संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दिया था ।५७। इसके पश्चात् बाणों के अत्यन्त संघट्ट से समुत्पन्न विस्फुलिंग हो गये थे फिर वे विस्फुलिंग इधर-उधर भ्रमण करने की चातुरी वाले हो गये थे ।५८। सुन्दर श्रोणी वाली उस देवी के द्वारा अधिरूढ़ गज जो रण कोलाहल नाम वाला था उसने उस संग्राम में बहुत प्रकार का पराक्रम प्रदर्शित किया था ।५९। उस गज ने भी कुछ असुरों को तो अपनी सूँड़ से और कुछ दैत्यों को अपने पदों की चोट से तथा कुछ को अपने तीक्ष्ण दाँतों के मुसलों की चोटों से मार डाला था ।६०। बालकांड से अन्यों को चोट दी थी तथा अन्यों को फेत्कारों के द्वारा शत्रु को निहत किया था। कुछ को अपने शरीर के द्वारा मर्दित किया था एवं अन्य शत्रुओं को अपने नखों के प्रहारों से मार डाला था ।६१। कुछ दैत्यों को उस गज ने पृथुमानाभिघात से विमर्दित कर दिया था। इस तरह से उस सम्पद्देवी के हाथी ने बहुत ही कौशल से पूर्ण अपना चरित दिखाया था ।६२। सुदुर्मद ने परमाधिक क्रोध से लाल होते हुए एक सुदृढ़ बाण से उस सम्पत्करी देवी के मुकट में स्थित एक मणि को गिरा दिया था ।६३।
अथ क्रोधारुणदृशा तया मुक्तैः शिलीमुखैः ।
विक्षतो वक्षसि क्षिप्रं दुर्मदो जीवितं जहौ ॥६४
ततः किलकिलारावं कृत्वा शक्तिचमूवरैः ।
तत्सैनिकवरास्त्वन्ये निहता दानवोत्तमाः ॥६५
हतावशिष्टा दैत्यास्तु शक्तिबाणैः खिलीकृताः ।
पलायिता रणक्षोण्याः शून्यकं पुरमाश्रयन् ॥६६
तद्वृत्तांतमथाकर्ण्य संक्रुद्धो दानवेश्वरः ॥६७
प्रचंडेन प्रभावेण दीप्यमान इवात्मनि ।
स पस्पर्श नियुद्धाय खड्गमुग्रविलोचनः ।
कुटिलाक्षं निकटगं बभाषे पृतनापतिम् ॥६८
कथं सा दुष्टवनिता दुर्मदं बलशालिनम् ।
निपातितवती युद्धे कष्ट एव विधेः क्रमः ॥६६
न सुरेषु न यक्षेषु नोरगेंद्रेषु यद्बलम् ।
अभूत्प्रतिहतं सोऽपि दुर्मदोऽबलया हतः ॥७०