संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
धूलीभिस्तुमुलीकुर्वन्दिगंतं धीरमानसः । शोकरोषग्रहग्रस्तो जवनाश्वगतो ययौ ॥७७
अब उस परम दुष्टा नारी को जीतने के लिए और उसकी चोटी बल पूर्वक खींचकर लाने के लिए युद्ध के परम दुर्मद कुटिलाख्य सेनापति को शीघ्र मेरे पास भेज दो ।७१। इस प्रकार से उसने कुटिलाक्ष को भेजा था । महान बलवान प्रचण्ड बाहुओं वाले कुरण्ड को स्वामी के सामने बुलाया था ।७२। उस कुरण्ड ने वहाँ आकर स्वामी के लिए प्रणाम किया था और कुटिलाक्ष ने उससे कहा था कि जाओ और सैनिकों को तैयार करो ।७३। आप तो माया के फैला देने में बहुत चतुर हैं और विचित्र प्रकार के युद्ध करने में महान पंडित हैं और आप कूट युद्ध करने में भी बहुत निपुण हैं । अब जाकर उस नारी का परिमर्दन करो ।७४। इस तरह से स्वामी के ही आगे उस कुटिलाक्ष के द्वारा उसको आदेश दिया गया था । फिर वह चण्ड विक्रम वाला कुरण्ड शीघ्र ही नगर से निकलकर चला गया था ।७५। वह बीस अक्षौहिणी सेना से परिवृत था और अपने हाथी-अश्व तथा पैदल सैनिकों से इस भूमण्डल को वह मर्दित कर रहा था । दुर्मद का बड़ा भाई परम प्रचण्ड कुरण्ड युद्ध स्थल में गया था ।७६। वह धीर मन वाला जब युद्ध स्थल में गया तो इतनी धूलि उड़ने लगी थी कि सभी दिशाएं उससे भर गयी थी । वह शोक और रोष से भरा हुआ था और बड़े वेग वाले अश्व पर समारूढ़ होकर वहाँ पर गया था ।७७।
शाङ्गं धनुः समादाय घोरटंकारमुत्स्वनम् । ववर्ष शरधाराभिः संपत्कर्या महाचमूम् ॥७८ पापे मदनुजं हत्वा दुर्मदं युद्धदुर्मदम् । वृथा वहसि विक्रान्तिलवलेशं महामदम् ॥७६ इदानीं चैव भवतीमेतैर्नाराचमंडलैः । अंतकस्य पुरीमत्र प्रापयिष्यामि पश्य माम् ॥८० अतिहृद्यमतिस्वादु त्वद्वपुर्बिलनिर्गतम् । अपूर्वमंगनारक्तं पिबन्तु रणपूतनाः ॥८१ ममानुजवधोत्थस्य प्रत्यवायस्य तत्फलम् । अधुना भोक्ष्यसे दुष्टे पश्य मे भुजयोर्बलम् ॥८२
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २६६
इति संतर्ज्यन्संपत्करीं करिवरस्थिताम् । सैन्यं प्रोत्साहयामास शक्तिसेनाविमर्दने ॥८३ अथ तां पृतनां चण्डी कुरंडस्य महौजसः । विमर्दयितुमुद्युक्ता स्वसैन्यं प्रोदसीसहत् ॥८४
उसने परमाधिक ऊँची आवाज वाली टंकार से युक्त शाङ्गं धनुष लेकर सम्पत्करी की बड़ी भारी सेना पर शरों की धाराओं की वर्षा की थी ॥७८॥ उसने सम्पत्करी से कहा—हे पापे ! से युद्ध करने में दुर्मद मेरे छोटे भाई को हनन करके विक्रान्ति के लवलेश वाले इस महान मद को व्यर्थ ही कर रही है ॥७९॥ अब आपको मैं इन नाराचों के मण्डलों से यहीं पर यमराज की पुरी को पहुँचा दूँगा-अब तू मुझको देख ले ॥८०॥ ये रण पूतनाएँ तेरे अतीव स्वादिष्ट-रम्य-तेरे शरीर के बिलों से निकला हुआ-अपूर्व अङ्गना का रुधिर पान करें ॥८१॥ मेरे छोटे भाई के वध से जो तूने बड़ा अनर्थ किया है उसका यही परिणाम है। हे दुष्टे ! अब तू उस फल को भोगेगी और अब तू मेरी भुजाओं के बल को देख ले ॥८२॥ करिवर विराजमाना उस सम्पत्करी को इस प्रकार फटकारते हुए उसने अपनी सेना को शक्ति की सेना के विमर्दन करने के लिए प्रोत्साहन दिया था ॥८३॥ इसके पश्चात् उस चण्डी ने महान ओज वाले कुरण्ड की सेना का विमर्दन करने के लिए उद्युक्त होकर अपनी सेना को उत्साहित किया था ॥८४॥
अपूर्वाहिवसंजातकौतुकाथ जगाद ताम् । अश्वारूढा समागत्य सस्नेहाद्र्रमिदं वचः ॥८५ सखि संपत्करि प्रीत्या मम वाणी निशम्यताम् । अस्य युद्धमिदं देहि मम कर्तुं गुणोत्तरम् ॥८६ क्षणं सहस्व समरे मयैवैष नियोत्स्यते । याचितासि सखित्वेन नात्र संशयमाचर ॥८७ इति तस्या वचः श्रुत्वा संपद्देव्या शुचिस्मिता । निवर्तयामास चमू कुरण्डाभिमुखोत्थिताम् ॥८८ अथ बालार्कवर्णाभिः शक्तिभिः समधिष्ठिताः । तरंगा इव सैन्याब्धेस्तुरंगा वातरंहसः ॥८९
३०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
खरैः खुरपुटैः क्षोणीमुल्लिखंतो मुहुर्मुहुः । पेतुरेकप्रवाहेण कुरण्डस्य चमूमुखे ॥६० वल्गाविभागकृत्येषु संवर्तनविवर्तने । गतिभेदेषु चारेषु पञ्चधा खुरपातने ॥६१
उस अपूर्व युद्ध से समुत्पन्न कौतुक वाली अश्व पर समारूढ़ा होती हुई वहाँ आकर स्नेह के सहित यह वचन उससे बोली थी ।८५। हे सखि ! हे सम्पत्करि ! प्रीति से मेरी वाणी का श्रवण करो । इसके साथ युद्ध मुझे करने दो । मेरा युद्ध करना गुणोत्तर है ।८६। क्षणभर के लिए तुम शान्त हो जाओ । यह मेरे ही द्वारा युद्ध करेगा आप मेरी सखी हैं इसीलिए यह याचना मैंने की है । इसमें कुछ भी संशय मत करना ।८७। इस प्रकार के सम्पद्देवी के वचन का श्रवण कर उस शुचिस्मिता ने कुरुण्ड के समक्ष में उठी हुई सेना को वापिस कर दिया था ।८८। इसके उपरान्त बालसूर्य की आभा वाली शक्तियों से समधिष्ठित हुई थी । वायु के समान वेग वाले इसके अश्व समुद्र की तरङ्गों के ही समान थे ।८९। वे अश्व परम प्रखर खुरों के पुटों से भूमि को बार-२ उल्लिखित कर रहे थे और एक ही प्रवाह से उस कुरुण्ड की सेना के सामने आकर उपस्थित हो गये थे ।६०। वल्गा (लगाम) के विभाग कृत्यों में-सम्बर्त्तन और निवर्त्तन में—गतिभेदों में—चारों में पाँच प्रकार का उनके खुरों का पातन था ।६१।
प्रोत्साहने च संज्ञाभिः करपादाग्रयोनिभिः । चतुराभिस्तुरंगस्य हृदयज्ञाभिराहवे ॥६२ अश्वारूढांबिकासैन्यशक्तिभिः सह दानवाः । प्रोत्साहिताः कुरण्डेन समयुध्यंत दुर्मदाः ॥६३ एवं प्रवृत्ते समरे शक्तीनां च सुरद्विषाम् । अपराजितनामानं हयमारुह्य वेगिनम् । अभ्यद्रवद्दु राचारमश्वारूढाः कुरण्डकम् ॥६४ प्रचलद्वेणिसुभगा शरच्चन्द्रकलोज्ज्वला । संध्यानुरक्तशीतांशुमंडलीसुन्दरानना ॥६५ स्मयमानेव समरे गृहीत मणिकामुंका ।
दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ ३०१
अवाकिरच्छरासारैः कुरण्ड तुरगानना ॥६६ तुरगारूढयोत्क्षिप्ताः समाक्रामन्दिगंतरान् । दिशो दश व्यानशिरे रुक्मपुङ्खाः शिलीमुखाः ॥६७ दुर्मदस्याग्रजः क्रुद्धः कुरण्डश्चण्डविक्रमः । विशिखैः शार्ङ्गनिष्ठ्यूतै रश्वारूढामवाकिरत् ॥६८
और नाम ले लेकर प्रोत्साहन देने में—कर पादाग्र योनियों से— चतुर और अश्वों के हृदयों के ज्ञान रखने वाली उस युद्ध में विद्यमान थीं ।६२। अश्व पर स्थित अम्बिका की सैन्य शक्तियों के साथ दानव करण्ड के द्वारा प्रोत्साहित दुर्मद दानव युद्ध कर रहे थे ।६३। इस प्रकार से शक्तियों का और सुरद्विषों का युद्ध प्रवृत्त होने पर अपराजित नाम वाले तथा अत्य- धिक वेग य युक्त अश्व पर समारूढ़ होकर उस दुष्ट आचार वाले कुरण्ड के ऊपर अश्वारूढ़ा ने आक्रमण किया था ।६४। उसकी चोटी हिलने से परम सुभगा थी तथा शरत्काल के चन्द्रमा को कला के समान ही अत्यन्त उज्ज्वल थी । सन्ध्या के समय में अनुरक्त चन्द्र के मंडल के समान सुन्दर मुख वाली थी ।६५। वह समर में भी स्मित से समन्वित थी तथा उसने मणियों से विनिर्मित धनुष को ग्रहण कर रक्खा था । उस तुरगानना ने उस कुरण्ड के ऊपर बाणों की धाराओं से उसे अवकीर्ण कर दिया था ।६६। तुरगारूढा के द्वारा प्रक्षिप्त बाणों ने दिशाओं के अन्तरों को भी समाक्रान्त कर दिया था । जिनमें सुवर्ण के पुङ्ख थे ऐसे शर दशों दिशाओं में फैल गये थे ।६७। परम प्रचण्ड विक्रम वाला वह कुरण्ड अपने छोटे भाई दुर्मद का जो अग्रज था उसने भी अपने शार्ङ्ग से फेंके हुए बाणों से उस अश्वारूढ़ा की ढक दिया था ।६८।
चण्डैः खुरपुटैः सैन्यं खण्डयन्नतिवेगतः । अश्वारूढा तुरङ्गोऽपि मर्दयामास दानवान् ॥६९ तस्य हेषारवाद्दूरमुत्पातांबुधिनिः स्वनः । अमूर्च्छयन्ननेकानि तस्यानीतानि वैरिणः ॥१०० इतस्ततः प्रचलतिदैत्यचक्रे ह्यासना । निजं पाशायुधं दिव्यं मुमोच ज्वलिताकृति ॥१०१ तस्मात्पाशात्कोटिशोऽन्ये पाशा भुजगभीषणाः ।
३०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
समस्तमपि तत्सैन्यं बद्धाबद्धा व्यमूर्च्छयन् ॥१०२ अथ सैनिकबन्धेन क्रुद्धः स च कुरंडकः । शरेणैकेन चिच्छेद तस्या मणिधनुर्गुणम् ॥१०३ छिन्नमौर्वि धनुस्त्यक्त्वा भृशं क्रुद्धा हयासना । अंकुशं पातयामास तस्य वक्षसि दुर्मतेः ॥१०४ तेनांकुशेन ज्वलता पीतजीवितशोणितः । कुरुण्डो न्यपतद्भूमौ वज्ररुग्ण इव द्रुमः ॥१०५
उस अश्वारूढ़ा का जो अश्व था उसने भी अपने प्रचंड खुरों के पुटों के द्वारा अत्यन्त वेग से शत्रु की सेना का खंडन करते हुए दानवों का बहुत अधिक मर्दन किया था ।६६। उस अश्व की हिनहिनाहट की ध्वनि बहुत दूर तक उत्पात से समुद्र की ध्वनि के ही तुल्य थी । उस घोष ने भी वैरी के द्वारा लाये हुए सैन्यों को जो बहुत अधिक थे सबको मूच्छित कर दिया था ।१००। उस हयासना ने उस दैत्यों के चक्र में जो भी इधर-उधर प्रचलित थे उन पर अपना पाशायुध जो जाज्वल्यमान आकृति वाला तथा परम दिव्यथा छोड़ दियाथा ।१०१। उस पाश से करोड़ों अन्य भुजङ्गोंके समान भीषण पाश निकले थे । जिन्होंने उस दैत्य की सम्पूर्ण सेना को बाँध-बाँध कर विशेष रूप से मूच्छित कर दिया था ।१०२। इसके अनन्तर सैनिकों के बन्धन से वह कुरण्ड बहुत ही अधिक क्रुद्ध हो गया था और उसने अपने एक वाण से उस अश्वारूढ़ा के मणियों के धनुष की मोर्वी को काट डाला था ।१०३। जिस धनुष की मोर्वी कट गयी थी उस धनुष को उसने त्याग दिया था और वह हयानना अत्यन्त ही क्रुद्ध हो गयी थी । फिर उसने उस दुष्ट मति वाले के वक्षःस्थल में अपना अंकुश डाला था ।१०४। जलते हुए उस अंकुश से जिसके जीवित रहते हुए ही रुधिर पी लिया गया था वह कुरण्ड वज्र से छिन्न द्रुम के ही समान भूमि पर गिर गया था ।१०५।
तदंकुशविनिष्ठ्यूताः पूतनाः काश्चिदुद्भटाः । तत्सैन्यं पाशनिष्यंदं भक्षयित्वा क्षयं गताः ॥१०६ इत्थं कुरुण्डे निहते विंशत्यक्षौहिणीपतौ । हतावशिष्टास्ते दैत्याः प्रपलायंत वै द्रुतम् ॥१०७
करंकादि पंच सेनापति-वध ] [ ३०३
कुरुण्डं सानुजं युद्धे शक्तिसैन्यैर्निपातितम् ।
श्रुत्वा शून्यकनाथोऽपि निशश्वास भुजंगवत् ॥१०८
उस अंकुश से निकली हुई कुछ परम उद्भट पूतनाएं उसकी सेना के पाश से निष्यन्द भक्षण करके क्षय को प्राप्त हो गयीं थीं ।१०६। बीस अक्षौहिणी सेनाओं के स्वामी उस कुरुण्ड के इस प्रकार से निहत हो जाने पर जो भी मरने से बचे हुए दैत्यगण थे वे शीघ्र ही वहाँ से भाग गये थे । उस युद्ध में छोटे भाई के साथ कुरुण्ड को शक्ति की सेनाओं ने मार डाला था । जब यह वृत्तान्त शून्य पुर के स्वामी ने सुना था तो वह भी भुजंग के ही तुल्य लम्बी श्वास लेने लगा था ।१०७-१०८।
करंकादि पंच सेनापति वध
अथाश्वारूढया क्षिप्ते कुरुण्डे भंडदानवः ।
कुटिलाक्षमिदं प्रोचे पुनरेव युयुत्सया ॥१
स्वप्नेऽपि यन्न संभाव्यं यन्न श्रुतमितः पुरा ।
यच्च नो शंकितं चित्ते तदेतत्कष्टमागतम् ॥२
कुरुण्डदुर्मदौ सत्त्वशालिनौ भ्रातरौ हतौ ।
दुष्टदास्याः प्रभावोऽयं मायाविन्या महत्तरः ॥३
इतः परं करंकादीन्पंचसेनाधिनायकान् ।
शतमक्षौहिणीनां च प्रस्थापय रणांगणे ॥४
ते युद्धदुर्मदाः शूराः संग्रामेषु तनुत्यजः ।
सर्वथैव विजेष्यंते दुर्विदग्धविलासिनीम् ॥५
इति भंडवचः श्रुत्वा भृशं च त्वरयान्वितः ।
कुटिलाक्षः करंकादीनाजुहाव चमूपतीन् ॥६
ते स्वामिनं नमस्कृत्य कुटिलाक्षेण देशिताः ।
अग्नौ प्रविष्णव इव क्रोधांधा निर्ययुः पुरात् ॥७
इसके अनन्तर जब अश्वारूढ़ा के द्वारा कुरुण्ड हत हो गया था तो भंड दानव ने पुनः युद्ध करने की इच्छा से कुटिलाक्ष से यह वचन कहा था ।
३०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।१। जिसकी कभी स्वप्न में भी सम्भावना नहीं की जा सकती है और पहिले इसके कभी जो सुना भी नहीं गया था और जिसकी चित्त में कभी शंका भी नहीं की गयी थी वही यह कष्ट इस समय में आ पड़ा है ।२। कुरण्ड और दुर्मद ये दोनों ही बहुत सत्व शाली भाई थे । इस मायाविनी दुष्ट दासी का कितना अधिक बड़ा प्रभाव है ।३। अब रणाङ्गन में यहाँ से आगे करंक प्रभृति पांच सेनाधिनायकों को और अक्षौहिणी सेना को रवाना कर दो ।४। वे शूर बहुत ही युद्ध में दुर्मद हैं और संग्रामों में अपने शरीर का त्याग करने वाले हैं । ये लोग पूर्ण रूप से ही उस दुर्विदग्ध विलासिनी को अवश्य जीत लेंगे ।५। इस भंड के वचन को सुनकर अत्यन्त शीघ्रता से युक्त होकर कुटिलाक्ष ने करंक आदि सेनापतियों को वहाँ पर बुला लिया था ।६। कुटिलाक्ष के द्वारा देशित उन्होंने अपने स्वामी को प्रणाम किया था और फिर वे इतने अधिक क्रोधान्ध हो गये थे मानों अग्नि में ही से समुत्पन्न हुए होवें । वे सब फिर उस पुर से युद्ध के लिए निकल कर चले गये थे ।७।
तेषां प्रयाणनिःसाणरणितं भृशदुःसहम् ।
आकर्ण्य दिग्गजास्तूर्णं शीर्णकर्णा जुघूर्णिरे ॥८
शतमक्षौहिणीनां च प्राचलत्केतुमालकम् ।
उत्तरंगत्तुरंगादि बभौ मत्तमत्तंगजम् ॥९
ह्रेषमाणहयाकीर्णं क्रन्दद्रूटकुलोद्भवम् ।
बृंहमाणगजं गर्जद्रथचक्रं चचाल तत् ॥१०
चक्रनेमिहतक्षोणीरेणुक्षपितरोचिषा ।
बभूव तुहिनासारच्छन्नेनेव विवस्वता ॥११
धूलीमयमिवाशेषमभवद्विश्वमंडलम् ।
क्वचिच्छब्दमयं चैव निःसाणकठिनस्वनैः ॥१२
उद्भूतैर्धूलिकाजालैराक्रांता दैत्यसैनिकाः ।
इयत्तयातः सेनायाः संख्यापि परिभाविता ॥१३
ध्वजा बहुविधाकारा मीनव्यालादिचित्रिताः ।
प्रचेलुर्धूलिकाजाले मत्स्या इव महोदधौ ॥१४
उनके प्रयाण का निःसाण रणित अत्यन्त ही दुस्सह था । दिग्गजों ने भी जब उसको सुना था वे भी शीर्ण कानों वाले होते हुए घूर्णित हो गये
करंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३०५
थे ॥८॥ सौ अक्षौहिणी सेनाओं के झण्डों की मालाएँ फहरा रही थीं और उस सेना में बड़े ऊँचे अश्व थे तथा मदमत्त हाथी भी उसमें थे ॥६॥ वह सेना ऐसी थी कि उसमें हिनहिनाने वाले अश्वों की धूम थी तथा उसमें चीखते हुए भटों का समुदाय भी था—एवं बड़े-बड़े विशालकाय हाथी थे और गर्जना करते हुए रथों का समुदाय था ऐसी वह सेना वहाँ से रवाना हुई थी ॥१०॥ रथों के पहियों से खुदी हुई पृथ्वी की रेणु से जिसकी कान्ति ढक गयी थी ऐसा सूर्य उस समय में ऐसा ही दिखलाई दे रहा था मानों तुहिनासार से ढक गया हो अर्थात् कुहरा में छिप गया होवे ॥११॥ यह पूर्ण विश्व का मंडल ही धूलि से परिपूर्ण हो गया था। उस सेना के निर्गमन की कठोर ध्वनि से चारों ओर घोष ही घोष व्याप्त हो रहा था ॥१२॥ उस समय में धूलि के ऐसे जाल छा गये थे कि समस्त दैत्यों के सैनिक इस धूलि से समाक्रान्त हो गये थे अर्थात् सभी धूलि से भर गये थे। अतएव इयत्ता से उसकी संख्या भी परिभावित थी ॥१३॥ उस सेना में बहुत प्रकार की ध्वजायें थीं जो मीन तथा व्याल आदि से चित्रित हो रही थीं। वे सभी सेनाएं उस धूलि से परिपूर्ण जाल में महोदधि में मत्स्यों के तुल्य चल रही थी ॥१४॥
तानापतत आलोक्य ललितासैनिकं प्रति ।
वित्र्रेसुरमराः सर्वे शक्तीनां भङ्गशङ्कया ॥१५
ते करङ्कमुखाः पञ्च सेनापतय उद्धताः ।
सर्पिणीं नाम समरे मायां चक्रु र्महीयसीम् ॥१६
तैः समुत्पतिता दृष्टा सर्पिणी रणशांबरी ।
धूम्रवर्णा च धूम्रोष्ठी धूम्रवर्णपयोधरा ॥१७
महोदधिरिवात्यंतं गंभीरकुहरोदरी ।
पुरश्चचाल शक्तीनां त्रायंती मनो रणे ॥१८
कद्रूरिवापरा दृष्टा बहुसर्पविभूषणा ।
सर्पाणामुद्भवस्थानं मायामयशरीरिणाम् ॥१९
सेनापतीनां नासीरे वेल्लयंती महीतले ।
वेल्लितं बहुधा चक्रे घोरारावविराविणी ॥२०
तथैव मायया पूर्वं तेऽसुरेंद्रा व्यजीजयन् ।
करंकाद्या दुरात्मानः पञ्चपञ्चत्वकामुकाः ॥२१
३०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जिस समय में इतनी विशाल सेनाएं धावा करने के लिए ललिता देवी के सैनिक की ओर आ रही थीं तो सभी देवगण शक्तियों के भङ्ग की शंका से डर गये थे ॥१५॥ वे करंक जिनमें प्रमुख था पाँचों सेनापति गण बहुत ही उद्धत थे । उन्होंने सर्पिणी नाम वाली एक महती माया को उस समर स्थल में किया था ॥१६॥ उनके द्वारा उठी हुई वह दुष्टा रणशाम्बरी सर्पिणी धूम्र वर्ण की थी । उसके होठ भी धूम्र वर्ण के ही थे और धूम्र ही उसके पयोधर थे ॥१७॥ वह महासागर के ही तुल्य अत्यन्त गम्भीर कुहर उदर वाली थी । वह रणस्थल में मन को भयभीत करती हुई ही शक्तियों के आगे चली थी ॥१८॥ वह बहुत से सर्पों के भूषण वाली दूसरी कद्रू के ही समान थी और बहुत ही दुष्टा थी । वह माया से परिपूर्ण सर्पों के जनन का स्थान थी ॥१६॥ सेनापतियों के नासीर में महीतल को वेल्लित करती हुई वह जा रही थी । उसका महान घोर शब्द था जिसको वह कर रही थी और प्रायः उसने उस चक्र को वेल्लित सा कर दिया था ॥२०॥ वे पाँचों सेनापति भी पञ्चत्व (मृत्यु) के ही कामुक थे और वे करंक आदि सब बहुत ही दुरात्मा थे । उसी भाँति से माया के साथ पूर्व में सब असुरेन्द्र अजित हो रहे थे ॥२१॥
अथ प्रवृत्ते युद्धं शक्तीनाममरद्रुहाम् ।
अन्योन्यवीरभाषाभिः प्रोत्साहितघनक्रुधाम् ॥२२
अत्यंतसंकुलतया न विज्ञातपरस्पराः ।
शक्तयो दानवश्चैव प्रजह्रुः शस्त्रपाणयः ॥२३
अन्योन्यशस्त्रसंघट्टसमुत्थितहुताशने ।
प्रवृत्तविशिखस्रोतः प्रच्छन्नहरिदन्तरे ॥२४
बहुरक्तनदीपूरह्रियमाणमतंगजे ।
मांसकदमनिर्मग्ननिष्पंदरथमंडले ॥२५
विकीर्णकेशशैवालविलसद्रक्तनिर्झरे ।
अतिनिष्ठुरविध्वंसि सिंहनादभयङ्करे ॥२६
रजोऽन्धकारतुमुले राक्षसीतृप्तिदायिनि ।
शस्त्रीशरीरविच्छिन्न दैत्यकंठोत्थितासृजि ॥२७
करंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३०७
प्रवृत्ते घोरसंग्रामे शक्तीनां च सुरद्विषाम् ।
अथ स्वबलमादाय पञ्चभिः प्रेरिता सती ।
सर्पिणी बहुधा सर्पान्विससर्ज शरीरतः ॥२८
इसके उपरान्त उन शक्तियों का और देव द्रोहियों का युद्ध प्रवृत्त हुआ था । वे परस्पर में सभी वीरों की भाषा में घने क्रोध को प्रोत्साहन दे रहे थे ।२२। उस समय में अत्यधिक संकुलता थी और परस्पर में भी एक दूसरे का ज्ञान नहीं हो रहा था । दानव गण और शक्तियों ने अपने-अपने करों में हथियार ग्रहण करके मारकाट की थी ।२३। परस्पर में जो आयुधों का संघट्टन हो रहा था उस रगड़ से आंच निकल रही थी । समस्त दिशाएं उस आयुधों की टक्कर से समुत्पन्न अग्नि के स्रोत से प्रच्छन्न हो गयी थीं ।२४। उस युद्ध में इतना रुधिरपात हुआ था कि उसकी नदियाँ बह निकली थीं और उसमें हाथी भी छिप गये थे । मांस का तो इतना विशाल कीच हो गया था कि उसमें रथों का मंडल गतिहीन हो गया था ।२५। वह युद्ध स्थल रुधिर-स्राव से पूर्ण था तथा उसमें जो केशों का जाल था वह शैवाल के ही सदृश दिखाई दे रहा था । वह युद्धस्थल अतीव निष्ठुर एवं विध्वंस समन्वित था । वहाँ पर जो सैनिकों का सिंहनाद हो रहा था उससे वह बहुत ही भयावह हो रहा था ।२६। उस समय जबकि शक्तियों का और असुरों का घोर संग्राम प्रवृत्त हुआ था तो वह बहुत ही तुमुल था और राक्षसियों को तृप्ति प्रदान करने वाला था । उस समय घोर जब अन्धकार छाया हुआ था और शस्त्रधारियों के शरों से निरन्तर दैत्यों के कंठों से रुधिर निकल रहा था । इसके अनन्तर अपने दल को लेकर पाँचों सेनापतियों के द्वारा प्रेरित हुई सर्पिणी ने प्रायः शरीर से सर्पों का सृजन किया था ।२७-२८।
तक्षकंकोटसमा वासुकिप्रमुखत्विषः ।
नानाविधवपुर्वर्णा नानादृष्टिभयङ्कराः ॥२६
नानाविधविषज्वालानिर्दग्धभुवनत्रयाः ।
दारदं वत्सनाभं च कालकूटमथापरम् ॥३०
सौराष्ट्रं च विषं घोरं ब्रह्मपुत्रमथापरम् ।
प्रतिपन्नं शौक्लिकेयमन्यान्यपि विषाणि च ॥३१
व्यालैः स्वकीयवदनैर्विलोलरसनाद्वयैः ।
३०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विकिरंतः शक्तिसैन्ये विसस्रुः सर्पिणीतनोः ॥३२
धूम्रवर्णा द्विवदना सर्पा अतिभयंकराः ।
सर्पिण्या नयनद्वंद्वादुत्थिताः क्रोधदीपिताः ॥३३
पीतवर्णास्त्रिफणका दंष्ट्राभिर्विकटाननाः ।
सर्पिण्याः कर्णकुहरादुत्थिताः सर्पकोटयः ॥३४
अग्रे पुच्छे च वदनं धारयंतः फणान्वितम् ।
आस्यादा नीलवपुषः सर्पिण्याः फणिनोऽभवन् ॥३५
वे सब सर्प भी तक्षक और कर्कोटक के सी सदृश थे तथा वासुकि सर्प के समान कान्ति वाले थे । उनके वर्ण और शरीर भी अनेक वर्ण के थे तथा नाना भांति की दृष्टि से भयानक थे ।२६। अनेक प्रकार के विषों की ज्वाला से तीनों लोकों के निर्दग्ध करने वाले थे। वह विष भी कितने ही प्रकार का था—दारद-वत्सनाभ-कालकूट-सौराष्ट्र-घोर विष तथा ब्रह्म पुत्र विष था। शौक्लिकेय विष एवं अन्यान्य भी कई प्रकार के विष उनके प्रति-पन्न थे ।३०-३१। ये सभी तरह के विष उस सर्पिणी के शरीर से निकल रहे थे जो कि सर्प उस समय में समुत्पन्न हुए थे । उन सर्पों के मुख ऐसे थे जिनमें बहुत ही चञ्चल दो जीभें लपलपा रहा थी और वे विषों को उस शक्तियों की सेना में फैला रहे थे ।३२। उन सर्पों के दो-दो मुख धूम्रवर्ण के थे और वे सर्प बहुत ही अधिक भयंकर थे । उस सर्पिणी के दोनों नेत्रों से वे समुत्थित हुए थे और महान् क्रोध से दीपित थे ।३३। उन सर्पों के पीतवर्ण थे तथा तीन-तीन फण थे। उनकी दाढ़ों से उनके मुख बहुत ही विकट थे । उस सर्पिणी के कानों के कुहरों से करोड़ों ही सर्प उत्थित हो गये थे ।३४। वे आगे और पूछो में फणों से समन्वित मुखों को धारण करने वाले थे । आस्याद और नीले शरीरों वाले उस सर्पिणी के सर्प हुए थे ।३५।
अन्यैश्च बलवर्णाश्च चतुर्वक्त्राश्चतुष्पदाः ।
नासिकाविवरात्तस्या उद्गता उग्ररोचिषः ॥३६
लम्बमानमहाचर्मावृत्तस्थूलपयोधरात् ।
नाभिकुण्डाच्च बहवो रक्तवर्णा भयानकाः ॥३७
हलाहलं वहंतश्च प्रोत्थिताः पन्नगाधिपाः ।
करंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३०६
विदशंतः शक्तिसेनां दहंतो विषवह्निभिः ॥३८ बध्नंतो भोगपाशैश्च निघ्नंतः फणमण्डलैः । अत्यंतमाकुलां चक्रुललितेशीचमूममी ॥३९ खड्यमाना अपि मुहुः शक्तीनां शस्त्रकोटिभिः ॥४० उपर्युपरि वर्धंते सपिण्डप्रविसर्पिणः । नश्यन्ति बहवः सर्पा जायन्ते चापरे पुनः ॥४१ एकस्य नाशसमये बहवोऽन्ये समुत्थिताः । मूलभूता यतो दुष्टा सर्पिणी न विनश्यति ॥४२
और अन्य-अन्य वर्ण तथा बल से युक्त—चार मुखों वाले-चार पदों वाले उस सर्पिणी के नासिका के विवर से अत्यन्त उग्र कान्ति वाले उद्गत हो गये थे ।३६। लम्बे महासर्प से समावृत स्थूल पयोधरों से और उसकी नाभि के कुण्ड से बहुत से रक्त वर्ण वाले तथा भयानक उत्पन्न हुए थे ।३७। जो सर्प हालाहल को अपने मुखों से बहा रहे थे । ऐसे पन्नगाधिप समुत्थित हो गये थे । वे सब उस शक्तियों की सेना के सैनिकों का दंशन कर रहे थे तथा विषों की अग्नियों से दहन कर रहे थे ।३८। वे अपने भोग के पाशों से सैनिकों को बाँध रहे थे और फणों के मण्डलों से निहनन भी कर रहे थे । ये ललिता की सेना को अत्यन्त ही समाकुल कर रहे थे ।३९। यद्यपि वे शक्तियों के शस्त्रों के द्वारा जो करोड़ों ही थे बारम्बार काटे भी जा रहे थे तो भी काम कर रहे थे ।४०। वे ऊपर-ऊपर में सपिण्ड प्रविसर्पी बढ़ रहे थे । उनमें बहुत से सर्प नष्ट हो जाया करते हैं तथापि वे पुनः समुत्पन्न हो जाते हैं और दूसरे भी पैदा हो जाया करते हैं ।४१। जब एक का नाश का समय होता है तो अन्य बहुत से पैदा हो जाया करते हैं । कारण यही था कि जो मूल भूता सर्पिणी थी जिससे वे सब पैदा होते थे वह नष्ट नहीं होती है । अतः उससे बराबर सर्प समुत्पन्न होते चले जाते थे ।४२।
अतस्तत्कृतसर्पाणां नाशे सर्पांतरोद्भवः । ततश्च शक्तिसैन्यानां शरीराणि विषानलैः ॥४३ दह्यमानानि दुःखेन विप्लुतान्यभवन्नृणे । किंकर्तव्यविमूढेषु शक्तिचक्रेषु भोगिभिः ॥४४
३१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पराक्रमं बहुविधं चक्रुस्ते पञ्च दानवाः । करीन्द्री गर्दभशतैर्युक्तं स्यन्दनमास्थितः ॥४५ चक्रेण तीक्ष्णधारेण शक्तिसेनानमर्दयत् । वज्रदंताभिधश्चान्यो भण्डदैत्यचमूपतिः ॥४६ वज्रबाणाभिघातेन होष्ट्रतो हि रणं व्यधात् । अथ वज्रमुखश्चैव चक्रिवंतं महत्तरम् ॥४७ आरुह्य कुन्धाराभिः शक्तिचक्रममर्दयत् । वज्रदंताभिधानोऽन्यश्चमूनामधिपो बली ॥४८ गृध्रयुग्मरथारूढः प्रजहार शिलीमुखैः । तैः सेनापतिभिर्दुष्टैः प्रोत्साहितमथाहवे ॥४९
इसीलिये उसके शरीर से समुत्पन्न सर्पों के नाश होने पर भी दूसरे अन्य सर्पों की समुत्पत्ति हो जाया करती थी । उनके विषाग्नि से शक्तियों की सेनाओं के शरीर दह्यमान हो रहे थे और रण में वे दुःख से विप्लुत थे । उन भोगियों के द्वारा शक्तियों के चक्र किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गये थे ।४३-४४। उन पाँचों दानवों ने बहुत तरह का पराक्रम किया था । वह करीन्द्री सैकड़ों गदर्भों से युक्त एक रथ पर समास्थित था ।४५। उसने अपने चक्र के द्वारा जिसकी बहुत ही अधिक तीक्ष्णधार थी शक्ति सेना का मर्दन किया था । और एक अन्य वज्रदन्त नामक भण्डासुर का सेनापति था ।४६। वज्रवाण के अभिघात के द्वारा उष्ट्र से उसने रण किया था । इसके पश्चात् वज्रमुख एक अधिक बड़े चक्रिवान् पर समवस्थित था ।४७। वह समारोहण करके भाले की धाराओं से वह शक्तियों की सेना का मर्दन करता था । एक अन्य वज्रदन्त नामक सेनापति बहुत ही बलवान् था ।४८। दो गृध्रों के रथ पर वह समारूढ़ था और वाणों के द्वारा सेना का निहनन कर रहा था । वे सेनापति अत्यन्त दुष्ट थे और उनके द्वारा युद्ध में सेना को प्रोत्साहन दिया गया था ।४६।
शतमक्षौहिणीनां च निपपातैकहेलया । सर्पिणी च दुराचारा बहुमायापरिग्रहा ॥५० क्षणे क्षणे कोटिसंख्यान्विससर्ज फणाधरान् ।
कादि पंच सेनापति वध ] [ ३११
तथा विकलितं सैन्यमवलोक्य रुषाकुला ॥५१ नकुली गरुडारूढा सा पपात रणाजिरे । प्रतप्तकनकप्रख्या ललितातालुसम्भवा ॥५२ समस्तवाङ्मयाकारा दंतैर्वज्रमयैर्युता । सर्पिण्यभिमुखं तत्र विससर्ज निजं बलम् ॥५३ तयाधिष्ठिततुंगांसः पक्षविक्षिप्तभूधरः । गरुडः प्राचलद्युद्धे सुमेरुरिव जङ्गमः ॥५४ सर्पिणीमायया जातान्सर्पान्दृष्ट्वा भयानकान् । क्रोधरक्तेक्षणं व्यात्तं नकुली विदधे मुखम् ॥५५ अथ श्रीनकुलीदेव्या द्वात्रिंशद्दंतकोटयः । द्वात्रिंशत्कोटयो जाता नकुलाः कनकप्रभाः ॥५६
सौ अक्षौहिणी सेना का एक ही हेला से निपतन हो गया था। वह सर्पिणी बहुत ही दुष्ट आचार वाली थी और बहुत-सी मायाओं के परिग्रह वाली भी थी ॥५०। वह एक-एक क्षण में करोड़ों-करोड़ों सर्पों का सृजन कर रही थी। इसके पश्चात् वह सम्पूर्ण सेना बेचैन हो गयी थी। ऐसा देखकर वह—देवी बहुत ही रोष से युक्त हो गयी थी ॥५१। वह नकुली गरुड़ पर समारूढ़ा उस रणाङ्गन में आ गयी थी। वह ललिता देवी के तालु से उत्पन्न हुई थी और तपे हुए सुवर्ण के समान थी ॥५२। उसका समस्त वाङ्मय आकार था और उसके दांत वज्रमय थे। उसने वहाँ पर अपना बल उस सर्पिणी के समक्ष में सृजन किया था ॥५३। वह गरुड़ भी ऐसा था जिसके बहुत उच्च अंश थे और वह अपने पंखों से पर्वतों को भी विक्षिप्त कर रहा था। वह गरुड़ उस युद्ध में चल दिया था जो साक्षात् जङ्गम सुमेरु के ही समान था ॥५४। सर्पिणी की माया से समुत्पन्न परमाधिक भयानक सर्पों को देखकर स नकुली ने क्रोध से लाल नेत्रों वाला अपना मुख खुला हुआ कर दिया था ॥५५। इसके पश्चात् श्री नकुली देवी की बत्तीस करोड़ सेना नकुलों की समुत्पन्न हो गयी थी और सुवर्ण की प्रभा वाले नकुल उत्पन्न हो गये थे ॥५६।
इतस्ततः खण्डयन्तः सर्पिणीसर्पमण्डलम् । निजदंष्ट्राविमर्देन नाशयन्तश्च तद्विषम् ।
३१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
व्यभ्रमन्समरे घोरे विषघ्नाः स्वर्णबभ्रवः ॥५७ उत्कर्णा क्रोधसम्पर्काद्धूनिताशेषलोमकाः । उत्फुल्ला नकुला व्यात्तवदना व्यदशन्नहीन् ॥५८ एकैकमायासर्पस्य बभ्रुरेकैक उद्गतः । तीक्ष्णदंतनिपातेन खण्डयामास विग्रहम् ॥५६ भोगिभोगसृतै रक्तैः सृक्किणी शोणतां गते । लिहंतो नकुला जिह्वापल्लवैः पुप्लुवुर्मृधे ॥६० नकुलैर्दश्यमानानामत्यन्तचटुलं वपुः । मुहुः कुण्डलितैर्भोगैः पन्नगानां व्यचेष्टत ॥६१ नकुलावलिदष्टानां नष्टासूनां फणाभृताम् । फणाभरसमुत्कीर्णा मणयो व्यरुचन्मृधे ॥६२ नकुलाघातसंशीर्णफणाचक्रैर्विनिर्गतैः । फणयस्तन्महोद्रोहवह्निज्वाला इवाबभुः ६३
वे नकुल सर्पिणी के सर्पों के मण्डल को अपनी दाढ़ों के विमर्दन से उनके विषों का विनाश कर रहे थे तथा उस महान् घोर समर स्थल में इधर-उधर वे नकुल स्वर्ण के समान चमकते हुए विष का नाश करने वाले भ्रमण करने लगे थे ।५७। उन समस्त नकुलों के दोनों कान ऊपर की ओर उठे हुए थे और क्रोध के सम्पर्क से वे अपने लोमों को उद्धूलित कर रहे थे । इस तरह से फूले हुए अपने मुँहों को खोले हुए सर्पों का विनाश करने वाले हुए थे ।५८। एक-एक माया से निर्मित सर्प के लिये एक-एक ही नकुल उद्गत हो गया था और ये अपने परमाधिक तीक्ष्ण दांतों के द्वारा सर्पों के शरीरों का खण्डन कर रहे थे ।५६। सर्पों के फणों से निकले हुए रुधिर से नकुलों की सृक्किणियां लाल हो गयी थीं और वे अपनी जिह्वा से उस रुधिर को चाटते हुए स्वयं भी उस युद्ध में प्लावित हो गये थे ।६०। उन नकुलों के द्वारा काटे गये उनके शरीर अत्यन्त चटुल हो गये थे और बारम्बार सर्पों के कुण्डलित भोगों के साथ वे विचेष्टा कर रहे थे ।६१। नकुलों के समुदाय के द्वारा काटे गये सर्पों के प्राण जा चुके थे और उनके फणों के भार से निकल कर गिरी हुई मणियाँ उस समराङ्गण में चमक
करंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३१३
रहीं थीं ।६२। उन नकुलों के प्रहारों के द्वारा सर्पों के फणों के समुदाय से निर्गत मणियों के समूहों से वे समस्त सर्प उस समर स्थल में अग्नियों की ज्वालाओं के ही समान दिखलायी दे रहे थे ।६३।
एवं प्रकारतो बभ्रुमण्डलै रवखण्डिते । मायामये सर्पजाले सर्पिणीकोपमादधे ॥६४
तया सह महद्युद्धं कृत्वा सा नकुलेश्वरी । गारुडास्त्रमतिक्रूरं समाधत्त शिलीमुखे ॥६५
तद्गरुडास्त्रमुद्दामज्वालादीपितदिङ्मुखम् । प्रविश्य सर्पिणीदेहं सर्पमायां व्यशोषयत् ॥६६
मायाशक्तेर्विनाशेन सर्पिणी विलयं गता । क्रोधं च तद्विनाशन प्राप्ताः पञ्च चमूचराः ॥६७
यद्बलेन सुरान्सर्वान्सेनान्यस्तेऽवमेनिरे । सा सर्पिणी कथाशेषं नीता नकुलवीर्यतः ॥६८
अतः स्वबलनाशेन भृशं क्रुद्धाश्चमूचराः । एकोद्यमेन शस्त्रौघैर्नंकुलीं तामवाकिरन् ॥६९
एकैव सा तार्क्ष्यंरथा पञ्चभिः पृतनेश्वरी । लघुहस्ततया युद्धं चक्रे वै शस्त्रवर्षिणी ॥७०
इस प्रकार से नकुलों के समुदाय के द्वारा जब सर्पों के मंडल अव- खण्डित हो गये थे तो मायामय सर्पों का समूह नष्ट हो जाने पर सर्पिणी को बड़ा भारी क्रोध हो गया था ।६४। उस सर्पिणी के साथ उस नकुलीश्वरी ने महान् युद्ध करके उसने अपने शिलीमुख में अत्यधिक क्रूर गरुडास्त्र धारण किया था ।६५। उस गरुडास्त्र ने जिसमें अत्यधिक ज्वालाएँ निकल रहीं थीं और समस्त दिशाएँ जिनसे चमक रही थीं, सर्पिणी के देह में प्रवेश किया था और उस सर्पों की माया का शोषण कर दिया था ।६६। जब उसकी उस माया की शक्ति का विनाश हो गया था तब वह सर्पिणी विलीन हो गयी थी और उसके विनाश हो जाने से वे जो पाँच सेनापति थे उनको बहुत अधिक क्रोध हो गया था ।६७। वे सेनानी जिसके बल से समस्त सुरों का भी अपमान कर देते थे वह सर्पिणी के पराक्रम से विनष्ट हो गयी थी
३१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
और उसकी केवल कथा ही शेष रह गयी थी ।६८। इसीलिए अपने बल के विनाश हो जाने से वे चमूवर बहुत क्रोधित हुए थे और उन्होंने सबने मिलकर अपने शस्त्रों के समूह से उस नकुली पर प्रबल प्रहार किये थे ।६६। उस सेना की स्वामिनी अकेली ही थी और तार्क्ष्य के रथ पर समारूढ़ थी । उस अकेली ही ने उन पांचों सेनापतियों के साथ शस्त्रों की वर्षा करने वाली ने बहुत ही हल्के हाथ होने से युद्ध किया था ।७०।
पट्टिशैर्मुसलैश्चैव भिन्दिपालैः सहस्रशः ।
वज्रसारमयैर्दन्तैर्व्यदशन्मर्मसीमसु ॥७१
ततो हाहारुतं घोरं कुर्वाणा दैत्यकिङ्कराः ।
उदग्रदंशनकुलैर्नकुलैराकुलीकृता ॥७२
उत्पत्य गगनात्केचिद्घोरचीत्कारकारिणः ।
दशन्तस्तद्विषां सैन्यं नकुलाः प्रज्वलत्क्रुधः ॥७३
कर्णेषु दष्ट्वा नासायामन्ये दष्टाः शिरस्तटे ।
पृष्ठतो व्यदशन्केचिदागत्य व्याकृतक्रियाः ॥७४
विकलाश्छिन्नवर्माणो भयविस्रस्तशस्त्रिकाः ।
नकुलैरभिभूतास्ते न्यपतन्नमरद्रुहः ॥७५
केचित्प्रविश्य नकुला व्यात्तान्यास्यानि वैरिणाम् ।
भोगिभोगानि वाकृष्य व्यदशन्नृसनातलम् ॥७६
अन्ये कर्णेषु नकुलाः प्राविशन्देववैरिणाम् ।
सूक्ष्मारूपा विशन्ति स्म नानारन्ध्राणि बभ्रवः ॥७७
पट्टिश—मुसल और सहस्रों भिन्दिपालों से तथा वज्र की शक्ति से पूर्ण दांतों से मर्मस्थलों में दंशन किया था प्रहार किया था ।७१। फिर तो समस्त दैत्यगण हाहाकार की ध्वनि करते हुए उन उदग्र दंशन करने वाले नकुलों के द्वारा बेचैन हो गये थे ।७२। उनमें कुछ तो आकाश से परम घोर चीत्कार करते हुए उत्पन्न कर रहे थे । अत्यन्त क्रोध से युक्त नकुल शत्रुओं की सेना का दंशन कर रहे थे ।७३। उन असुरों की उस समय में बहुत ही बुरी दशा हो गयी थी । कुछ तो कानों में काटे गये थे—कुछ नासिकाओं में और कुछ शिरों में दंशित किये गये थे एवं कुछ पीठ पर दंशन किये गये
करंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३१५
थे—इस तरह से सब की क्रियाएँ विनष्ट हो गयी थीं ।७४। ऐसे सबके सब वे बेचैन हो गये थे और उनके कवच छिन्न हो गये थे । भय के कारण उन्होंने अपने शस्त्रों को छोड़ दिया था । वे समस्त असुर नकुलों से पराभव को प्राप्त होकर निमलित हो गये थे ।७५। कुछ नकुल तो शत्रुओं के खुले हुए मुखों में प्रवेश करके सर्पों के मुखों (फनों) को खींचकर उनके रसना के तलों को काट रहे थे ।७६। अन्य नकुल शत्रुओं के कानों के छिद्रों में प्रवेश करके उन्हें दंशित कर रहे थे तथा वे नकुल उनके अनेक छिद्रों में में सूक्ष्म रूपों वाले होकर प्रविष्ट हो रहे थे ।७७।
इति तैरभिभूतानि नकुलैरवलोकयन् ।
निजसैन्यानि दीनानि करङ्कः कोपमास्थितः ॥७८
अन्येऽपि च चमूनाथा लघुहस्ता महाबलाः ॥७६
प्रतिबभ्रु शरस्तोमान्ववृषुद्वारिदा इव ।
दैत्यसैन्यपतिप्रौढकोदण्डोत्थाः शिलीमुखाः ।
बभ्रूणां दन्तकोटीषु कठोरघट्टनं व्यधुः ॥८०
चमूपतिशरव्यूहैराहतेभ्यः परःशतैः ।
बभ्रूणां वज्रदन्तेभ्यो निश्चक्राम हुताशनः ।
पञ्चापि ते चमूनाथाविसृष्टैरेकहेलया ॥८१
स्फुरत्फलैः शरकुलैर्बभ्रुसेनां व्यमर्दयत् ।
इतस्ततश्चमूनाथविक्षिप्तशरकोटिभिः ।
विशीर्णगात्रा नकुला नकुलीं पर्यवारयन् ॥८२
अथ सा नकुली बाणी वाङ्मयस्यैकनायिका ।
नकुलानां परावृत्त्या महांतं रोषमाश्रिता ॥८३
अक्षीणनकुलं नाम महास्त्रं सर्वतोमुखम् ।
वह्निज्यालापरीताग्रं संदधे शार्ङ्गधन्विनि ॥८४
इस प्रकार से अपनी सेनाओं को नकुलों के द्वारा अभिभूत हुईं देख कर तथा अपने सैनिकों को दीन अवलोकन करके करङ्क को बहुत अधिक क्रोध हो गया था ।७८। अन्य भी जो सेनानी थे वे भी बहुत ही हल्के हाथों
३१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वाले और महान बलवान थे ।७९। उनने प्रत्येक नकुल के ऊपर शरों के समूहों की मेघों की भाँति वर्षा की थी । दैत्यों के सेनापतियों के परम प्रौढ़ धनुषों से निकले हुए बाणों ने नकुलों के करोड़ों दाँतों पर अथवा दाँतों के कोनों पर अतीव कठोर घट्टन किया था । अर्थात् जोरदार प्रहार किये थे ।८०। सैकड़ों से भी अधिक सेनानियों के बाणों के समुदायों से आहत नकुलों के वज्र के समान दाँतों से अग्नि की चिनगारियों निकल रही थीं । उन पाँचों सेनापतियों ने एक ही हल्ले में मिलकर सेना का विमर्दन कर दिया था । सेनानियों के द्वारा छोड़े हुए बाणों से जो करोड़ों की संख्या में थे विशीर्ण शरीरों वाले विचारे नकुल इधर-उधर घूमते गए नकुली के आस-पास घिरकर समागत हो गये थे ।८१-८२। इसके अनन्तर वाङ्मय की एक देवता वह नकुली नकुलों की परावृत्ति से बड़े भारी क्रोध में भर गयी थी । ।८३। उस नकुली ने अक्षीण नकुल नामक महास्त्र को जिसका सभी ओर मुख था और जो वह्नि की ज्वालाओं से घिरे हुए अग्रभाग वाला था उस को अपने धनुष पर चढ़ाया था ।८४।
तदस्त्रतो विनिष्च्यूता नकुलाः कोटिसंख्यकाः ।
वज्राङ्गा वज्रलोमानो वज्रदंष्ट्रा महाजवाः ॥८५
वज्रसाराश्च निबिडा वज्रजालभयंकराः ।
वज्राकारैर्नखैस्तूर्णं दारयन्तो महीतलम् ॥८६
वज्ररत्नप्रकाशेन लोचनेनापि शोभिताः ।
वज्रसंपातसदृशा नासाचीत्कारकारिणः ॥८७
मर्दयन्ति सुरारातिसैन्यं दशनकोटिभिः ।
पराक्रमं बहुविधं तेनिरे ते निरेनसः ॥८८
एवं नकुलकोटीभिर्वज्रघोरैर्महाबलैः ।
विनष्टाः प्रत्यवयवं विनेशुर्दानवाधमाः ॥८९
एवं वज्रमयैर्बभ्रुमण्डलः खण्डिते बले ॥६०
शताक्षौहिणिके संख्ये ते स्वमात्रावशेषिताः ।
अतित्रासेन रोषेण गृहीताश्च चमूचराः ।
संग्राममधिकं तेनुः समाकृष्टशरासनाः ॥६१
करंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३१७
उसके अस्त्र से निकले हुए करोड़ों नकुल बाहिर हुए थे जिनके वज्र के समान अङ्ग थे—वज्र जैसे ही लोम थे और वज्र के तुल्य दंष्ट्राएँ थी तथा उनका महान् वेग था ।८५। वे सभी वज्र के समसार वाले—निविड़ और वज्र जाल के सदृश भयंकर थे । उनके नख भी वज्र जैसे आकार वाले थे उनसे वे इस महीतल को विदीर्ण कर रहे थे ।८५-८६। वे वज्र रत्न के समान प्रकाश वाले नेत्रों से भी शोभा वाले थे और जैसे वज्र का पात होता है वैसा ही उनका सम्पात भी था । वे अपनी नासिकाओं से चीखें मारने वाले थे ।८७। वे अपने दांतों के कौनों से असुरों के सेनाओं का मर्दन करते हैं । निरपराधी उन्होंने अनेक प्रकार के पराक्रम को प्रदर्शित किया था ।८८। इस रीति से महान बल वाले तथा वज्र के तुल्य घोर नकुलों की कोटियों से वे अधम दानव अपने शरीरों के प्रत्येक अवयवों से विनष्ट हो गये थे ।८६। इस तरह वज्र पूर्ण नकुलों के मण्डलों से दैत्यों की सेनाएं छिन्न-भिन्न हो गयी थीं ।६०। सौ अक्षौहिणी की संख्या में वे केवल स्वयं ही बचे थे तब तो उनने बड़े क्रोध से और अत्यधिक त्रास से उन चमूबरों को ग्रहण किया था । अपने धनुषों को खींच कर उन्होंने और अधिक संग्राम किया था ।६१।
तैः समं बहुधा युद्धं तन्वाना नकुलेश्वरी ।
पट्टिशेन करंकस्य चिच्छेद कठिनं शिरः ॥६२
काकवाशितमुख्यानां चतुर्णामपि वैरिणाम् ।
उत्पत्योत्पत्य तार्क्ष्येण व्यलुनादसिना शिरः ॥६३
तादृशं लाघवं दृष्ट्वा नकुल्या श्यामलांबिका ॥६४
बहु मेने महासत्त्वां दुष्टासुरविनाशिनाम् ।
निजांगदेवतातत्त्वं च तस्यै श्यामांबिका ददौ ॥६५
लोकोत्तरे गुणे दृष्टे कस्य न प्रीतिसंभवः ।
हतशिष्टा भीतभीता नकुलीशरणं गताः ॥६६
सापि तान्वीक्ष्य कृपया मा भैष्टेति विहस्य च ।
भवद्राज्ञे रणोदंतमशेषं च निबोधत ॥६७
तयैवं प्रेषिताः शीघ्रं तदालोक्य रणक्षितिम् ।