भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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दुर्मंद कुरंड वध वर्णन ] [ २६७

इसके अनन्तर क्रोध से लाल नेत्रों वाली उस देवी के द्वारा छोड़े हुए बाणों से शीघ्र ही वक्षः स्थल में विक्षत हुआ था और उस दुर्मंद ने अपने प्राणों को त्याग दिया था ।६४। इसके अनन्तर शक्ति की श्रेष्ठ सेनाओं ने किल-किल की ध्वनि की थी और उन्होंने उस दैत्य के जो परम श्रेष्ठ अन्य सैनिक दानव थे उन सबको मार गिराया था ।६५। मरने से बचे हुए जो भी दैत्य थे वे सब शक्ति के बाणों से चुटैल होकर उस रण की भूमि से भाग गये थे और शून्यक में जाकर छिप गये थे।६६। उनके द्वारा शक्तिद्वारा किये हुए युद्धके वृत्तान्त का श्रवण करके वह दानवेश्वर बहुत ही क्रुद्ध होगया था।६७। उदग्र नेत्रों वाला वह अपने प्रचण्ड प्रभाव से आत्मा से दीप्यमान जैसा हो गया था और उसने युद्ध करने के लिए अपने खड्ग को उठाया था । और उसने समीप में ही स्थित सेनापति कुटिलाक्ष से कहा था ।६८। किस प्रकार से उस महादुष्टा नारी ने बड़े भारी बल वाले दुर्मंद को युद्ध में मार गिराया है । यह विधाता का क्रम बड़ा कष्ट दायक है ।६६। ऐसा महान बल तो न देवों में है और न यक्षों में है और उरगेन्द्रों में भी ऐसा बल विद्यमान नहीं है वह तो ऐसा बलवान था कि उसका मारने वाला कोई भी नहीं था, वह दुर्मंद भी उस अबला के द्वारा मारा गया है ।७०।

तां दुष्टवनितां जेतुमाक्रष्टुं च कचं हठात् । सेनापति कुरंडाख्यं प्रेषयाहवदुर्मंदम् ॥७१

इति संप्रेषितस्तेन कुटिलाक्षो महाबलम् । कुरंडं चंडदोर्दण्डमाजुहाव प्रभोः पुरः ॥७२

स कुरंडः समागत्य प्रणामं स्वामिनेऽदिशत् । उवाच कुटिलाक्षस्तं गच्छ सज्जाय सैनिकान् ॥७३

मायायां चतुरोऽसि त्वं चित्रयुद्धविशारद । कूटयुद्धे च निपुणस्तां स्त्रियं परिमर्दय ॥७४

इति स्वामिपुरस्तेन कुटिलाक्षेण देशितः । निजंगाम पुरात्तूर्णं कुरंडंचण्डविक्रमः ॥७५

विंशत्यक्षौहिणीभिश्च समंतात्परिवारितः । मर्दयन्स महीगोलं हस्तिवाजिपदातिभिः । दुर्मंदस्याग्रजश्चंडः कुरंडः समरं ययौ ॥७६