संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २६१
वार्त्ताल्याद्या अष्ट देव्यो दिक्ष्वष्टासूपविश्रुताः ।।३४।
अष्टपर्वतनिष्पातघोरनिर्घातनिः स्वनाः ।
अष्टनागस्फुरद्भूषा अनष्टबलतेजसः ।।३५।
अपने मुकुट के स्थान में स्वकीय आयुधों के विग्रह को धारण करते हुए जगत् के नाशक का देवगणों ने स्मरण किया था ।२९। इसको आयुधों के जोड़े से दण्ड नायिका ललिता विषङ्ग नामदानह संग्राम का खण्डन कर देगी ।३०। दण्डनाथा के उसी पर्व की अग्र सीमा में वर्त्तमान महान् भीम-सिंह वर्त्तमान है जो अपनी गर्जना से नभो मण्डल को ध्वनित कर रहा था ।३१। वह अपने दांतों को कटकटा रहा था जिस कट कटाहटसे सब दिशाओं में बधिरता छा गयी थी यह चंडोच्चंड—इस नाम ने विख्यात था और यह हाथ का तथा तीन लोचनों वाला था ।३२। यह शूल-खंग-प्रेत और पाशों को धारण करने वाला तथा परम दीप्त विग्रह था । यह सदा ही पोत्रिणी की ओर ही देखता हुआ देवी की सेवा किया करता है ।३३। किरिचक्र रथेन्द्र के षष्ठ पर्व पर समाश्रय लेने वाली वार्त्ताली—आदि आठ देवियां हैं जो आठों दिशाओं मे उपविश्रुत हैं ।३४। ये आठ पर्वतों के निष्पात से परम घोर निर्घात के घोष वाली थीं । आठ नागों के स्फुरित भूषा से संयुत तथा न नष्ट होने वाले बल और तेज वाली थी ।३५।
प्रकृष्टदोषप्रकांडोष्महुतदानवकोटयः ।
सेवंते ललितां देव्यो दंडनाथामहर्निशम् ।।३६।
तासामाख्याश्च विख्याताः समाकर्णय कुम्भज ।
वार्ताली चैव वाराही सा वाराहमुखी परा ।।३७।
अंधिनी रोधिनी चैव जृंभिणी चैव मोहिनी ।
स्तंभिनीति रिपुक्षोभस्तंभनोच्चाटनक्षमाः ।।३८।
तासां च पर्वणो वामभागे सततसंस्थितिः ।
दंडनाथोपवाह्यस्तु कासरो धूसराकृतिः ।।३९।
अर्धक्रोशायतः शृंगद्वितये क्रोशविग्रहः ।
खड्गवन्निष्ठुरैर्लोमजातैः संवृतविग्रहः ।।४०।
कालदंडवदुच्चंडबालकांगभयंकरः ।