भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

खरैः खुरपुटैः क्षोणीमुल्लिखंतो मुहुर्मुहुः । पेतुरेकप्रवाहेण कुरण्डस्य चमूमुखे ॥६० वल्गाविभागकृत्येषु संवर्तनविवर्तने । गतिभेदेषु चारेषु पञ्चधा खुरपातने ॥६१

उस अपूर्व युद्ध से समुत्पन्न कौतुक वाली अश्व पर समारूढ़ा होती हुई वहाँ आकर स्नेह के सहित यह वचन उससे बोली थी ।८५। हे सखि ! हे सम्पत्करि ! प्रीति से मेरी वाणी का श्रवण करो । इसके साथ युद्ध मुझे करने दो । मेरा युद्ध करना गुणोत्तर है ।८६। क्षणभर के लिए तुम शान्त हो जाओ । यह मेरे ही द्वारा युद्ध करेगा आप मेरी सखी हैं इसीलिए यह याचना मैंने की है । इसमें कुछ भी संशय मत करना ।८७। इस प्रकार के सम्पद्देवी के वचन का श्रवण कर उस शुचिस्मिता ने कुरुण्ड के समक्ष में उठी हुई सेना को वापिस कर दिया था ।८८। इसके उपरान्त बालसूर्य की आभा वाली शक्तियों से समधिष्ठित हुई थी । वायु के समान वेग वाले इसके अश्व समुद्र की तरङ्गों के ही समान थे ।८९। वे अश्व परम प्रखर खुरों के पुटों से भूमि को बार-२ उल्लिखित कर रहे थे और एक ही प्रवाह से उस कुरुण्ड की सेना के सामने आकर उपस्थित हो गये थे ।६०। वल्गा (लगाम) के विभाग कृत्यों में-सम्बर्त्तन और निवर्त्तन में—गतिभेदों में—चारों में पाँच प्रकार का उनके खुरों का पातन था ।६१।

प्रोत्साहने च संज्ञाभिः करपादाग्रयोनिभिः । चतुराभिस्तुरंगस्य हृदयज्ञाभिराहवे ॥६२ अश्वारूढांबिकासैन्यशक्तिभिः सह दानवाः । प्रोत्साहिताः कुरण्डेन समयुध्यंत दुर्मदाः ॥६३ एवं प्रवृत्ते समरे शक्तीनां च सुरद्विषाम् । अपराजितनामानं हयमारुह्य वेगिनम् । अभ्यद्रवद्दु राचारमश्वारूढाः कुरण्डकम् ॥६४ प्रचलद्वेणिसुभगा शरच्चन्द्रकलोज्ज्वला । संध्यानुरक्तशीतांशुमंडलीसुन्दरानना ॥६५ स्मयमानेव समरे गृहीत मणिकामुंका ।