संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
धूलीभिस्तुमुलीकुर्वन्दिगंतं धीरमानसः । शोकरोषग्रहग्रस्तो जवनाश्वगतो ययौ ॥७७
अब उस परम दुष्टा नारी को जीतने के लिए और उसकी चोटी बल पूर्वक खींचकर लाने के लिए युद्ध के परम दुर्मद कुटिलाख्य सेनापति को शीघ्र मेरे पास भेज दो ।७१। इस प्रकार से उसने कुटिलाक्ष को भेजा था । महान बलवान प्रचण्ड बाहुओं वाले कुरण्ड को स्वामी के सामने बुलाया था ।७२। उस कुरण्ड ने वहाँ आकर स्वामी के लिए प्रणाम किया था और कुटिलाक्ष ने उससे कहा था कि जाओ और सैनिकों को तैयार करो ।७३। आप तो माया के फैला देने में बहुत चतुर हैं और विचित्र प्रकार के युद्ध करने में महान पंडित हैं और आप कूट युद्ध करने में भी बहुत निपुण हैं । अब जाकर उस नारी का परिमर्दन करो ।७४। इस तरह से स्वामी के ही आगे उस कुटिलाक्ष के द्वारा उसको आदेश दिया गया था । फिर वह चण्ड विक्रम वाला कुरण्ड शीघ्र ही नगर से निकलकर चला गया था ।७५। वह बीस अक्षौहिणी सेना से परिवृत था और अपने हाथी-अश्व तथा पैदल सैनिकों से इस भूमण्डल को वह मर्दित कर रहा था । दुर्मद का बड़ा भाई परम प्रचण्ड कुरण्ड युद्ध स्थल में गया था ।७६। वह धीर मन वाला जब युद्ध स्थल में गया तो इतनी धूलि उड़ने लगी थी कि सभी दिशाएं उससे भर गयी थी । वह शोक और रोष से भरा हुआ था और बड़े वेग वाले अश्व पर समारूढ़ होकर वहाँ पर गया था ।७७।
शाङ्गं धनुः समादाय घोरटंकारमुत्स्वनम् । ववर्ष शरधाराभिः संपत्कर्या महाचमूम् ॥७८ पापे मदनुजं हत्वा दुर्मदं युद्धदुर्मदम् । वृथा वहसि विक्रान्तिलवलेशं महामदम् ॥७६ इदानीं चैव भवतीमेतैर्नाराचमंडलैः । अंतकस्य पुरीमत्र प्रापयिष्यामि पश्य माम् ॥८० अतिहृद्यमतिस्वादु त्वद्वपुर्बिलनिर्गतम् । अपूर्वमंगनारक्तं पिबन्तु रणपूतनाः ॥८१ ममानुजवधोत्थस्य प्रत्यवायस्य तत्फलम् । अधुना भोक्ष्यसे दुष्टे पश्य मे भुजयोर्बलम् ॥८२