भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पराक्रमं बहुविधं चक्रुस्ते पञ्च दानवाः । करीन्द्री गर्दभशतैर्युक्तं स्यन्दनमास्थितः ॥४५ चक्रेण तीक्ष्णधारेण शक्तिसेनानमर्दयत् । वज्रदंताभिधश्चान्यो भण्डदैत्यचमूपतिः ॥४६ वज्रबाणाभिघातेन होष्ट्रतो हि रणं व्यधात् । अथ वज्रमुखश्चैव चक्रिवंतं महत्तरम् ॥४७ आरुह्य कुन्धाराभिः शक्तिचक्रममर्दयत् । वज्रदंताभिधानोऽन्यश्चमूनामधिपो बली ॥४८ गृध्रयुग्मरथारूढः प्रजहार शिलीमुखैः । तैः सेनापतिभिर्दुष्टैः प्रोत्साहितमथाहवे ॥४९

इसीलिये उसके शरीर से समुत्पन्न सर्पों के नाश होने पर भी दूसरे अन्य सर्पों की समुत्पत्ति हो जाया करती थी । उनके विषाग्नि से शक्तियों की सेनाओं के शरीर दह्यमान हो रहे थे और रण में वे दुःख से विप्लुत थे । उन भोगियों के द्वारा शक्तियों के चक्र किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गये थे ।४३-४४। उन पाँचों दानवों ने बहुत तरह का पराक्रम किया था । वह करीन्द्री सैकड़ों गदर्भों से युक्त एक रथ पर समास्थित था ।४५। उसने अपने चक्र के द्वारा जिसकी बहुत ही अधिक तीक्ष्णधार थी शक्ति सेना का मर्दन किया था । और एक अन्य वज्रदन्त नामक भण्डासुर का सेनापति था ।४६। वज्रवाण के अभिघात के द्वारा उष्ट्र से उसने रण किया था । इसके पश्चात् वज्रमुख एक अधिक बड़े चक्रिवान् पर समवस्थित था ।४७। वह समारोहण करके भाले की धाराओं से वह शक्तियों की सेना का मर्दन करता था । एक अन्य वज्रदन्त नामक सेनापति बहुत ही बलवान् था ।४८। दो गृध्रों के रथ पर वह समारूढ़ था और वाणों के द्वारा सेना का निहनन कर रहा था । वे सेनापति अत्यन्त दुष्ट थे और उनके द्वारा युद्ध में सेना को प्रोत्साहन दिया गया था ।४६।

शतमक्षौहिणीनां च निपपातैकहेलया । सर्पिणी च दुराचारा बहुमायापरिग्रहा ॥५० क्षणे क्षणे कोटिसंख्यान्विससर्ज फणाधरान् ।