संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३११
तथा विकलितं सैन्यमवलोक्य रुषाकुला ॥५१ नकुली गरुडारूढा सा पपात रणाजिरे । प्रतप्तकनकप्रख्या ललितातालुसम्भवा ॥५२ समस्तवाङ्मयाकारा दंतैर्वज्रमयैर्युता । सर्पिण्यभिमुखं तत्र विससर्ज निजं बलम् ॥५३ तयाधिष्ठिततुंगांसः पक्षविक्षिप्तभूधरः । गरुडः प्राचलद्युद्धे सुमेरुरिव जङ्गमः ॥५४ सर्पिणीमायया जातान्सर्पान्दृष्ट्वा भयानकान् । क्रोधरक्तेक्षणं व्यात्तं नकुली विदधे मुखम् ॥५५ अथ श्रीनकुलीदेव्या द्वात्रिंशद्दंतकोटयः । द्वात्रिंशत्कोटयो जाता नकुलाः कनकप्रभाः ॥५६
सौ अक्षौहिणी सेना का एक ही हेला से निपतन हो गया था। वह सर्पिणी बहुत ही दुष्ट आचार वाली थी और बहुत-सी मायाओं के परिग्रह वाली भी थी ॥५०। वह एक-एक क्षण में करोड़ों-करोड़ों सर्पों का सृजन कर रही थी। इसके पश्चात् वह सम्पूर्ण सेना बेचैन हो गयी थी। ऐसा देखकर वह—देवी बहुत ही रोष से युक्त हो गयी थी ॥५१। वह नकुली गरुड़ पर समारूढ़ा उस रणाङ्गन में आ गयी थी। वह ललिता देवी के तालु से उत्पन्न हुई थी और तपे हुए सुवर्ण के समान थी ॥५२। उसका समस्त वाङ्मय आकार था और उसके दांत वज्रमय थे। उसने वहाँ पर अपना बल उस सर्पिणी के समक्ष में सृजन किया था ॥५३। वह गरुड़ भी ऐसा था जिसके बहुत उच्च अंश थे और वह अपने पंखों से पर्वतों को भी विक्षिप्त कर रहा था। वह गरुड़ उस युद्ध में चल दिया था जो साक्षात् जङ्गम सुमेरु के ही समान था ॥५४। सर्पिणी की माया से समुत्पन्न परमाधिक भयानक सर्पों को देखकर स नकुली ने क्रोध से लाल नेत्रों वाला अपना मुख खुला हुआ कर दिया था ॥५५। इसके पश्चात् श्री नकुली देवी की बत्तीस करोड़ सेना नकुलों की समुत्पन्न हो गयी थी और सुवर्ण की प्रभा वाले नकुल उत्पन्न हो गये थे ॥५६।
इतस्ततः खण्डयन्तः सर्पिणीसर्पमण्डलम् । निजदंष्ट्राविमर्देन नाशयन्तश्च तद्विषम् ।