संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
व्यभ्रमन्समरे घोरे विषघ्नाः स्वर्णबभ्रवः ॥५७ उत्कर्णा क्रोधसम्पर्काद्धूनिताशेषलोमकाः । उत्फुल्ला नकुला व्यात्तवदना व्यदशन्नहीन् ॥५८ एकैकमायासर्पस्य बभ्रुरेकैक उद्गतः । तीक्ष्णदंतनिपातेन खण्डयामास विग्रहम् ॥५६ भोगिभोगसृतै रक्तैः सृक्किणी शोणतां गते । लिहंतो नकुला जिह्वापल्लवैः पुप्लुवुर्मृधे ॥६० नकुलैर्दश्यमानानामत्यन्तचटुलं वपुः । मुहुः कुण्डलितैर्भोगैः पन्नगानां व्यचेष्टत ॥६१ नकुलावलिदष्टानां नष्टासूनां फणाभृताम् । फणाभरसमुत्कीर्णा मणयो व्यरुचन्मृधे ॥६२ नकुलाघातसंशीर्णफणाचक्रैर्विनिर्गतैः । फणयस्तन्महोद्रोहवह्निज्वाला इवाबभुः ६३
वे नकुल सर्पिणी के सर्पों के मण्डल को अपनी दाढ़ों के विमर्दन से उनके विषों का विनाश कर रहे थे तथा उस महान् घोर समर स्थल में इधर-उधर वे नकुल स्वर्ण के समान चमकते हुए विष का नाश करने वाले भ्रमण करने लगे थे ।५७। उन समस्त नकुलों के दोनों कान ऊपर की ओर उठे हुए थे और क्रोध के सम्पर्क से वे अपने लोमों को उद्धूलित कर रहे थे । इस तरह से फूले हुए अपने मुँहों को खोले हुए सर्पों का विनाश करने वाले हुए थे ।५८। एक-एक माया से निर्मित सर्प के लिये एक-एक ही नकुल उद्गत हो गया था और ये अपने परमाधिक तीक्ष्ण दांतों के द्वारा सर्पों के शरीरों का खण्डन कर रहे थे ।५६। सर्पों के फणों से निकले हुए रुधिर से नकुलों की सृक्किणियां लाल हो गयी थीं और वे अपनी जिह्वा से उस रुधिर को चाटते हुए स्वयं भी उस युद्ध में प्लावित हो गये थे ।६०। उन नकुलों के द्वारा काटे गये उनके शरीर अत्यन्त चटुल हो गये थे और बारम्बार सर्पों के कुण्डलित भोगों के साथ वे विचेष्टा कर रहे थे ।६१। नकुलों के समुदाय के द्वारा काटे गये सर्पों के प्राण जा चुके थे और उनके फणों के भार से निकल कर गिरी हुई मणियाँ उस समराङ्गण में चमक