संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अकाल एव निर्भिन्ना भित्तयो दैत्यपत्तने । घूर्णमाना पतन्ति स्म महोल्का गगनस्थलात् ॥६ उत्पातानां प्राथमिको भूकंपः पर्यवर्तत । मही जज्वल सकला तत्र शून्यकपत्तने ॥७
श्री ललिता देवी की यात्रा के निगम के घोष का श्रवण करके भंडासुर के पुर में निवास करने वाले बड़े भारी क्षोभ को प्राप्त होगये थे ।१। जहाँ पर दुराश और दुष्ट मति वाले भंड का नगर है वह महेन्द्र पर्वत के उपान्त में और महार्णव के तट पर है ।२। वह तो शून्यक के नाम से ही तीनों भुवनों में विख्यात है। वहाँ पर विषंगाग्रज दैत्य का सदा ही आवास हुआ था ।३। सौ योजन के विस्तार वाले उसके उसी पुर में विश्रेयुर सुर सञ्च श्री देवी के आगम के संभ्रम से सौ योजन विस्तीर्ण वह सम्पूर्ण असुरों का पुर बार-बार उत्पातों से समुत्पन्न धूमों से आवृत के ही समान हो गया था ।४-५। अकाल में ही उस दैत्य के नगर में भित्तियाँ निर्भित होगयी थीं। गगन स्थल से घूर्णमान महोल्का गिरा करते थे ।६। उत्पातों का सबसे प्रथम होने वाला भूकम्प हुआ था । वहाँ पर उस शून्यक पत्तन में सम्पूर्ण भूमि ज्वलित हो गयी थी ।७।
अकाल एव हृत्कंपं भेजुर्दैत्यपुरोकसः । ध्वजाग्रवर्तिनः कंकगृध्राश्चैव बकाः खगाः ॥८ आदित्यमंडले दृष्ट्वा दृष्ट्वा चक्रं दुरुच्चकैः । क्रव्यादा बहवस्तत्र लोचनैर्नावलोकिताः ॥९ मुहुराकाशवाणीभिः परुषाभिर्बभाषिरे । सर्वतो दिक्षु दृश्यंते केतवस्तु मलीमसाः ॥१० धूमायमानाः प्रक्षोभजनका दैत्यरक्षसाम् । दैत्यस्त्रीणां च विश्रंशा अकाले भूषणस्रजः ॥११ हाहेति दूरं क्रन्दंत्यः पर्यश्रु समरोदिषुः । दर्पणानां वर्मणां च ध्वजानां खड्गसंपदाम् ॥१२ मणीनामंबराणां च मालिन्यमभवन्मुहुः । सौधेषु चन्द्रशालासु केलिवेश्मसु सर्वतः ॥१३