संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३१३
रहीं थीं ।६२। उन नकुलों के प्रहारों के द्वारा सर्पों के फणों के समुदाय से निर्गत मणियों के समूहों से वे समस्त सर्प उस समर स्थल में अग्नियों की ज्वालाओं के ही समान दिखलायी दे रहे थे ।६३।
एवं प्रकारतो बभ्रुमण्डलै रवखण्डिते । मायामये सर्पजाले सर्पिणीकोपमादधे ॥६४
तया सह महद्युद्धं कृत्वा सा नकुलेश्वरी । गारुडास्त्रमतिक्रूरं समाधत्त शिलीमुखे ॥६५
तद्गरुडास्त्रमुद्दामज्वालादीपितदिङ्मुखम् । प्रविश्य सर्पिणीदेहं सर्पमायां व्यशोषयत् ॥६६
मायाशक्तेर्विनाशेन सर्पिणी विलयं गता । क्रोधं च तद्विनाशन प्राप्ताः पञ्च चमूचराः ॥६७
यद्बलेन सुरान्सर्वान्सेनान्यस्तेऽवमेनिरे । सा सर्पिणी कथाशेषं नीता नकुलवीर्यतः ॥६८
अतः स्वबलनाशेन भृशं क्रुद्धाश्चमूचराः । एकोद्यमेन शस्त्रौघैर्नंकुलीं तामवाकिरन् ॥६९
एकैव सा तार्क्ष्यंरथा पञ्चभिः पृतनेश्वरी । लघुहस्ततया युद्धं चक्रे वै शस्त्रवर्षिणी ॥७०
इस प्रकार से नकुलों के समुदाय के द्वारा जब सर्पों के मंडल अव- खण्डित हो गये थे तो मायामय सर्पों का समूह नष्ट हो जाने पर सर्पिणी को बड़ा भारी क्रोध हो गया था ।६४। उस सर्पिणी के साथ उस नकुलीश्वरी ने महान् युद्ध करके उसने अपने शिलीमुख में अत्यधिक क्रूर गरुडास्त्र धारण किया था ।६५। उस गरुडास्त्र ने जिसमें अत्यधिक ज्वालाएँ निकल रहीं थीं और समस्त दिशाएँ जिनसे चमक रही थीं, सर्पिणी के देह में प्रवेश किया था और उस सर्पों की माया का शोषण कर दिया था ।६६। जब उसकी उस माया की शक्ति का विनाश हो गया था तब वह सर्पिणी विलीन हो गयी थी और उसके विनाश हो जाने से वे जो पाँच सेनापति थे उनको बहुत अधिक क्रोध हो गया था ।६७। वे सेनानी जिसके बल से समस्त सुरों का भी अपमान कर देते थे वह सर्पिणी के पराक्रम से विनष्ट हो गयी थी