भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 717

करंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३०७

प्रवृत्ते घोरसंग्रामे शक्तीनां च सुरद्विषाम् ।
अथ स्वबलमादाय पञ्चभिः प्रेरिता सती ।
सर्पिणी बहुधा सर्पान्विससर्ज शरीरतः ॥२८

इसके उपरान्त उन शक्तियों का और देव द्रोहियों का युद्ध प्रवृत्त हुआ था । वे परस्पर में सभी वीरों की भाषा में घने क्रोध को प्रोत्साहन दे रहे थे ।२२। उस समय में अत्यधिक संकुलता थी और परस्पर में भी एक दूसरे का ज्ञान नहीं हो रहा था । दानव गण और शक्तियों ने अपने-अपने करों में हथियार ग्रहण करके मारकाट की थी ।२३। परस्पर में जो आयुधों का संघट्टन हो रहा था उस रगड़ से आंच निकल रही थी । समस्त दिशाएं उस आयुधों की टक्कर से समुत्पन्न अग्नि के स्रोत से प्रच्छन्न हो गयी थीं ।२४। उस युद्ध में इतना रुधिरपात हुआ था कि उसकी नदियाँ बह निकली थीं और उसमें हाथी भी छिप गये थे । मांस का तो इतना विशाल कीच हो गया था कि उसमें रथों का मंडल गतिहीन हो गया था ।२५। वह युद्ध स्थल रुधिर-स्राव से पूर्ण था तथा उसमें जो केशों का जाल था वह शैवाल के ही सदृश दिखाई दे रहा था । वह युद्धस्थल अतीव निष्ठुर एवं विध्वंस समन्वित था । वहाँ पर जो सैनिकों का सिंहनाद हो रहा था उससे वह बहुत ही भयावह हो रहा था ।२६। उस समय जबकि शक्तियों का और असुरों का घोर संग्राम प्रवृत्त हुआ था तो वह बहुत ही तुमुल था और राक्षसियों को तृप्ति प्रदान करने वाला था । उस समय घोर जब अन्धकार छाया हुआ था और शस्त्रधारियों के शरों से निरन्तर दैत्यों के कंठों से रुधिर निकल रहा था । इसके अनन्तर अपने दल को लेकर पाँचों सेनापतियों के द्वारा प्रेरित हुई सर्पिणी ने प्रायः शरीर से सर्पों का सृजन किया था ।२७-२८।

तक्षकंकोटसमा वासुकिप्रमुखत्विषः ।
नानाविधवपुर्वर्णा नानादृष्टिभयङ्कराः ॥२६
नानाविधविषज्वालानिर्दग्धभुवनत्रयाः ।
दारदं वत्सनाभं च कालकूटमथापरम् ॥३०
सौराष्ट्रं च विषं घोरं ब्रह्मपुत्रमथापरम् ।
प्रतिपन्नं शौक्लिकेयमन्यान्यपि विषाणि च ॥३१
व्यालैः स्वकीयवदनैर्विलोलरसनाद्वयैः ।

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