संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 726, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें३१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वाले और महान बलवान थे ।७९। उनने प्रत्येक नकुल के ऊपर शरों के समूहों की मेघों की भाँति वर्षा की थी । दैत्यों के सेनापतियों के परम प्रौढ़ धनुषों से निकले हुए बाणों ने नकुलों के करोड़ों दाँतों पर अथवा दाँतों के कोनों पर अतीव कठोर घट्टन किया था । अर्थात् जोरदार प्रहार किये थे ।८०। सैकड़ों से भी अधिक सेनानियों के बाणों के समुदायों से आहत नकुलों के वज्र के समान दाँतों से अग्नि की चिनगारियों निकल रही थीं । उन पाँचों सेनापतियों ने एक ही हल्ले में मिलकर सेना का विमर्दन कर दिया था । सेनानियों के द्वारा छोड़े हुए बाणों से जो करोड़ों की संख्या में थे विशीर्ण शरीरों वाले विचारे नकुल इधर-उधर घूमते गए नकुली के आस-पास घिरकर समागत हो गये थे ।८१-८२। इसके अनन्तर वाङ्मय की एक देवता वह नकुली नकुलों की परावृत्ति से बड़े भारी क्रोध में भर गयी थी । ।८३। उस नकुली ने अक्षीण नकुल नामक महास्त्र को जिसका सभी ओर मुख था और जो वह्नि की ज्वालाओं से घिरे हुए अग्रभाग वाला था उस को अपने धनुष पर चढ़ाया था ।८४।
तदस्त्रतो विनिष्च्यूता नकुलाः कोटिसंख्यकाः ।
वज्राङ्गा वज्रलोमानो वज्रदंष्ट्रा महाजवाः ॥८५
वज्रसाराश्च निबिडा वज्रजालभयंकराः ।
वज्राकारैर्नखैस्तूर्णं दारयन्तो महीतलम् ॥८६
वज्ररत्नप्रकाशेन लोचनेनापि शोभिताः ।
वज्रसंपातसदृशा नासाचीत्कारकारिणः ॥८७
मर्दयन्ति सुरारातिसैन्यं दशनकोटिभिः ।
पराक्रमं बहुविधं तेनिरे ते निरेनसः ॥८८
एवं नकुलकोटीभिर्वज्रघोरैर्महाबलैः ।
विनष्टाः प्रत्यवयवं विनेशुर्दानवाधमाः ॥८९
एवं वज्रमयैर्बभ्रुमण्डलः खण्डिते बले ॥६०
शताक्षौहिणिके संख्ये ते स्वमात्रावशेषिताः ।
अतित्रासेन रोषेण गृहीताश्च चमूचराः ।
संग्राममधिकं तेनुः समाकृष्टशरासनाः ॥६१