भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 695

भंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २८५

हिरण्याक्ष के तुल्य हैं ।८५-६०। उनके एक-एक के सैकड़ों से भी अधिक पुत्र हैं बहुत ही शूर उत्पन्न हुए हैं । मेरे सेनानी मदोद्धत हैं और मेरे पुत्रों के पीछे दौड़ लगाने वाले हैं ।६१।

नाशयिष्यन्ति समरे प्रोद्धतानमराधमान् । ये केचित्कुपिता युद्धे सहस्राक्षौहिणी वराः । भस्मशेषा भवेयुस्ते हा हन्त किमुताबला ॥६२ मायाविलासाः सर्वेऽपि तस्याः समरसीमनि । महामायाविनोदाश्च कुप्युस्ते भस्मसाद्बलम् ॥६३ तद्वृथा शंकया खिन्नं मा ते भवतु मानसम् । इत्युक्त_वा भंडदैत्येन्द्रः समुत्थाय नृपासनात् ॥६४ उवाच निजसेनान्यं कुटिलाक्षं महाबलम् । उत्तिष्ठ रे बलं सर्वं संनाहय समंततः ॥६५ शून्यकस्य समंताच्च द्वारेषु बलमर्पय । दुर्गाणि संगृहाण त्वं कुरु क्षेपणिकाशतम् ॥६६ दुष्टाभिचाराः कर्तव्या मन्त्रिभिश्च पुरोहितैः । सज्जीकुरु त्वं शस्त्राणि युद्धमेतदुपस्थितम् ॥६७ सेनापतिषु ये केचिदग्रे प्रस्थापयाधुना । अनेकबलसंघातसहितं घोरदर्शनम् ॥६८

जब भी संग्राम होगा तब उसमें ये लोग प्रोद्धत और अधम अमरों का नाश कर देंगे । जो कोई भी युद्ध में कुपित होंगे परम श्रेष्ठ सहस्रों अक्षौहिणी सेनाएं हैं वे सब भस्मीभूत ही हो जांयगे । हा ! हन्त ! विचारी स्त्रियां क्या हैं अर्थात् युद्ध में ये क्या ठहर सकती हैं ।६२। उसके समर की सीमा में सभी माया के विलास वाले हैं तथा महामाया के विनोद से सम- न्वित हैं । जब वे मेरे शूर कोप करेंगे तब सम्पूर्ण बल भस्मसात् हो जायगा ।६३। सो व्यर्थ ही शंका से तुम्हारा मन खिन्न नहीं होवे । इतना यह कहकर भण्डदैत्येन्द्र नृप के आसन से उठकर खड़ा हो गया था ।६४। और महाबली कुटिलाक्ष सेनानी से बोला था । रे उठ जाओ और अपनी समस्त सेना को सब ओर से सज्जित करो ।६५। और शून्य के सब ओर द्वारों पर सेना लगा

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