संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभंडासुर अहंकार वर्णन ] [ २७१
तैः स्तूयमाना ललिता राजमाना रथोत्तमे ॥१०५ भंडासुरं विनिर्जेतुमुद्दण्डैः सह सैनिकैः ॥१०६
जिस समय ईशानी ललिता देवी का विनिर्गम हुआ था उस समय में सभी प्राणी महान क्षुब्ध हो गये थे। देवगण दुन्दुभियां बजाने लगे थे तथा पुष्पों की वर्षा कर रहे थे ॥१००। विश्वावसु प्रभृति गन्धर्वगण जो सुरों के यहाँ गायक थे—तुम्बरु और नारद तथा साक्षात् सरस्वती देवी सब विजय के मंगल पद्यों का बहुत सुन्दर गीतों में पाठ कर रहे थे। सबके हर्ष से मुख खिले हुए थे तथा रोमाञ्चों के भूषण स्फुरित हो रहे थे। सभी बारम्बार जय हो—जय हो—इस प्रकार से ललितेश्वरी का स्तवन कर रहे थे ॥१०१-१०२। सभी कदम कदम पर हर्ष से युक्त और मद से उन्मत्त हो रहे थे तथा नृत्य कर रहे थे। सप्तर्षिगण जिनमें वसिष्ठ आदि महा मुनिगण थे वे ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामवेद और अथर्ववेद के मन्त्रों से जय श्री का वर्णन कर रहे थे। जिस तरह से हवि से महा वह्नि को शिखा अत्यन्त पाविनी होती हैं वैसे ही ये सभी उत्तम ऋषिगण महान आशीर्वाद से वर्धन कर रहे थे। उनके द्वारा इस प्रकार से स्तवन की गयी ललिता उस उत्तम रथ में विराजमान हो रही थीं। वह देवी परम उद्दण्ड सैनिकों के साथ भंडासुर पर विजय प्राप्त करने को रवाना हुई थी ॥१०३-१०६।
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भंडासुर अहंकार वर्णन
आकर्ण्य ललितादेव्या यात्रानिर्गमनिस्वनम् । महान्तं क्षोभमायाता भंडासुरपुरालयाः ॥१ यत्र चास्ति दुराशस्य भंडदैत्यस्य दुर्धियः । महेन्द्रपर्वतोपांते महार्णवतठे पुरम् ॥२ तत्तु शून्यकनाम्नैव विख्यातं भुवनत्रये । विषंगाग्रजदैत्यस्य सदावासः किलाभवत् ॥३ तस्मिन्नेव पुरे तस्य शतयोजनविस्तरे । वित्रैसुरसुराः सर्वे श्रीदेव्यागमसंभ्रमात् ॥४ शतयोजनविस्तीर्णं तत्सर्वं पुरमासुरम् । धूमैरिवावृतमभूदुत्पातजनितैर्मुहुः ॥५