संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २६६
इति संतर्ज्यन्संपत्करीं करिवरस्थिताम् । सैन्यं प्रोत्साहयामास शक्तिसेनाविमर्दने ॥८३ अथ तां पृतनां चण्डी कुरंडस्य महौजसः । विमर्दयितुमुद्युक्ता स्वसैन्यं प्रोदसीसहत् ॥८४
उसने परमाधिक ऊँची आवाज वाली टंकार से युक्त शाङ्गं धनुष लेकर सम्पत्करी की बड़ी भारी सेना पर शरों की धाराओं की वर्षा की थी ॥७८॥ उसने सम्पत्करी से कहा—हे पापे ! से युद्ध करने में दुर्मद मेरे छोटे भाई को हनन करके विक्रान्ति के लवलेश वाले इस महान मद को व्यर्थ ही कर रही है ॥७९॥ अब आपको मैं इन नाराचों के मण्डलों से यहीं पर यमराज की पुरी को पहुँचा दूँगा-अब तू मुझको देख ले ॥८०॥ ये रण पूतनाएँ तेरे अतीव स्वादिष्ट-रम्य-तेरे शरीर के बिलों से निकला हुआ-अपूर्व अङ्गना का रुधिर पान करें ॥८१॥ मेरे छोटे भाई के वध से जो तूने बड़ा अनर्थ किया है उसका यही परिणाम है। हे दुष्टे ! अब तू उस फल को भोगेगी और अब तू मेरी भुजाओं के बल को देख ले ॥८२॥ करिवर विराजमाना उस सम्पत्करी को इस प्रकार फटकारते हुए उसने अपनी सेना को शक्ति की सेना के विमर्दन करने के लिए प्रोत्साहन दिया था ॥८३॥ इसके पश्चात् उस चण्डी ने महान ओज वाले कुरण्ड की सेना का विमर्दन करने के लिए उद्युक्त होकर अपनी सेना को उत्साहित किया था ॥८४॥
अपूर्वाहिवसंजातकौतुकाथ जगाद ताम् । अश्वारूढा समागत्य सस्नेहाद्र्रमिदं वचः ॥८५ सखि संपत्करि प्रीत्या मम वाणी निशम्यताम् । अस्य युद्धमिदं देहि मम कर्तुं गुणोत्तरम् ॥८६ क्षणं सहस्व समरे मयैवैष नियोत्स्यते । याचितासि सखित्वेन नात्र संशयमाचर ॥८७ इति तस्या वचः श्रुत्वा संपद्देव्या शुचिस्मिता । निवर्तयामास चमू कुरण्डाभिमुखोत्थिताम् ॥८८ अथ बालार्कवर्णाभिः शक्तिभिः समधिष्ठिताः । तरंगा इव सैन्याब्धेस्तुरंगा वातरंहसः ॥८९