संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८७
ततः किलकिलारावमुखरा दैत्यकोटयः । समनह्यन्त संक्रुद्धाः प्रति तां परमेश्वरीम् ॥५ कश्चिद्रत्नविचित्रेण वर्मणाच्छन्नविग्रहः । चकाशे जंगम इव प्रोत्तुङ्गो रोहणाचलः ॥६ कालरात्रिमिवोदग्रां शस्त्रकारेण गोपिताम् । अधुनीत भटः कश्चिदतिधौतां कृपाणिकाम् ॥७
इसके अनन्तर श्री ललिता देवी की सेना के निस्सरण की प्रतिध्वनि ने असुरेन्द्रों को उच्चालित कर दिया था जो कि दुन्दुभियों की अतीव उद्धत ध्वनि उस समय में हो रही थी ।१। दिशाओं के मर्दित करने वाली उससे पयोथियों का गर्भ भी क्षुब्ध हो गया था और समस्त लोक उस महान् भीषण एवं घोर ध्वनि से बहरा हो गया था। उस समय में तीनों भुवन कांप उठे थे ।२। इधर दैत्यों के निःसाण का घोष भी दिशाओं के समूह को मर्दित कर रहा था तथा पर्वतों की कन्दराओं का भेदन कर रहा था एवं नभो मण्डल में ऊपर उठ गया था ।३। महान् नरसिंह के क्रोध से निकलने वाली हुँकार के समान जो उद्धत ध्वनि थी वह देवों के शत्रुओं की झल्लरी बहुत ही अधिक विरसता उत्पन्न कर रही थी ।४। इसके उपरान्त किल-किल की ध्वनि से शब्दायमान दैत्यों की श्रेणियाँ हो रही थी । वे सभी परमेश्वरी उस देवी के प्रति बहुत ही क्रुद्ध होकर सन्नद्ध हुए थे ।५। वह बहुत ही ऊँचा रोहणाचल रत्नों से विचित्र कर्म (कवच) से ढके हुए शरीर वाला एक जङ्गम के ही समान शोभित हो रहा था ।६। कोई भट अपनी अतिधोत कृपाण को जो शस्त्रकार से गोपित थी कालरात्रि के ही समान उदग्र को हिला रहा था ।७।
उल्लासयन्कराग्रेण कुन्तपल्लवमेकतः । आरूढतुरगो वीथ्यां चारिभेदं चकार ह ॥८ केचिदारुह्यर्योधा मातंगांस्तुंगवष्मंणः । उत्पातवातसंपातप्रेरितानिव पर्वतान् ॥६ पट्टिशैर्मुद्गरैश्चैव भिदुरैर्भिन्दिपालकैः । द्रुघणैश्च भुशुण्डीभिः कुठारैर्मुद्गरैरपि ॥१०
२८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गदाभिश्च शतघ्नीभिस्त्रिशिखैर्विशिखैरपि । अर्धचक्रैर्महाचक्रै र्वक्रांगैरुरगाननैः ॥११ फणिशीर्षप्रभेदै श्च धनुर्भिः शार्ङ्गधन्विभिः । दण्डैः क्षेपणिकाशस्त्रै र्वज्रबाणैर्हृषद्वरैः ॥१२ यवमध्यैर्मुष्टिमध्यैर्बललैः खंड्लैरपि । कटारैः कोणमध्यैश्च फणिदन्तैः परः शतैः ॥१३ पाशायुधैः पाशतुण्डैः काकतुण्डैः सहस्रशः । एवमादिभिरत्युग्रैरायुधै र्जीवहारिभिः ॥१४
एक ओर अपने कर के अग्रभाग से भाला हाथ में लिये हुए अश्व पर समारूढ़ होकर वीथी में चरण करने वालों को तितर-बितर कर रहा था ।८। कुछ योधागण बहुत ही ऊंचे वपु वाले हाथियों पर समारूढ़ थे जो कि उत्पात वाली वायु के सम्पात से प्रेरित पर्वतों के ही तुल्य दिखाई दे रहे थे ।६। उस समय में बड़े-बड़े आयुधों के द्वारा प्रहार किये जा रहे थे—उनमें कतिपय आयुधों के नाम ये हैं—पट्टिश-मुद्गरभिदुर-भिण्डी पालक-द्रुहिण-भुशुण्डी—कुठार—मुसल—गदा—शतघ्नी—त्रिशिख—विशिख—अर्धचक्र-महाचक्र—वक्राङ्ग—उरगानन—फणि—शीर्ष—धनुष—दण्ड—क्षेपणिकास्त्र-वज्रवाण—दृषद्वर—यवमध्य—मुष्टिमध्य—वलल—खण्डल—कटार—कोण-मध्य—सैकड़ों से भी अधिक फणिदन्त—पाशायुध—पाशतुण्ड—सहस्रों काकतुण्ड—इस प्रकार से जीवों के विनाशक आयुधों का प्रयोग किया जा रहा था।१०-१४।
परिकल्पितहस्ताग्रा वर्मिता दैत्यकोटयः । अश्वारोहा गजारोहा गर्दभारोहिणः परे ॥१५ उष्ट्रारोहा वृकारोहा शुनकारोहिणः परे । काकादिरोहिणो गृध्रारोहाः कंकादिरोहिणः ॥१६ व्याघ्रादिरोहिणश्चान्ये परे सिंहादिरोहिणः । शरभारोहिणश्चान्ये भेरुण्डारोहिणः परे ॥१७ सूकरारोहिणो व्यालारूढाः प्रेतादिरोहिणः । एवं नानाविधैर्वाहैर्वाहिनो ललितां प्रति ॥१८
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २८६
प्रचेलुः प्रबलक्रोधसंमूर्च्छितनिजाशयाः ।
कुटिलं सैन्यभर्त्तारं दुर्मदं नाम दानवम् ।
दशाक्षौहिणिकायुक्तं प्राहिणोल्ललितां प्रति ॥१९
दिधक्षुभिरिवाशेषं विश्वं सह बलोत्कटैः ।
भटैर्युक्तः स सेनानी ललिताभिमुखे ययौ ॥२०
भिदन्पटहसंरावैश्चतुर्दश जगन्ति सः ।
अट्टहासान्वितन्वानो दुर्मदस्तन्मुखो ययौ ॥२१
परिकल्पिता हस्तों के अग्रवाली गर्वित दैत्यों की कोटियाँ हैं। कुछ अश्वों पर सवार थे—कुछ हाथियों पर आरूढ़ थे—और कुछ गर्दभों पर बैठे हुए थे ।१५। कुछ ऊँटों पर सवार—कुछ वृकों पर समारूढ़ तथा कुछ श्वानाें पर सवार थे। काक आदिकों पर भी सवार थे तथा गृध्रों पर और कंकों पर सवार कुछ हो रहे थे ।१६। कुछ व्याघ्र आदि पर सवार थे तथा कुछ सिंह आदि पर आरूढ़ थे। अन्य शरभों पर सवार थे सो कुछ भेरुण्डों पर समारूढ़ हो रहे थे ।१७। सूकरों पर कुछ दैत्य सवारी किये हुए थे एवं व्यालों पर और प्रेतों पर कुछ सवार थे। इस रीति से अनेक प्रकार के वाहनों पर बैठकर दैत्यगण ललिता देवी के प्रति आक्रमण कर रहे थे ।१८। प्रबल क्रोध से उनका अपना आशय भी मूर्च्छित हो रहा था। परम कुटिल दुर्मद नामक सेनापति को दश अक्षौहिणी सेना से संयुत करके ललितादेवी पर आक्रमण करने के लिए भेजा था ।१९। अपने अत्युत्कट बल के द्वारा सम्पूर्ण विश्व को दग्ध करने की इच्छा वाले की तरह ही भटों से युक्त वह सेनानी ललिता देवी के सामने गया था ।२०। वह अपने पटहों के महाघोषों से चौदह भुवनों का भेदन करता हुआ गया था। वह दुर्मद अट्टहास से समन्वित होकर उस देवी के समक्ष में प्राप्त हुआ था ।२१।
अथ भंडासुराज्ञप्तः कुटिलाक्षो महाबलः ।
शून्यकस्य पुरद्वारे प्राचीने समकल्पयत् ।
रक्षणार्थं दशाक्षौहिण्युपेतं तालजंघकम् ॥२२
अर्वाचीने पुरद्वारे दशाक्षौहिणिकायुतम् ।
नाम्ना तालभुजं दैत्यं रक्षणार्थमकल्पयत् ॥२३
२६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रतीचीने पुरद्वारे दशाक्षौहिणिकायुतम् । तालग्रीवं नाम दैत्यं रक्षार्थं समकल्पयत् ॥ २४ उत्तरे तु पुरद्वारं तालकेतुं महाबलम् । आदिदेश स रक्षार्थं दशाक्षौहिणिकायुतम् ॥ २५ पुरस्य सालवलये कपिशीर्षकवेश्मसु । मण्डलाकारतो वस्तुं दशाक्षौहिणीमादिशत् ॥ २६ एवं पञ्चाशता कृत्वाक्षौहिण्या पुररक्षणम् । शून्यकस्य पुरस्यैव तद्वृत्तं स्वामिनेऽवदत् ॥ २७ कुटिलाक्ष उवाच- देव त्वदाज्ञया दत्तं सैन्यं नगररक्षणे । दुर्मदः प्रेषितः पूर्वं दुष्टां तां ललितां प्रति ॥ २८
इसके पश्चात् भंडासुर की आज्ञा पाकर महान बलवान कुटिलाक्ष ने शून्यक के प्राचीन पुरद्वार पर रक्षा करने के लिए दश अक्षौहिणी सेना से समन्वित तालजंघ को कल्पित किया था ।२२। जो अर्वाचीन नगर का द्वार था उस पर दश अक्षौहिणी सेना से संयुत तालभुज नामक दैत्य को रक्षण के लिए नियुक्त किया था ।२३। पश्चिमके पुर द्वार पर भी दश अक्षौहिणियों से युक्त तालग्रीव नाम वाले दैत्य को कल्पित किया था ।२४। उत्तर मैं जो पुर द्वार था उस पर महान बली तालकेतु को रक्षा के लिए उसने आज्ञा प्रदान की थी वह भी दश अक्षौहिणी सेना से समन्वित था ।२५। नगर के साल वलय में कपि शीर्षक गृहों में मण्डल के आकार से वास करने के लिये दश अक्षौहिणी सेना को आदेश दिया था ।२६। इस रीति से पाँच सौ अक्षौ-हिणी सेना को पुर की रक्षा के लिये नियुक्त किया था । उस नगर शून्यक की सुरक्षा के पूरे प्रबन्ध का समाचार अपने स्वामी से निवेदन कर दिया था ।२७। कुटिलाक्ष ने कहा—हे स्वामिन् ! आपकी आज्ञा से नगर की सुरक्षा के लिए सेना नियुक्त करदी है और उस ललिता पर धावा करने के लिए जो कि बहुत ही दुष्टा स्त्री है पहिले ही दुर्मद को भेज दिया गया है ।२८।
अस्मत्किंकरमात्रेण सुनिराशा हि साबला । तथापि राज्ञामाचारः कर्त्तव्यं पुररक्षणम् ॥ २६
६. द्वितीय खण्ड — ललिता माहात्म्य (श्रीविद्या, भाण्डासुर-वध व उपसंहार)
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २६१
इत्युक्त-वा भंडदैत्येन्द्रं कुटिलाक्षोऽतिगर्वितः ।
स्वसैन्यं सज्जयामास सेनापतिभिरन्वितः ॥३०
दूतस्तु प्रेषितः पूर्वं कुटिलाक्षेण दानवः ।
स ध्वनन्ध्वजिनीयुक्तो ललितासैन्यमावृणोत् ॥३१
कृत्वा किलकिलारावं भटास्तत्र सहस्रशः ।
दोधूयमानैरसिभिर्निपेतुः शक्तिसैनिकैः ॥३२
ताश्च शक्तय उद्दंडाः स्फुरिटाट्टहासस्वनाः ।
देदीप्यमानशस्त्राभाः समयुध्यंत दानवैः ॥३३
शक्तीनां दानवानां च संशोभितजगत्त्रयः ।
समवर्तत संग्रामो धूलिग्रामतताम्बरः ॥३४
रथवंशेषु मूर्च्छन्त्यः करिकंठैः प्रपञ्चिताः ।
अश्वनिःश्वासविक्षिप्ता धूलयः खं प्रपेदिरे ॥३५
हमारे किङ्करों से ही वह अबला तो बहुत ही निराश होगी फिर भी आपकी आज्ञा थी और राजाओं का यह आचार भी है कि अपने नगर की सुरक्षा करनी चाहिए ।२६। भंडासुर से यह कहकर कुटिलाक्ष बहुत गर्व से युक्त हुआ था और सेनापतियों के साथ उसने अपनी सेना को सुसज्जित किया था ।३०। इसके अनन्तर कुटिलाक्ष ने एक दानव दूत को भेजा था। वह ध्वजिनी से संयुत ध्वनि करता हुआ आया था और उसने ललिता की सेना को आवृत्त कर लिया था। उसने किल-किल की ध्वनि की थी। वहाँ पर सहस्रों की संख्या में योद्धा थे और कम्पायमान असियों के द्वारा शक्ति के सैनिकों ने निपात किया था ।३१-३२। वे शक्तियाँ बहुत ही उद्दण्ड थी तथा स्फुरित अट्टहास के घोष वाली थीं। वे देदीप्यमान अस्त्रों की आभा से समन्वित थीं ओर उन्होंने दानवों के साथ भली भाँति से युद्ध किया था ।३३। उन शक्तियों का और दानवों का ऐसा अद्भुत संग्राम हुआ था जिससे ये तीनों लोक संशोभित थे तथा उस संग्राम में इतनी धूलि उड़ी थी वह नभोमण्डल तक छा गयी थी ।३४। रथों के बाँसों में छाई हुई उठकर गजों के कण्ठों तक फैल गई थी तथा अश्वों के निःश्वासों से विक्षिप्त होकर वे धूलियाँ ऊपर आकाश में पहुँच गयी थीं ।३५।
२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तमापतन्तमालोक्य दशाक्षौहिणिकावृतम् । संपत्सरस्वती क्रोधादभिदुद्राव संगरे ॥३६ सम्पत्करीसमानाभिः शक्तिभिः समधिष्ठिताः । अश्वाश्च दन्तिनो मत्ता व्यमर्दन्दानवीं चमूम् ॥३७ अन्योन्यतुमुले युद्धे जाते किलकिलारवे । धूलीषु धूयमानासु ताड्यमानासु भेरिषु ॥३८ इतस्ततः प्रववृधे रक्तसिन्धुर्महीयसी । शक्तिभिः पात्यमानानां दानवानां सहस्रशः ॥३८ ध्वजानि लुठितान्यासन्विBasicलूनानि शिलीमुखैः । विस्रस्ततत्तच्चिह्नानि समं छत्रकदम्बकैः ॥४० रक्तारुणायां युद्धोर्व्यां पतितैश्छत्रमण्डलैः । आलंभि तुलना संध्यारक्ताभ्रहिमरोचिषा ॥४१ ज्वालाकपालः कल्पाग्निरिव चारुपयोनिधौ । दैत्यसैन्यानि निवहाः शक्तीनां पर्यवारयन् ॥४२
उस दानव को अपने ऊपर चढ़कर आते हुए को देखकर जो कि दश अक्षौहिणी सेना से समावृत था सम्पत्सरस्वती देवी क्रोध से उस संग्राम में अभिद्रुत हो गयी थीं ।३६। सम्पत्करी के समान ही शक्तियों से वह समधि-ष्ठित थी । उसके अश्व ओर मदमत्त गज थे । उसने दानवों की उस सेना का विमर्दन कर दिया था ।३७। परस्पर में यह बहुत ही तुमुल युद्ध हुआ था जिसमें सभी ओर किल-किलाहट कीध्वनि होरही थी । धूलियाँ धूममान हो रही थीं और भेरियां बजायी जा रही थीं ।३८। इधर-उधर बहुत बड़ी रुधिर की नदी बह निकली थी । शक्तियों के द्वारा जो सहस्रों दानव मार-काट कर गिरा दिये थे उनके ही रुधिर की नदी बह चली थी ।३९। बाणों के द्वारा काटी गयी ध्वजाएं पड़ी हुई थी जिनमें उन-उनके छिन्न विस्रस्त हो गये थे तथा उनके ही साथ उन दानवों के छत्रों का समुदाय भी गिरा हुआ था ।४०। युद्ध की भूमि रुधिर से लाल हो गयी थी उसी में दानवों के छत्र पड़े हुए थे । उस समय में सन्ध्या कालीन चन्द्रमा की लालिमा से
दुर्मंद कुरंड वध वर्णन ] [ २६३
तुलना हो रही थी ॥४१॥ ज्वालाओं का समुदाय वाला कल्पान्त की अग्नि के ही समान चारु पयोनिधि में दैत्यों की सेनाओं को शक्तियों के समूह ने परिवारित कर दिया था ॥४२॥
शक्तिच्छन्दोज्ज्वलच्छस्त्रधारानिष्कृत्तकन्धराः ।
दानवान रणतले निपेतुर्मुण्डराशयः ॥४३
दुष्टौष्ठभ्रुकुटीक्रूरैः क्रोधसंरक्तलोचनैः ।
मुण्डैरखण्डमभवत्संग्रामधरणीतलम् ॥४४
एवं प्रवृत्ते समये जगच्चक्रभयंकरे ।
शक्तयो भृशसंक्रुद्धा दैत्यसेनासमर्दयन् ॥४५
इतस्ततः शक्तिशस्त्रैस्ताडिता मूर्च्छिता इति ।
विनेशुर्दानवास्तत्र संपद्देवीबलाहताः ॥४६
अथ भग्नं समाश्वास्य निजं बलमरिन्दमः ।
उष्ट्रमारुह्य सहसा दुर्मंदोऽभ्यद्रवच्चमूम् ॥४७
दीर्घग्रीवः समुन्नद्धः पृष्ठे निष्ठुरतोदनः ।
अधिष्ठितो दुर्मदेन वाहनोष्ट्रश्चचाल ह ॥४८
तमुष्ट्रवाहनं दृष्ट्वान्बीयुः क्रुद्धचेतसः ।
दानावनश्वसतसर्वान्भीताञ्छक्तिययुत्सया ॥४९
शक्तियों के समुदाय के जाज्वल्यमान शस्त्रों की धारों से कटे हुए दानवों की कन्धराएँ तथा मुण्डों की राशियाँ उस रणस्थल में भूमि पर पड़ी हुई थीं ॥४३॥ उन मुण्डों में दांतों से अपने होठों को चबाते हुए तथा भृकुटियां करते हुए और क्रोध से लाल नेत्र स्पष्ट दिखाई दे रहे थे और वे इतनी अधिक संख्या में थे कि समस्त धरणी तल एक समान हो गया था अर्थात् सर्वत्र नर मुण्ड ही मुण्ड दिखाई दे रहे थे ॥४४॥ इस प्रकार से जब महान् भीषण एवं परम घोर युद्ध हो रहा था तो उस समय में जबकि सम्पूर्ण जगत् के लिए वह बहुत ही भयंकर था वे सब शक्तियाँ अत्यन्त क्रुद्ध हो गयी थीं और उन्होंने दैत्यों की सेनाओं का विमर्दन कर दिया था ॥४५॥ सम्पद्देवी के सैनिकों से समाहत होकर वहाँ दानव इधर-उधर शक्तियों के
२१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
शस्त्रों से प्रताड़ित होकर मूर्च्छा को प्राप्त हो गये थे और अन्त में विनष्ट हो गये थे ।४६। इसके अनन्तर अरियों का दमन करने वाले दुर्मद ने भग्न हुए अपने सैनिकों को समाश्वासन दिया था और फिर एक ऊँट पर चढ़कर वह तुरन्त ही सेना के ऊपर आक्रमण करने लगा था ।४७। दीर्घग्रीव निष्ठुर-तोदन वाला समुन्नद्ध होकर पीछे दुर्मद के साथ अधिष्ठित था और उसका वाहन वह ऊँट वहाँ से चल दिया था ।४८। उस उष्ट्र के वाहन वाले दुष्ट के पीछे अन्य दानव भी बड़े ही क्रुद्ध होकर अनुगमन कर रहे थे और वे अन्य दानवों को समाश्वासन देते जा रहे थे जो कि शक्ति के साथ युद्ध करने में डरे हुए थे ।४९।
अवाकिरद्दिशो भल्लैरुल्लसत्फलशालिभिः ।
संपत्करीचमूचक्रं वनं वारिभिरिवांबुदः ॥५०
तेन दुःसहसत्त्वेन ताडिता बहुभिः शरैः ।
स्तंभितेवाभवत्सेना संपत्कर्याः क्षणं रणे ॥५१
अथ क्रोधारुणं चक्षुर्दधाना संपदम्बिका ।
रणकोलाहलगजमारूढायुध्यतामुना ॥५२
आलोलकंकणक्वाणरमणीयतरः करः ।
तस्याश्चाकृष्य कोदण्डमोर्वीमाकर्णमाहवे ॥५३
लघुहस्ततयापश्यन्नाकृष्टन्न च मोक्षणम् ।
ददृशे धनुषश्चक्रं केवलं शरधारणे ॥५४
आश्वकांबरसंपर्कस्फुटप्रतिफलत्फलाः ।
शराः सम्पत्करीचापच्युताः समदहन्नरीन् ॥५५
दुर्मदस्याथ तस्याश्च समभूद्युद्धमुद्धतम् ।
अभूदन्योन्यसंघट्टाद्विस्फुलिंगशिलीमुखैः ॥५६
उल्लसित फलों वाले भालों से समस्त दिशाओं को अवकीर्ण कर दिया था और सम्पत्करी देवी की सेना का जो समूह था उसको इसी तरह से ढक दिया था जैसे मेघ जलों के द्वारा वन को आवृत कर दिया करता है । ।५०। उस दुःसह सत्त्व वाले के द्वारा बहुत से बाणों से ताड़ित हुई संपत्करी
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २६५
देवी की सेना क्षण भर के लिए रणस्थल में स्तम्भित सी ही हो गयी थी। ।५१। इसके अनन्तर महान क्रोध से लाल नेत्रों को धारण करती हुई सम्पदम्बिका रण कोलाहल नामक गज पर समारूढ़ होकर इस दानव के साथ युद्ध करने लगी थी ।५२। कुछ थोड़ा चंचल कङ्कण की क्वणन की ध्वनि से विशेष सुन्दर उसके कर ने उस युद्ध में धनुष की मौर्वी को कानों तक खींचा था ।५३। हाथ के हलकेपन से न तो मौर्वी को खींचते हुए देखा था और न उसके छोड़ने को ही देखा था केवल शर के धारण करते ही देखा गया था जो धनुष पर लगाया था ।५४। शीघ्र ही अर्काम्बर के सम्पर्क से प्रतिफलित फल वाले शरसंपत्करी के चाप से गिरे हुए शत्रुओं का सन्दाह कर देते थे । ।५५। उस देवी का और दुर्मद का अत्यन्त ही अद्भुत युद्ध हुआ था जो कि परस्पर में एक दूसरे के संघट्ट से विस्फुलिंग निकलने वाले वाणों के द्वारा किया गया था ।५६।
प्रथमं प्रसृतैर्बाणैः सम्पद्देवीसुरद्विषोः ।
अन्धकारः समभवत्तिरस्कुर्वन्नहस्करम् ॥५७
तदन्तरे च बाणानामतिसंघट्टयोनयः ।
विस्फुलिंगा विदधिरे दधिरे भ्रमचातुरीम् ॥५८
तयाधिरूढः संश्रोण्या रणकोलाहलः करी ।
पराक्रमं बहुविधं दर्शयामास संगरे ॥५९
करेण कतिचिद्दैत्यान्पादघातेन कांश्चन ।
उदग्रदन्तमुसलघातैरन्यांश्च दानवान् ॥६०
बालकांडहतैरन्यान्फेत्कारैरपरान्रिपून् ।
गात्रव्यामर्द्दनैरन्यान्नखघातैस्तथापरान् ॥६१
पृथुमानाभिघातेन कांश्चिद्दैत्यान्व्यमर्दयत् ।
चतुरं चरितं चक्रे संपद्देवीमतंगजः ॥६२
सुदुर्मदः क्रुधा रक्तो दृढेनैकेन पत्रिणा ।
संपत्करीमुकुटगं मणिमेकमपाहरत् ॥६३
सम्पद्देवी और उस सुरों के शत्रु के प्रसृत बाणों से सर्व प्रथम ऐसा अन्धकार हो गया था जिसने सूर्य के तेज के आलोक को भी तिरस्कृत कर
२६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दिया था ।५७। इसके पश्चात् बाणों के अत्यन्त संघट्ट से समुत्पन्न विस्फुलिंग हो गये थे फिर वे विस्फुलिंग इधर-उधर भ्रमण करने की चातुरी वाले हो गये थे ।५८। सुन्दर श्रोणी वाली उस देवी के द्वारा अधिरूढ़ गज जो रण कोलाहल नाम वाला था उसने उस संग्राम में बहुत प्रकार का पराक्रम प्रदर्शित किया था ।५९। उस गज ने भी कुछ असुरों को तो अपनी सूँड़ से और कुछ दैत्यों को अपने पदों की चोट से तथा कुछ को अपने तीक्ष्ण दाँतों के मुसलों की चोटों से मार डाला था ।६०। बालकांड से अन्यों को चोट दी थी तथा अन्यों को फेत्कारों के द्वारा शत्रु को निहत किया था। कुछ को अपने शरीर के द्वारा मर्दित किया था एवं अन्य शत्रुओं को अपने नखों के प्रहारों से मार डाला था ।६१। कुछ दैत्यों को उस गज ने पृथुमानाभिघात से विमर्दित कर दिया था। इस तरह से उस सम्पद्देवी के हाथी ने बहुत ही कौशल से पूर्ण अपना चरित दिखाया था ।६२। सुदुर्मद ने परमाधिक क्रोध से लाल होते हुए एक सुदृढ़ बाण से उस सम्पत्करी देवी के मुकट में स्थित एक मणि को गिरा दिया था ।६३।
अथ क्रोधारुणदृशा तया मुक्तैः शिलीमुखैः ।
विक्षतो वक्षसि क्षिप्रं दुर्मदो जीवितं जहौ ॥६४
ततः किलकिलारावं कृत्वा शक्तिचमूवरैः ।
तत्सैनिकवरास्त्वन्ये निहता दानवोत्तमाः ॥६५
हतावशिष्टा दैत्यास्तु शक्तिबाणैः खिलीकृताः ।
पलायिता रणक्षोण्याः शून्यकं पुरमाश्रयन् ॥६६
तद्वृत्तांतमथाकर्ण्य संक्रुद्धो दानवेश्वरः ॥६७
प्रचंडेन प्रभावेण दीप्यमान इवात्मनि ।
स पस्पर्श नियुद्धाय खड्गमुग्रविलोचनः ।
कुटिलाक्षं निकटगं बभाषे पृतनापतिम् ॥६८
कथं सा दुष्टवनिता दुर्मदं बलशालिनम् ।
निपातितवती युद्धे कष्ट एव विधेः क्रमः ॥६६
न सुरेषु न यक्षेषु नोरगेंद्रेषु यद्बलम् ।
अभूत्प्रतिहतं सोऽपि दुर्मदोऽबलया हतः ॥७०
दुर्मंद कुरंड वध वर्णन ] [ २६७
इसके अनन्तर क्रोध से लाल नेत्रों वाली उस देवी के द्वारा छोड़े हुए बाणों से शीघ्र ही वक्षः स्थल में विक्षत हुआ था और उस दुर्मंद ने अपने प्राणों को त्याग दिया था ।६४। इसके अनन्तर शक्ति की श्रेष्ठ सेनाओं ने किल-किल की ध्वनि की थी और उन्होंने उस दैत्य के जो परम श्रेष्ठ अन्य सैनिक दानव थे उन सबको मार गिराया था ।६५। मरने से बचे हुए जो भी दैत्य थे वे सब शक्ति के बाणों से चुटैल होकर उस रण की भूमि से भाग गये थे और शून्यक में जाकर छिप गये थे।६६। उनके द्वारा शक्तिद्वारा किये हुए युद्धके वृत्तान्त का श्रवण करके वह दानवेश्वर बहुत ही क्रुद्ध होगया था।६७। उदग्र नेत्रों वाला वह अपने प्रचण्ड प्रभाव से आत्मा से दीप्यमान जैसा हो गया था और उसने युद्ध करने के लिए अपने खड्ग को उठाया था । और उसने समीप में ही स्थित सेनापति कुटिलाक्ष से कहा था ।६८। किस प्रकार से उस महादुष्टा नारी ने बड़े भारी बल वाले दुर्मंद को युद्ध में मार गिराया है । यह विधाता का क्रम बड़ा कष्ट दायक है ।६६। ऐसा महान बल तो न देवों में है और न यक्षों में है और उरगेन्द्रों में भी ऐसा बल विद्यमान नहीं है वह तो ऐसा बलवान था कि उसका मारने वाला कोई भी नहीं था, वह दुर्मंद भी उस अबला के द्वारा मारा गया है ।७०।
तां दुष्टवनितां जेतुमाक्रष्टुं च कचं हठात् । सेनापति कुरंडाख्यं प्रेषयाहवदुर्मंदम् ॥७१
इति संप्रेषितस्तेन कुटिलाक्षो महाबलम् । कुरंडं चंडदोर्दण्डमाजुहाव प्रभोः पुरः ॥७२
स कुरंडः समागत्य प्रणामं स्वामिनेऽदिशत् । उवाच कुटिलाक्षस्तं गच्छ सज्जाय सैनिकान् ॥७३
मायायां चतुरोऽसि त्वं चित्रयुद्धविशारद । कूटयुद्धे च निपुणस्तां स्त्रियं परिमर्दय ॥७४
इति स्वामिपुरस्तेन कुटिलाक्षेण देशितः । निजंगाम पुरात्तूर्णं कुरंडंचण्डविक्रमः ॥७५
विंशत्यक्षौहिणीभिश्च समंतात्परिवारितः । मर्दयन्स महीगोलं हस्तिवाजिपदातिभिः । दुर्मंदस्याग्रजश्चंडः कुरंडः समरं ययौ ॥७६
२६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
धूलीभिस्तुमुलीकुर्वन्दिगंतं धीरमानसः । शोकरोषग्रहग्रस्तो जवनाश्वगतो ययौ ॥७७
अब उस परम दुष्टा नारी को जीतने के लिए और उसकी चोटी बल पूर्वक खींचकर लाने के लिए युद्ध के परम दुर्मद कुटिलाख्य सेनापति को शीघ्र मेरे पास भेज दो ।७१। इस प्रकार से उसने कुटिलाक्ष को भेजा था । महान बलवान प्रचण्ड बाहुओं वाले कुरण्ड को स्वामी के सामने बुलाया था ।७२। उस कुरण्ड ने वहाँ आकर स्वामी के लिए प्रणाम किया था और कुटिलाक्ष ने उससे कहा था कि जाओ और सैनिकों को तैयार करो ।७३। आप तो माया के फैला देने में बहुत चतुर हैं और विचित्र प्रकार के युद्ध करने में महान पंडित हैं और आप कूट युद्ध करने में भी बहुत निपुण हैं । अब जाकर उस नारी का परिमर्दन करो ।७४। इस तरह से स्वामी के ही आगे उस कुटिलाक्ष के द्वारा उसको आदेश दिया गया था । फिर वह चण्ड विक्रम वाला कुरण्ड शीघ्र ही नगर से निकलकर चला गया था ।७५। वह बीस अक्षौहिणी सेना से परिवृत था और अपने हाथी-अश्व तथा पैदल सैनिकों से इस भूमण्डल को वह मर्दित कर रहा था । दुर्मद का बड़ा भाई परम प्रचण्ड कुरण्ड युद्ध स्थल में गया था ।७६। वह धीर मन वाला जब युद्ध स्थल में गया तो इतनी धूलि उड़ने लगी थी कि सभी दिशाएं उससे भर गयी थी । वह शोक और रोष से भरा हुआ था और बड़े वेग वाले अश्व पर समारूढ़ होकर वहाँ पर गया था ।७७।
शाङ्गं धनुः समादाय घोरटंकारमुत्स्वनम् । ववर्ष शरधाराभिः संपत्कर्या महाचमूम् ॥७८ पापे मदनुजं हत्वा दुर्मदं युद्धदुर्मदम् । वृथा वहसि विक्रान्तिलवलेशं महामदम् ॥७६ इदानीं चैव भवतीमेतैर्नाराचमंडलैः । अंतकस्य पुरीमत्र प्रापयिष्यामि पश्य माम् ॥८० अतिहृद्यमतिस्वादु त्वद्वपुर्बिलनिर्गतम् । अपूर्वमंगनारक्तं पिबन्तु रणपूतनाः ॥८१ ममानुजवधोत्थस्य प्रत्यवायस्य तत्फलम् । अधुना भोक्ष्यसे दुष्टे पश्य मे भुजयोर्बलम् ॥८२
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २६६
इति संतर्ज्यन्संपत्करीं करिवरस्थिताम् । सैन्यं प्रोत्साहयामास शक्तिसेनाविमर्दने ॥८३ अथ तां पृतनां चण्डी कुरंडस्य महौजसः । विमर्दयितुमुद्युक्ता स्वसैन्यं प्रोदसीसहत् ॥८४
उसने परमाधिक ऊँची आवाज वाली टंकार से युक्त शाङ्गं धनुष लेकर सम्पत्करी की बड़ी भारी सेना पर शरों की धाराओं की वर्षा की थी ॥७८॥ उसने सम्पत्करी से कहा—हे पापे ! से युद्ध करने में दुर्मद मेरे छोटे भाई को हनन करके विक्रान्ति के लवलेश वाले इस महान मद को व्यर्थ ही कर रही है ॥७९॥ अब आपको मैं इन नाराचों के मण्डलों से यहीं पर यमराज की पुरी को पहुँचा दूँगा-अब तू मुझको देख ले ॥८०॥ ये रण पूतनाएँ तेरे अतीव स्वादिष्ट-रम्य-तेरे शरीर के बिलों से निकला हुआ-अपूर्व अङ्गना का रुधिर पान करें ॥८१॥ मेरे छोटे भाई के वध से जो तूने बड़ा अनर्थ किया है उसका यही परिणाम है। हे दुष्टे ! अब तू उस फल को भोगेगी और अब तू मेरी भुजाओं के बल को देख ले ॥८२॥ करिवर विराजमाना उस सम्पत्करी को इस प्रकार फटकारते हुए उसने अपनी सेना को शक्ति की सेना के विमर्दन करने के लिए प्रोत्साहन दिया था ॥८३॥ इसके पश्चात् उस चण्डी ने महान ओज वाले कुरण्ड की सेना का विमर्दन करने के लिए उद्युक्त होकर अपनी सेना को उत्साहित किया था ॥८४॥
अपूर्वाहिवसंजातकौतुकाथ जगाद ताम् । अश्वारूढा समागत्य सस्नेहाद्र्रमिदं वचः ॥८५ सखि संपत्करि प्रीत्या मम वाणी निशम्यताम् । अस्य युद्धमिदं देहि मम कर्तुं गुणोत्तरम् ॥८६ क्षणं सहस्व समरे मयैवैष नियोत्स्यते । याचितासि सखित्वेन नात्र संशयमाचर ॥८७ इति तस्या वचः श्रुत्वा संपद्देव्या शुचिस्मिता । निवर्तयामास चमू कुरण्डाभिमुखोत्थिताम् ॥८८ अथ बालार्कवर्णाभिः शक्तिभिः समधिष्ठिताः । तरंगा इव सैन्याब्धेस्तुरंगा वातरंहसः ॥८९
३०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
खरैः खुरपुटैः क्षोणीमुल्लिखंतो मुहुर्मुहुः । पेतुरेकप्रवाहेण कुरण्डस्य चमूमुखे ॥६० वल्गाविभागकृत्येषु संवर्तनविवर्तने । गतिभेदेषु चारेषु पञ्चधा खुरपातने ॥६१
उस अपूर्व युद्ध से समुत्पन्न कौतुक वाली अश्व पर समारूढ़ा होती हुई वहाँ आकर स्नेह के सहित यह वचन उससे बोली थी ।८५। हे सखि ! हे सम्पत्करि ! प्रीति से मेरी वाणी का श्रवण करो । इसके साथ युद्ध मुझे करने दो । मेरा युद्ध करना गुणोत्तर है ।८६। क्षणभर के लिए तुम शान्त हो जाओ । यह मेरे ही द्वारा युद्ध करेगा आप मेरी सखी हैं इसीलिए यह याचना मैंने की है । इसमें कुछ भी संशय मत करना ।८७। इस प्रकार के सम्पद्देवी के वचन का श्रवण कर उस शुचिस्मिता ने कुरुण्ड के समक्ष में उठी हुई सेना को वापिस कर दिया था ।८८। इसके उपरान्त बालसूर्य की आभा वाली शक्तियों से समधिष्ठित हुई थी । वायु के समान वेग वाले इसके अश्व समुद्र की तरङ्गों के ही समान थे ।८९। वे अश्व परम प्रखर खुरों के पुटों से भूमि को बार-२ उल्लिखित कर रहे थे और एक ही प्रवाह से उस कुरुण्ड की सेना के सामने आकर उपस्थित हो गये थे ।६०। वल्गा (लगाम) के विभाग कृत्यों में-सम्बर्त्तन और निवर्त्तन में—गतिभेदों में—चारों में पाँच प्रकार का उनके खुरों का पातन था ।६१।
प्रोत्साहने च संज्ञाभिः करपादाग्रयोनिभिः । चतुराभिस्तुरंगस्य हृदयज्ञाभिराहवे ॥६२ अश्वारूढांबिकासैन्यशक्तिभिः सह दानवाः । प्रोत्साहिताः कुरण्डेन समयुध्यंत दुर्मदाः ॥६३ एवं प्रवृत्ते समरे शक्तीनां च सुरद्विषाम् । अपराजितनामानं हयमारुह्य वेगिनम् । अभ्यद्रवद्दु राचारमश्वारूढाः कुरण्डकम् ॥६४ प्रचलद्वेणिसुभगा शरच्चन्द्रकलोज्ज्वला । संध्यानुरक्तशीतांशुमंडलीसुन्दरानना ॥६५ स्मयमानेव समरे गृहीत मणिकामुंका ।
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ ३०१
अवाकिरच्छरासारैः कुरण्ड तुरगानना ॥६६ तुरगारूढयोत्क्षिप्ताः समाक्रामन्दिगंतरान् । दिशो दश व्यानशिरे रुक्मपुङ्खाः शिलीमुखाः ॥६७ दुर्मदस्याग्रजः क्रुद्धः कुरण्डश्चण्डविक्रमः । विशिखैः शार्ङ्गनिष्ठ्यूतै रश्वारूढामवाकिरत् ॥६८
और नाम ले लेकर प्रोत्साहन देने में—कर पादाग्र योनियों से— चतुर और अश्वों के हृदयों के ज्ञान रखने वाली उस युद्ध में विद्यमान थीं ।६२। अश्व पर स्थित अम्बिका की सैन्य शक्तियों के साथ दानव करण्ड के द्वारा प्रोत्साहित दुर्मद दानव युद्ध कर रहे थे ।६३। इस प्रकार से शक्तियों का और सुरद्विषों का युद्ध प्रवृत्त होने पर अपराजित नाम वाले तथा अत्य- धिक वेग य युक्त अश्व पर समारूढ़ होकर उस दुष्ट आचार वाले कुरण्ड के ऊपर अश्वारूढ़ा ने आक्रमण किया था ।६४। उसकी चोटी हिलने से परम सुभगा थी तथा शरत्काल के चन्द्रमा को कला के समान ही अत्यन्त उज्ज्वल थी । सन्ध्या के समय में अनुरक्त चन्द्र के मंडल के समान सुन्दर मुख वाली थी ।६५। वह समर में भी स्मित से समन्वित थी तथा उसने मणियों से विनिर्मित धनुष को ग्रहण कर रक्खा था । उस तुरगानना ने उस कुरण्ड के ऊपर बाणों की धाराओं से उसे अवकीर्ण कर दिया था ।६६। तुरगारूढा के द्वारा प्रक्षिप्त बाणों ने दिशाओं के अन्तरों को भी समाक्रान्त कर दिया था । जिनमें सुवर्ण के पुङ्ख थे ऐसे शर दशों दिशाओं में फैल गये थे ।६७। परम प्रचण्ड विक्रम वाला वह कुरण्ड अपने छोटे भाई दुर्मद का जो अग्रज था उसने भी अपने शार्ङ्ग से फेंके हुए बाणों से उस अश्वारूढ़ा की ढक दिया था ।६८।
चण्डैः खुरपुटैः सैन्यं खण्डयन्नतिवेगतः । अश्वारूढा तुरङ्गोऽपि मर्दयामास दानवान् ॥६९ तस्य हेषारवाद्दूरमुत्पातांबुधिनिः स्वनः । अमूर्च्छयन्ननेकानि तस्यानीतानि वैरिणः ॥१०० इतस्ततः प्रचलतिदैत्यचक्रे ह्यासना । निजं पाशायुधं दिव्यं मुमोच ज्वलिताकृति ॥१०१ तस्मात्पाशात्कोटिशोऽन्ये पाशा भुजगभीषणाः ।
३०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
समस्तमपि तत्सैन्यं बद्धाबद्धा व्यमूर्च्छयन् ॥१०२ अथ सैनिकबन्धेन क्रुद्धः स च कुरंडकः । शरेणैकेन चिच्छेद तस्या मणिधनुर्गुणम् ॥१०३ छिन्नमौर्वि धनुस्त्यक्त्वा भृशं क्रुद्धा हयासना । अंकुशं पातयामास तस्य वक्षसि दुर्मतेः ॥१०४ तेनांकुशेन ज्वलता पीतजीवितशोणितः । कुरुण्डो न्यपतद्भूमौ वज्ररुग्ण इव द्रुमः ॥१०५
उस अश्वारूढ़ा का जो अश्व था उसने भी अपने प्रचंड खुरों के पुटों के द्वारा अत्यन्त वेग से शत्रु की सेना का खंडन करते हुए दानवों का बहुत अधिक मर्दन किया था ।६६। उस अश्व की हिनहिनाहट की ध्वनि बहुत दूर तक उत्पात से समुद्र की ध्वनि के ही तुल्य थी । उस घोष ने भी वैरी के द्वारा लाये हुए सैन्यों को जो बहुत अधिक थे सबको मूच्छित कर दिया था ।१००। उस हयासना ने उस दैत्यों के चक्र में जो भी इधर-उधर प्रचलित थे उन पर अपना पाशायुध जो जाज्वल्यमान आकृति वाला तथा परम दिव्यथा छोड़ दियाथा ।१०१। उस पाश से करोड़ों अन्य भुजङ्गोंके समान भीषण पाश निकले थे । जिन्होंने उस दैत्य की सम्पूर्ण सेना को बाँध-बाँध कर विशेष रूप से मूच्छित कर दिया था ।१०२। इसके अनन्तर सैनिकों के बन्धन से वह कुरण्ड बहुत ही अधिक क्रुद्ध हो गया था और उसने अपने एक वाण से उस अश्वारूढ़ा के मणियों के धनुष की मोर्वी को काट डाला था ।१०३। जिस धनुष की मोर्वी कट गयी थी उस धनुष को उसने त्याग दिया था और वह हयानना अत्यन्त ही क्रुद्ध हो गयी थी । फिर उसने उस दुष्ट मति वाले के वक्षःस्थल में अपना अंकुश डाला था ।१०४। जलते हुए उस अंकुश से जिसके जीवित रहते हुए ही रुधिर पी लिया गया था वह कुरण्ड वज्र से छिन्न द्रुम के ही समान भूमि पर गिर गया था ।१०५।
तदंकुशविनिष्ठ्यूताः पूतनाः काश्चिदुद्भटाः । तत्सैन्यं पाशनिष्यंदं भक्षयित्वा क्षयं गताः ॥१०६ इत्थं कुरुण्डे निहते विंशत्यक्षौहिणीपतौ । हतावशिष्टास्ते दैत्याः प्रपलायंत वै द्रुतम् ॥१०७
करंकादि पंच सेनापति-वध ] [ ३०३
कुरुण्डं सानुजं युद्धे शक्तिसैन्यैर्निपातितम् ।
श्रुत्वा शून्यकनाथोऽपि निशश्वास भुजंगवत् ॥१०८
उस अंकुश से निकली हुई कुछ परम उद्भट पूतनाएं उसकी सेना के पाश से निष्यन्द भक्षण करके क्षय को प्राप्त हो गयीं थीं ।१०६। बीस अक्षौहिणी सेनाओं के स्वामी उस कुरुण्ड के इस प्रकार से निहत हो जाने पर जो भी मरने से बचे हुए दैत्यगण थे वे शीघ्र ही वहाँ से भाग गये थे । उस युद्ध में छोटे भाई के साथ कुरुण्ड को शक्ति की सेनाओं ने मार डाला था । जब यह वृत्तान्त शून्य पुर के स्वामी ने सुना था तो वह भी भुजंग के ही तुल्य लम्बी श्वास लेने लगा था ।१०७-१०८।
करंकादि पंच सेनापति वध
अथाश्वारूढया क्षिप्ते कुरुण्डे भंडदानवः ।
कुटिलाक्षमिदं प्रोचे पुनरेव युयुत्सया ॥१
स्वप्नेऽपि यन्न संभाव्यं यन्न श्रुतमितः पुरा ।
यच्च नो शंकितं चित्ते तदेतत्कष्टमागतम् ॥२
कुरुण्डदुर्मदौ सत्त्वशालिनौ भ्रातरौ हतौ ।
दुष्टदास्याः प्रभावोऽयं मायाविन्या महत्तरः ॥३
इतः परं करंकादीन्पंचसेनाधिनायकान् ।
शतमक्षौहिणीनां च प्रस्थापय रणांगणे ॥४
ते युद्धदुर्मदाः शूराः संग्रामेषु तनुत्यजः ।
सर्वथैव विजेष्यंते दुर्विदग्धविलासिनीम् ॥५
इति भंडवचः श्रुत्वा भृशं च त्वरयान्वितः ।
कुटिलाक्षः करंकादीनाजुहाव चमूपतीन् ॥६
ते स्वामिनं नमस्कृत्य कुटिलाक्षेण देशिताः ।
अग्नौ प्रविष्णव इव क्रोधांधा निर्ययुः पुरात् ॥७
इसके अनन्तर जब अश्वारूढ़ा के द्वारा कुरुण्ड हत हो गया था तो भंड दानव ने पुनः युद्ध करने की इच्छा से कुटिलाक्ष से यह वचन कहा था ।
३०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।१। जिसकी कभी स्वप्न में भी सम्भावना नहीं की जा सकती है और पहिले इसके कभी जो सुना भी नहीं गया था और जिसकी चित्त में कभी शंका भी नहीं की गयी थी वही यह कष्ट इस समय में आ पड़ा है ।२। कुरण्ड और दुर्मद ये दोनों ही बहुत सत्व शाली भाई थे । इस मायाविनी दुष्ट दासी का कितना अधिक बड़ा प्रभाव है ।३। अब रणाङ्गन में यहाँ से आगे करंक प्रभृति पांच सेनाधिनायकों को और अक्षौहिणी सेना को रवाना कर दो ।४। वे शूर बहुत ही युद्ध में दुर्मद हैं और संग्रामों में अपने शरीर का त्याग करने वाले हैं । ये लोग पूर्ण रूप से ही उस दुर्विदग्ध विलासिनी को अवश्य जीत लेंगे ।५। इस भंड के वचन को सुनकर अत्यन्त शीघ्रता से युक्त होकर कुटिलाक्ष ने करंक आदि सेनापतियों को वहाँ पर बुला लिया था ।६। कुटिलाक्ष के द्वारा देशित उन्होंने अपने स्वामी को प्रणाम किया था और फिर वे इतने अधिक क्रोधान्ध हो गये थे मानों अग्नि में ही से समुत्पन्न हुए होवें । वे सब फिर उस पुर से युद्ध के लिए निकल कर चले गये थे ।७।
तेषां प्रयाणनिःसाणरणितं भृशदुःसहम् ।
आकर्ण्य दिग्गजास्तूर्णं शीर्णकर्णा जुघूर्णिरे ॥८
शतमक्षौहिणीनां च प्राचलत्केतुमालकम् ।
उत्तरंगत्तुरंगादि बभौ मत्तमत्तंगजम् ॥९
ह्रेषमाणहयाकीर्णं क्रन्दद्रूटकुलोद्भवम् ।
बृंहमाणगजं गर्जद्रथचक्रं चचाल तत् ॥१०
चक्रनेमिहतक्षोणीरेणुक्षपितरोचिषा ।
बभूव तुहिनासारच्छन्नेनेव विवस्वता ॥११
धूलीमयमिवाशेषमभवद्विश्वमंडलम् ।
क्वचिच्छब्दमयं चैव निःसाणकठिनस्वनैः ॥१२
उद्भूतैर्धूलिकाजालैराक्रांता दैत्यसैनिकाः ।
इयत्तयातः सेनायाः संख्यापि परिभाविता ॥१३
ध्वजा बहुविधाकारा मीनव्यालादिचित्रिताः ।
प्रचेलुर्धूलिकाजाले मत्स्या इव महोदधौ ॥१४
उनके प्रयाण का निःसाण रणित अत्यन्त ही दुस्सह था । दिग्गजों ने भी जब उसको सुना था वे भी शीर्ण कानों वाले होते हुए घूर्णित हो गये
करंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३०५
थे ॥८॥ सौ अक्षौहिणी सेनाओं के झण्डों की मालाएँ फहरा रही थीं और उस सेना में बड़े ऊँचे अश्व थे तथा मदमत्त हाथी भी उसमें थे ॥६॥ वह सेना ऐसी थी कि उसमें हिनहिनाने वाले अश्वों की धूम थी तथा उसमें चीखते हुए भटों का समुदाय भी था—एवं बड़े-बड़े विशालकाय हाथी थे और गर्जना करते हुए रथों का समुदाय था ऐसी वह सेना वहाँ से रवाना हुई थी ॥१०॥ रथों के पहियों से खुदी हुई पृथ्वी की रेणु से जिसकी कान्ति ढक गयी थी ऐसा सूर्य उस समय में ऐसा ही दिखलाई दे रहा था मानों तुहिनासार से ढक गया हो अर्थात् कुहरा में छिप गया होवे ॥११॥ यह पूर्ण विश्व का मंडल ही धूलि से परिपूर्ण हो गया था। उस सेना के निर्गमन की कठोर ध्वनि से चारों ओर घोष ही घोष व्याप्त हो रहा था ॥१२॥ उस समय में धूलि के ऐसे जाल छा गये थे कि समस्त दैत्यों के सैनिक इस धूलि से समाक्रान्त हो गये थे अर्थात् सभी धूलि से भर गये थे। अतएव इयत्ता से उसकी संख्या भी परिभावित थी ॥१३॥ उस सेना में बहुत प्रकार की ध्वजायें थीं जो मीन तथा व्याल आदि से चित्रित हो रही थीं। वे सभी सेनाएं उस धूलि से परिपूर्ण जाल में महोदधि में मत्स्यों के तुल्य चल रही थी ॥१४॥
तानापतत आलोक्य ललितासैनिकं प्रति ।
वित्र्रेसुरमराः सर्वे शक्तीनां भङ्गशङ्कया ॥१५
ते करङ्कमुखाः पञ्च सेनापतय उद्धताः ।
सर्पिणीं नाम समरे मायां चक्रु र्महीयसीम् ॥१६
तैः समुत्पतिता दृष्टा सर्पिणी रणशांबरी ।
धूम्रवर्णा च धूम्रोष्ठी धूम्रवर्णपयोधरा ॥१७
महोदधिरिवात्यंतं गंभीरकुहरोदरी ।
पुरश्चचाल शक्तीनां त्रायंती मनो रणे ॥१८
कद्रूरिवापरा दृष्टा बहुसर्पविभूषणा ।
सर्पाणामुद्भवस्थानं मायामयशरीरिणाम् ॥१९
सेनापतीनां नासीरे वेल्लयंती महीतले ।
वेल्लितं बहुधा चक्रे घोरारावविराविणी ॥२०
तथैव मायया पूर्वं तेऽसुरेंद्रा व्यजीजयन् ।
करंकाद्या दुरात्मानः पञ्चपञ्चत्वकामुकाः ॥२१
३०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जिस समय में इतनी विशाल सेनाएं धावा करने के लिए ललिता देवी के सैनिक की ओर आ रही थीं तो सभी देवगण शक्तियों के भङ्ग की शंका से डर गये थे ॥१५॥ वे करंक जिनमें प्रमुख था पाँचों सेनापति गण बहुत ही उद्धत थे । उन्होंने सर्पिणी नाम वाली एक महती माया को उस समर स्थल में किया था ॥१६॥ उनके द्वारा उठी हुई वह दुष्टा रणशाम्बरी सर्पिणी धूम्र वर्ण की थी । उसके होठ भी धूम्र वर्ण के ही थे और धूम्र ही उसके पयोधर थे ॥१७॥ वह महासागर के ही तुल्य अत्यन्त गम्भीर कुहर उदर वाली थी । वह रणस्थल में मन को भयभीत करती हुई ही शक्तियों के आगे चली थी ॥१८॥ वह बहुत से सर्पों के भूषण वाली दूसरी कद्रू के ही समान थी और बहुत ही दुष्टा थी । वह माया से परिपूर्ण सर्पों के जनन का स्थान थी ॥१६॥ सेनापतियों के नासीर में महीतल को वेल्लित करती हुई वह जा रही थी । उसका महान घोर शब्द था जिसको वह कर रही थी और प्रायः उसने उस चक्र को वेल्लित सा कर दिया था ॥२०॥ वे पाँचों सेनापति भी पञ्चत्व (मृत्यु) के ही कामुक थे और वे करंक आदि सब बहुत ही दुरात्मा थे । उसी भाँति से माया के साथ पूर्व में सब असुरेन्द्र अजित हो रहे थे ॥२१॥
अथ प्रवृत्ते युद्धं शक्तीनाममरद्रुहाम् ।
अन्योन्यवीरभाषाभिः प्रोत्साहितघनक्रुधाम् ॥२२
अत्यंतसंकुलतया न विज्ञातपरस्पराः ।
शक्तयो दानवश्चैव प्रजह्रुः शस्त्रपाणयः ॥२३
अन्योन्यशस्त्रसंघट्टसमुत्थितहुताशने ।
प्रवृत्तविशिखस्रोतः प्रच्छन्नहरिदन्तरे ॥२४
बहुरक्तनदीपूरह्रियमाणमतंगजे ।
मांसकदमनिर्मग्ननिष्पंदरथमंडले ॥२५
विकीर्णकेशशैवालविलसद्रक्तनिर्झरे ।
अतिनिष्ठुरविध्वंसि सिंहनादभयङ्करे ॥२६
रजोऽन्धकारतुमुले राक्षसीतृप्तिदायिनि ।
शस्त्रीशरीरविच्छिन्न दैत्यकंठोत्थितासृजि ॥२७