पुरद्वारे प्राचीने समकल्पयत् ।
रक्षणार्थं दशाक्षौहिण्युपेतं तालजंघकम् ॥२२
अर्वाचीने पुरद्वारे दशाक्षौहिणिकायुतम् ।
नाम्ना तालभुजं दैत्यं रक्षणार्थमकल्पयत् ॥२३