भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 698, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 698

२८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गदाभिश्च शतघ्नीभिस्त्रिशिखैर्विशिखैरपि । अर्धचक्रैर्महाचक्रै र्वक्रांगैरुरगाननैः ॥११ फणिशीर्षप्रभेदै श्च धनुर्भिः शार्ङ्गधन्विभिः । दण्डैः क्षेपणिकाशस्त्रै र्वज्रबाणैर्हृषद्वरैः ॥१२ यवमध्यैर्मुष्टिमध्यैर्बललैः खंड्लैरपि । कटारैः कोणमध्यैश्च फणिदन्तैः परः शतैः ॥१३ पाशायुधैः पाशतुण्डैः काकतुण्डैः सहस्रशः । एवमादिभिरत्युग्रैरायुधै र्जीवहारिभिः ॥१४

एक ओर अपने कर के अग्रभाग से भाला हाथ में लिये हुए अश्व पर समारूढ़ होकर वीथी में चरण करने वालों को तितर-बितर कर रहा था ।८। कुछ योधागण बहुत ही ऊंचे वपु वाले हाथियों पर समारूढ़ थे जो कि उत्पात वाली वायु के सम्पात से प्रेरित पर्वतों के ही तुल्य दिखाई दे रहे थे ।६। उस समय में बड़े-बड़े आयुधों के द्वारा प्रहार किये जा रहे थे—उनमें कतिपय आयुधों के नाम ये हैं—पट्टिश-मुद्गरभिदुर-भिण्डी पालक-द्रुहिण-भुशुण्डी—कुठार—मुसल—गदा—शतघ्नी—त्रिशिख—विशिख—अर्धचक्र-महाचक्र—वक्राङ्ग—उरगानन—फणि—शीर्ष—धनुष—दण्ड—क्षेपणिकास्त्र-वज्रवाण—दृषद्वर—यवमध्य—मुष्टिमध्य—वलल—खण्डल—कटार—कोण-मध्य—सैकड़ों से भी अधिक फणिदन्त—पाशायुध—पाशतुण्ड—सहस्रों काकतुण्ड—इस प्रकार से जीवों के विनाशक आयुधों का प्रयोग किया जा रहा था।१०-१४।

परिकल्पितहस्ताग्रा वर्मिता दैत्यकोटयः । अश्वारोहा गजारोहा गर्दभारोहिणः परे ॥१५ उष्ट्रारोहा वृकारोहा शुनकारोहिणः परे । काकादिरोहिणो गृध्रारोहाः कंकादिरोहिणः ॥१६ व्याघ्रादिरोहिणश्चान्ये परे सिंहादिरोहिणः । शरभारोहिणश्चान्ये भेरुण्डारोहिणः परे ॥१७ सूकरारोहिणो व्यालारूढाः प्रेतादिरोहिणः । एवं नानाविधैर्वाहैर्वाहिनो ललितां प्रति ॥१८