संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विकिरंतः शक्तिसैन्ये विसस्रुः सर्पिणीतनोः ॥३२
धूम्रवर्णा द्विवदना सर्पा अतिभयंकराः ।
सर्पिण्या नयनद्वंद्वादुत्थिताः क्रोधदीपिताः ॥३३
पीतवर्णास्त्रिफणका दंष्ट्राभिर्विकटाननाः ।
सर्पिण्याः कर्णकुहरादुत्थिताः सर्पकोटयः ॥३४
अग्रे पुच्छे च वदनं धारयंतः फणान्वितम् ।
आस्यादा नीलवपुषः सर्पिण्याः फणिनोऽभवन् ॥३५
वे सब सर्प भी तक्षक और कर्कोटक के सी सदृश थे तथा वासुकि सर्प के समान कान्ति वाले थे । उनके वर्ण और शरीर भी अनेक वर्ण के थे तथा नाना भांति की दृष्टि से भयानक थे ।२६। अनेक प्रकार के विषों की ज्वाला से तीनों लोकों के निर्दग्ध करने वाले थे। वह विष भी कितने ही प्रकार का था—दारद-वत्सनाभ-कालकूट-सौराष्ट्र-घोर विष तथा ब्रह्म पुत्र विष था। शौक्लिकेय विष एवं अन्यान्य भी कई प्रकार के विष उनके प्रति-पन्न थे ।३०-३१। ये सभी तरह के विष उस सर्पिणी के शरीर से निकल रहे थे जो कि सर्प उस समय में समुत्पन्न हुए थे । उन सर्पों के मुख ऐसे थे जिनमें बहुत ही चञ्चल दो जीभें लपलपा रहा थी और वे विषों को उस शक्तियों की सेना में फैला रहे थे ।३२। उन सर्पों के दो-दो मुख धूम्रवर्ण के थे और वे सर्प बहुत ही अधिक भयंकर थे । उस सर्पिणी के दोनों नेत्रों से वे समुत्थित हुए थे और महान् क्रोध से दीपित थे ।३३। उन सर्पों के पीतवर्ण थे तथा तीन-तीन फण थे। उनकी दाढ़ों से उनके मुख बहुत ही विकट थे । उस सर्पिणी के कानों के कुहरों से करोड़ों ही सर्प उत्थित हो गये थे ।३४। वे आगे और पूछो में फणों से समन्वित मुखों को धारण करने वाले थे । आस्याद और नीले शरीरों वाले उस सर्पिणी के सर्प हुए थे ।३५।
अन्यैश्च बलवर्णाश्च चतुर्वक्त्राश्चतुष्पदाः ।
नासिकाविवरात्तस्या उद्गता उग्ररोचिषः ॥३६
लम्बमानमहाचर्मावृत्तस्थूलपयोधरात् ।
नाभिकुण्डाच्च बहवो रक्तवर्णा भयानकाः ॥३७
हलाहलं वहंतश्च प्रोत्थिताः पन्नगाधिपाः ।