भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 715

करंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३०५

थे ॥८॥ सौ अक्षौहिणी सेनाओं के झण्डों की मालाएँ फहरा रही थीं और उस सेना में बड़े ऊँचे अश्व थे तथा मदमत्त हाथी भी उसमें थे ॥६॥ वह सेना ऐसी थी कि उसमें हिनहिनाने वाले अश्वों की धूम थी तथा उसमें चीखते हुए भटों का समुदाय भी था—एवं बड़े-बड़े विशालकाय हाथी थे और गर्जना करते हुए रथों का समुदाय था ऐसी वह सेना वहाँ से रवाना हुई थी ॥१०॥ रथों के पहियों से खुदी हुई पृथ्वी की रेणु से जिसकी कान्ति ढक गयी थी ऐसा सूर्य उस समय में ऐसा ही दिखलाई दे रहा था मानों तुहिनासार से ढक गया हो अर्थात् कुहरा में छिप गया होवे ॥११॥ यह पूर्ण विश्व का मंडल ही धूलि से परिपूर्ण हो गया था। उस सेना के निर्गमन की कठोर ध्वनि से चारों ओर घोष ही घोष व्याप्त हो रहा था ॥१२॥ उस समय में धूलि के ऐसे जाल छा गये थे कि समस्त दैत्यों के सैनिक इस धूलि से समाक्रान्त हो गये थे अर्थात् सभी धूलि से भर गये थे। अतएव इयत्ता से उसकी संख्या भी परिभावित थी ॥१३॥ उस सेना में बहुत प्रकार की ध्वजायें थीं जो मीन तथा व्याल आदि से चित्रित हो रही थीं। वे सभी सेनाएं उस धूलि से परिपूर्ण जाल में महोदधि में मत्स्यों के तुल्य चल रही थी ॥१४॥

तानापतत आलोक्य ललितासैनिकं प्रति ।
वित्र्रेसुरमराः सर्वे शक्तीनां भङ्गशङ्कया ॥१५
ते करङ्कमुखाः पञ्च सेनापतय उद्धताः ।
सर्पिणीं नाम समरे मायां चक्रु र्महीयसीम् ॥१६
तैः समुत्पतिता दृष्टा सर्पिणी रणशांबरी ।
धूम्रवर्णा च धूम्रोष्ठी धूम्रवर्णपयोधरा ॥१७
महोदधिरिवात्यंतं गंभीरकुहरोदरी ।
पुरश्चचाल शक्तीनां त्रायंती मनो रणे ॥१८
कद्रूरिवापरा दृष्टा बहुसर्पविभूषणा ।
सर्पाणामुद्भवस्थानं मायामयशरीरिणाम् ॥१९
सेनापतीनां नासीरे वेल्लयंती महीतले ।
वेल्लितं बहुधा चक्रे घोरारावविराविणी ॥२०
तथैव मायया पूर्वं तेऽसुरेंद्रा व्यजीजयन् ।
करंकाद्या दुरात्मानः पञ्चपञ्चत्वकामुकाः ॥२१