संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरंकादि पंच सेनापति-वध ] [ ३०३
कुरुण्डं सानुजं युद्धे शक्तिसैन्यैर्निपातितम् ।
श्रुत्वा शून्यकनाथोऽपि निशश्वास भुजंगवत् ॥१०८
उस अंकुश से निकली हुई कुछ परम उद्भट पूतनाएं उसकी सेना के पाश से निष्यन्द भक्षण करके क्षय को प्राप्त हो गयीं थीं ।१०६। बीस अक्षौहिणी सेनाओं के स्वामी उस कुरुण्ड के इस प्रकार से निहत हो जाने पर जो भी मरने से बचे हुए दैत्यगण थे वे शीघ्र ही वहाँ से भाग गये थे । उस युद्ध में छोटे भाई के साथ कुरुण्ड को शक्ति की सेनाओं ने मार डाला था । जब यह वृत्तान्त शून्य पुर के स्वामी ने सुना था तो वह भी भुजंग के ही तुल्य लम्बी श्वास लेने लगा था ।१०७-१०८।
करंकादि पंच सेनापति वध
अथाश्वारूढया क्षिप्ते कुरुण्डे भंडदानवः ।
कुटिलाक्षमिदं प्रोचे पुनरेव युयुत्सया ॥१
स्वप्नेऽपि यन्न संभाव्यं यन्न श्रुतमितः पुरा ।
यच्च नो शंकितं चित्ते तदेतत्कष्टमागतम् ॥२
कुरुण्डदुर्मदौ सत्त्वशालिनौ भ्रातरौ हतौ ।
दुष्टदास्याः प्रभावोऽयं मायाविन्या महत्तरः ॥३
इतः परं करंकादीन्पंचसेनाधिनायकान् ।
शतमक्षौहिणीनां च प्रस्थापय रणांगणे ॥४
ते युद्धदुर्मदाः शूराः संग्रामेषु तनुत्यजः ।
सर्वथैव विजेष्यंते दुर्विदग्धविलासिनीम् ॥५
इति भंडवचः श्रुत्वा भृशं च त्वरयान्वितः ।
कुटिलाक्षः करंकादीनाजुहाव चमूपतीन् ॥६
ते स्वामिनं नमस्कृत्य कुटिलाक्षेण देशिताः ।
अग्नौ प्रविष्णव इव क्रोधांधा निर्ययुः पुरात् ॥७
इसके अनन्तर जब अश्वारूढ़ा के द्वारा कुरुण्ड हत हो गया था तो भंड दानव ने पुनः युद्ध करने की इच्छा से कुटिलाक्ष से यह वचन कहा था ।