संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ २६५
देवी की सेना क्षण भर के लिए रणस्थल में स्तम्भित सी ही हो गयी थी। ।५१। इसके अनन्तर महान क्रोध से लाल नेत्रों को धारण करती हुई सम्पदम्बिका रण कोलाहल नामक गज पर समारूढ़ होकर इस दानव के साथ युद्ध करने लगी थी ।५२। कुछ थोड़ा चंचल कङ्कण की क्वणन की ध्वनि से विशेष सुन्दर उसके कर ने उस युद्ध में धनुष की मौर्वी को कानों तक खींचा था ।५३। हाथ के हलकेपन से न तो मौर्वी को खींचते हुए देखा था और न उसके छोड़ने को ही देखा था केवल शर के धारण करते ही देखा गया था जो धनुष पर लगाया था ।५४। शीघ्र ही अर्काम्बर के सम्पर्क से प्रतिफलित फल वाले शरसंपत्करी के चाप से गिरे हुए शत्रुओं का सन्दाह कर देते थे । ।५५। उस देवी का और दुर्मद का अत्यन्त ही अद्भुत युद्ध हुआ था जो कि परस्पर में एक दूसरे के संघट्ट से विस्फुलिंग निकलने वाले वाणों के द्वारा किया गया था ।५६।
प्रथमं प्रसृतैर्बाणैः सम्पद्देवीसुरद्विषोः ।
अन्धकारः समभवत्तिरस्कुर्वन्नहस्करम् ॥५७
तदन्तरे च बाणानामतिसंघट्टयोनयः ।
विस्फुलिंगा विदधिरे दधिरे भ्रमचातुरीम् ॥५८
तयाधिरूढः संश्रोण्या रणकोलाहलः करी ।
पराक्रमं बहुविधं दर्शयामास संगरे ॥५९
करेण कतिचिद्दैत्यान्पादघातेन कांश्चन ।
उदग्रदन्तमुसलघातैरन्यांश्च दानवान् ॥६०
बालकांडहतैरन्यान्फेत्कारैरपरान्रिपून् ।
गात्रव्यामर्द्दनैरन्यान्नखघातैस्तथापरान् ॥६१
पृथुमानाभिघातेन कांश्चिद्दैत्यान्व्यमर्दयत् ।
चतुरं चरितं चक्रे संपद्देवीमतंगजः ॥६२
सुदुर्मदः क्रुधा रक्तो दृढेनैकेन पत्रिणा ।
संपत्करीमुकुटगं मणिमेकमपाहरत् ॥६३
सम्पद्देवी और उस सुरों के शत्रु के प्रसृत बाणों से सर्व प्रथम ऐसा अन्धकार हो गया था जिसने सूर्य के तेज के आलोक को भी तिरस्कृत कर