संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरंकादि पंच सेनापति वध ] [ ३१७
उसके अस्त्र से निकले हुए करोड़ों नकुल बाहिर हुए थे जिनके वज्र के समान अङ्ग थे—वज्र जैसे ही लोम थे और वज्र के तुल्य दंष्ट्राएँ थी तथा उनका महान् वेग था ।८५। वे सभी वज्र के समसार वाले—निविड़ और वज्र जाल के सदृश भयंकर थे । उनके नख भी वज्र जैसे आकार वाले थे उनसे वे इस महीतल को विदीर्ण कर रहे थे ।८५-८६। वे वज्र रत्न के समान प्रकाश वाले नेत्रों से भी शोभा वाले थे और जैसे वज्र का पात होता है वैसा ही उनका सम्पात भी था । वे अपनी नासिकाओं से चीखें मारने वाले थे ।८७। वे अपने दांतों के कौनों से असुरों के सेनाओं का मर्दन करते हैं । निरपराधी उन्होंने अनेक प्रकार के पराक्रम को प्रदर्शित किया था ।८८। इस रीति से महान बल वाले तथा वज्र के तुल्य घोर नकुलों की कोटियों से वे अधम दानव अपने शरीरों के प्रत्येक अवयवों से विनष्ट हो गये थे ।८६। इस तरह वज्र पूर्ण नकुलों के मण्डलों से दैत्यों की सेनाएं छिन्न-भिन्न हो गयी थीं ।६०। सौ अक्षौहिणी की संख्या में वे केवल स्वयं ही बचे थे तब तो उनने बड़े क्रोध से और अत्यधिक त्रास से उन चमूबरों को ग्रहण किया था । अपने धनुषों को खींच कर उन्होंने और अधिक संग्राम किया था ।६१।
तैः समं बहुधा युद्धं तन्वाना नकुलेश्वरी ।
पट्टिशेन करंकस्य चिच्छेद कठिनं शिरः ॥६२
काकवाशितमुख्यानां चतुर्णामपि वैरिणाम् ।
उत्पत्योत्पत्य तार्क्ष्येण व्यलुनादसिना शिरः ॥६३
तादृशं लाघवं दृष्ट्वा नकुल्या श्यामलांबिका ॥६४
बहु मेने महासत्त्वां दुष्टासुरविनाशिनाम् ।
निजांगदेवतातत्त्वं च तस्यै श्यामांबिका ददौ ॥६५
लोकोत्तरे गुणे दृष्टे कस्य न प्रीतिसंभवः ।
हतशिष्टा भीतभीता नकुलीशरणं गताः ॥६६
सापि तान्वीक्ष्य कृपया मा भैष्टेति विहस्य च ।
भवद्राज्ञे रणोदंतमशेषं च निबोधत ॥६७
तयैवं प्रेषिताः शीघ्रं तदालोक्य रणक्षितिम् ।