संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभंडासुर अहङ्कार वर्णन ] [ २७३
अट्टालकेषु गोष्ठेषु विपणेषु सभासु च। चतुष्किकास्वालिन्देषु प्रग्रीवेषु वलेषु च ॥१४॥
उस दैत्य के पुर में निवास करने वाले लोग अकाल में ही हृदय के कम्प से संयत होगये थे। ध्वजाओं के आगे रहने वाले कंक-गृध्र-वक और पक्षी आदित्य मंडल में देख-देखकर बड़े ऊँचे स्वर से क्रन्दन करने लगे। वहाँ पर बहुत से (क्रव्याद राक्षस) गण थे जो नेत्रों के द्वारा दिखलाई नहीं दिये गये थे ।८-६। बार-बार आकाश वाणियों के द्वारा बोलते थे और सभी ओर दिशाओं में केतु बहुत ही मलिन दिखलाई दे रहे थे ।१०। वे सब घूमा-यमान हो रहे थे और दैत्यों तथा राक्षसों के हृदयों में बड़े भारी क्षोभ को उत्पन्न करने वाले थे। और असमय में ही दैत्यों की स्त्रियों के भूषण और मालाएं भ्रष्ट होकर गिर रहे थे ।११। हा-हा-ध्वनि करके अश्रुपात करती हुई रुदन की ध्वनि में सब रो रही थीं। वहाँ पर दर्पण-वर्म-ध्वजा-खंग और सम्पदाएं एवं मणि तथा वस्त्रों में बार-बार मलिनता हो गयी थी। सौधों में-चन्द्र शालाओं में और सभी ओर केलि करने के गृहों में महान् भीषण घोष सुनाई दिया करता था ।१२-१३। अट्टालिकाओं में—गोष्ठों में—विपणों में और सभा भवनों में—चतुष्किकाओं में-अलिन्दों में-प्रग्रीवों में और वलों में सर्वत्र महान् अशुभ एव कठोर घोष सुनाई देता था ।१४।
सर्वतोभद्रवासिषु नन्द्यावर्तेषु वेश्मसु । विच्छिद्रकेषु संक्षुब्धेष्ववरोधनपालिषु । स्वस्तिकेपु च सर्वेषु गर्भाङ्गारपुटेषु च ॥१५॥
गोपुरेषु कपाटेपु वलभीनां च सीमसु । वातायनेषु कक्ष्यासु धिष्ण्येषु च खलेषु च ॥१६॥
सर्वत्र दैत्यनगरवासिमर्जनमंडलैः । अश्रूयन्त महाघोषाः परुषा भूतभाषिताः ॥१७॥
शिथिली सर्वतो जाता घोररूपा भयानका । करटैः कटुकालापैरवलोकि दिवाकरः । आराविषु करोटीनां कोट्यश्चापतन्भुवि ॥१८॥