संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३०६
विदशंतः शक्तिसेनां दहंतो विषवह्निभिः ॥३८ बध्नंतो भोगपाशैश्च निघ्नंतः फणमण्डलैः । अत्यंतमाकुलां चक्रुललितेशीचमूममी ॥३९ खड्यमाना अपि मुहुः शक्तीनां शस्त्रकोटिभिः ॥४० उपर्युपरि वर्धंते सपिण्डप्रविसर्पिणः । नश्यन्ति बहवः सर्पा जायन्ते चापरे पुनः ॥४१ एकस्य नाशसमये बहवोऽन्ये समुत्थिताः । मूलभूता यतो दुष्टा सर्पिणी न विनश्यति ॥४२
और अन्य-अन्य वर्ण तथा बल से युक्त—चार मुखों वाले-चार पदों वाले उस सर्पिणी के नासिका के विवर से अत्यन्त उग्र कान्ति वाले उद्गत हो गये थे ।३६। लम्बे महासर्प से समावृत स्थूल पयोधरों से और उसकी नाभि के कुण्ड से बहुत से रक्त वर्ण वाले तथा भयानक उत्पन्न हुए थे ।३७। जो सर्प हालाहल को अपने मुखों से बहा रहे थे । ऐसे पन्नगाधिप समुत्थित हो गये थे । वे सब उस शक्तियों की सेना के सैनिकों का दंशन कर रहे थे तथा विषों की अग्नियों से दहन कर रहे थे ।३८। वे अपने भोग के पाशों से सैनिकों को बाँध रहे थे और फणों के मण्डलों से निहनन भी कर रहे थे । ये ललिता की सेना को अत्यन्त ही समाकुल कर रहे थे ।३९। यद्यपि वे शक्तियों के शस्त्रों के द्वारा जो करोड़ों ही थे बारम्बार काटे भी जा रहे थे तो भी काम कर रहे थे ।४०। वे ऊपर-ऊपर में सपिण्ड प्रविसर्पी बढ़ रहे थे । उनमें बहुत से सर्प नष्ट हो जाया करते हैं तथापि वे पुनः समुत्पन्न हो जाते हैं और दूसरे भी पैदा हो जाया करते हैं ।४१। जब एक का नाश का समय होता है तो अन्य बहुत से पैदा हो जाया करते हैं । कारण यही था कि जो मूल भूता सर्पिणी थी जिससे वे सब पैदा होते थे वह नष्ट नहीं होती है । अतः उससे बराबर सर्प समुत्पन्न होते चले जाते थे ।४२।
अतस्तत्कृतसर्पाणां नाशे सर्पांतरोद्भवः । ततश्च शक्तिसैन्यानां शरीराणि विषानलैः ॥४३ दह्यमानानि दुःखेन विप्लुतान्यभवन्नृणे । किंकर्तव्यविमूढेषु शक्तिचक्रेषु भोगिभिः ॥४४