भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

।१। जिसकी कभी स्वप्न में भी सम्भावना नहीं की जा सकती है और पहिले इसके कभी जो सुना भी नहीं गया था और जिसकी चित्त में कभी शंका भी नहीं की गयी थी वही यह कष्ट इस समय में आ पड़ा है ।२। कुरण्ड और दुर्मद ये दोनों ही बहुत सत्व शाली भाई थे । इस मायाविनी दुष्ट दासी का कितना अधिक बड़ा प्रभाव है ।३। अब रणाङ्गन में यहाँ से आगे करंक प्रभृति पांच सेनाधिनायकों को और अक्षौहिणी सेना को रवाना कर दो ।४। वे शूर बहुत ही युद्ध में दुर्मद हैं और संग्रामों में अपने शरीर का त्याग करने वाले हैं । ये लोग पूर्ण रूप से ही उस दुर्विदग्ध विलासिनी को अवश्य जीत लेंगे ।५। इस भंड के वचन को सुनकर अत्यन्त शीघ्रता से युक्त होकर कुटिलाक्ष ने करंक आदि सेनापतियों को वहाँ पर बुला लिया था ।६। कुटिलाक्ष के द्वारा देशित उन्होंने अपने स्वामी को प्रणाम किया था और फिर वे इतने अधिक क्रोधान्ध हो गये थे मानों अग्नि में ही से समुत्पन्न हुए होवें । वे सब फिर उस पुर से युद्ध के लिए निकल कर चले गये थे ।७।

तेषां प्रयाणनिःसाणरणितं भृशदुःसहम् ।
आकर्ण्य दिग्गजास्तूर्णं शीर्णकर्णा जुघूर्णिरे ॥८
शतमक्षौहिणीनां च प्राचलत्केतुमालकम् ।
उत्तरंगत्तुरंगादि बभौ मत्तमत्तंगजम् ॥९
ह्रेषमाणहयाकीर्णं क्रन्दद्रूटकुलोद्भवम् ।
बृंहमाणगजं गर्जद्रथचक्रं चचाल तत् ॥१०
चक्रनेमिहतक्षोणीरेणुक्षपितरोचिषा ।
बभूव तुहिनासारच्छन्नेनेव विवस्वता ॥११
धूलीमयमिवाशेषमभवद्विश्वमंडलम् ।
क्वचिच्छब्दमयं चैव निःसाणकठिनस्वनैः ॥१२
उद्भूतैर्धूलिकाजालैराक्रांता दैत्यसैनिकाः ।
इयत्तयातः सेनायाः संख्यापि परिभाविता ॥१३
ध्वजा बहुविधाकारा मीनव्यालादिचित्रिताः ।
प्रचेलुर्धूलिकाजाले मत्स्या इव महोदधौ ॥१४

उनके प्रयाण का निःसाण रणित अत्यन्त ही दुस्सह था । दिग्गजों ने भी जब उसको सुना था वे भी शीर्ण कानों वाले होते हुए घूर्णित हो गये