भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८७

ततः किलकिलारावमुखरा दैत्यकोटयः । समनह्यन्त संक्रुद्धाः प्रति तां परमेश्वरीम् ॥५ कश्चिद्रत्नविचित्रेण वर्मणाच्छन्नविग्रहः । चकाशे जंगम इव प्रोत्तुङ्गो रोहणाचलः ॥६ कालरात्रिमिवोदग्रां शस्त्रकारेण गोपिताम् । अधुनीत भटः कश्चिदतिधौतां कृपाणिकाम् ॥७

इसके अनन्तर श्री ललिता देवी की सेना के निस्सरण की प्रतिध्वनि ने असुरेन्द्रों को उच्चालित कर दिया था जो कि दुन्दुभियों की अतीव उद्धत ध्वनि उस समय में हो रही थी ।१। दिशाओं के मर्दित करने वाली उससे पयोथियों का गर्भ भी क्षुब्ध हो गया था और समस्त लोक उस महान् भीषण एवं घोर ध्वनि से बहरा हो गया था। उस समय में तीनों भुवन कांप उठे थे ।२। इधर दैत्यों के निःसाण का घोष भी दिशाओं के समूह को मर्दित कर रहा था तथा पर्वतों की कन्दराओं का भेदन कर रहा था एवं नभो मण्डल में ऊपर उठ गया था ।३। महान् नरसिंह के क्रोध से निकलने वाली हुँकार के समान जो उद्धत ध्वनि थी वह देवों के शत्रुओं की झल्लरी बहुत ही अधिक विरसता उत्पन्न कर रही थी ।४। इसके उपरान्त किल-किल की ध्वनि से शब्दायमान दैत्यों की श्रेणियाँ हो रही थी । वे सभी परमेश्वरी उस देवी के प्रति बहुत ही क्रुद्ध होकर सन्नद्ध हुए थे ।५। वह बहुत ही ऊँचा रोहणाचल रत्नों से विचित्र कर्म (कवच) से ढके हुए शरीर वाला एक जङ्गम के ही समान शोभित हो रहा था ।६। कोई भट अपनी अतिधोत कृपाण को जो शस्त्रकार से गोपित थी कालरात्रि के ही समान उदग्र को हिला रहा था ।७।

उल्लासयन्कराग्रेण कुन्तपल्लवमेकतः । आरूढतुरगो वीथ्यां चारिभेदं चकार ह ॥८ केचिदारुह्यर्योधा मातंगांस्तुंगवष्मंणः । उत्पातवातसंपातप्रेरितानिव पर्वतान् ॥६ पट्टिशैर्मुद्गरैश्चैव भिदुरैर्भिन्दिपालकैः । द्रुघणैश्च भुशुण्डीभिः कुठारैर्मुद्गरैरपि ॥१०