भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

दो। तू दुर्गों को संग्रहण करो जहां पर सैकड़ों ही क्षेपणिकाएं होवें ।६६। मन्त्रियों और पुरोहितों के द्वारा दुष्ट अभिचार कर्मानुष्ठान करना चाहिए । तुम शस्त्रों को सज्ज्रित करो क्योंकि यह युद्ध अब उपस्थित हो गया है ।६७। सेनापतियों में जो कोई भी हैं उनको इसी समय हमारे सामने करो । जो अनेक बल के संघात के सहित घोर दर्शन वाले हैं ।६८।

तेन संग्रामसमये सन्निपत्य विनिर्जितम् ।
केशेष्वाकृष्य तां मूढां देवसत्त्वेन दर्पिताम् ॥६६
इत्याभाष्य चमूनाथे सहस्रत्रितयाधिपम् ।
कुटिलाक्षं महासत्त्वं स्वयं चान्तःपुरं ययौ ॥१००
अथापतन्त्याः श्रीदेव्या यात्रानिःसाणनिःस्वनाः ।
अश्रूयंत च दैत्येन्द्रैरतिकर्णज्वरावहाः ॥१०१

उसने संग्राम के समय में आगे समापतित होकर विजय प्राप्त की है। देवों के सत्त्व से बहुत ही दर्प वाली उसको महामूढ़ा को चोटी खींचकर खींच लाओ ।६६। तीन सहस्र के अधिप महान् सत्त्व वाले चमू के नाथ कुटिलाक्ष से यह कहकर वह भण्ड अन्तःपुर में चला गया था ।१००। इसके अनन्तर आक्रमण करके आती हुई श्री देवी की यात्रा के निःसाथ महान् घोर ध्वनियां दैत्येन्द्रों के द्वारा सुनायी दी थीं जो कानों को बहुत ही दुःखद हो रही थीं ।१०१।

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दुर्मद कुरंड वध वर्णन

अथ श्रीललितासेना निस्साणाप्रतिनिस्वनः ।
उच्चचालासुरेन्द्राणां योद्धतो दुन्दुभिध्वनिः ॥१
तेन मर्दितदिक्केन क्षुभ्यद्गर्भपयोधिना ।
बधिरीकृतलोकेन चकम्पे जगतां त्रयी ॥२
मर्द्यन्ककुभां वृन्दं भिन्दन्भूधरकन्दराः ।
पुप्रोथे गगनाभोगे दैत्यनिःसाणनिस्वना ॥३
महानरहरिक्रुद्धहुङ्कारोद्धतिमद्धनिः ।
विरसं विररासोच्चैर्विबुधद्वेषिझल्लरी ॥४