भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 670, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 670

२६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अथ तस्य रथेंद्रस्य किरिचक्राश्रितस्य च ॥२७ पार्श्वद्वयकृतावासमायुधद्वंद्वमुत्तमम् । हलं च मुसलं चैव देवतारूपमास्थितम् ॥२८

इन सब समुद्रों को आधे ही क्षण में पान करने में इनका बहुत अधिक साहस निष्पन्न था। इनके दाँत शकट के समान आकार वाले थे और इनके मुख बहुत ही विकराल थे एवं परम भीषण लोचन थे। २२। ये अपनी स्वामिनी से द्रोह करने वाले और अपने समय के द्रोहियों के तथा वैदिक द्रोहण से द्रोही वीर वैरियों के एवं यज्ञों से द्रोह करने वाले परम दुष्ट दैत्यों के भक्षण करने में ये सब समान थीं। ये नित्य ही पोत्रिणी दण्ड नायिका का सेवन किया करती हैं । २३-२४। उसी पर्व के पार्श्व में द्वितीय दिव्य मन्दिर में क्रोधिनी और स्तम्भिनी प्रसिद्ध हैं और ये दो देवता वर्त्तमान रहती हैं ।२५। ये दोनों चमरों को ढुलाया करती हैं जिससे इनकी दो भुजाएं हिलती हैं जिनमें उनके कङ्कण भी हिलते रहा करते हैं। ये देवों के शत्रुओं की सेना के रक्त और हाला के पान करने में मदोद्धत हैं ।२६। इनके नेत्र दिव्य ही विधूर्णित हैं और इनके मुखों पर प्रहास रहा करता है। इसके अनन्तर रथेन्द्र के किरि के दोनों पार्श्वों में आवास करने वाला उत्तम आयुधों का द्वन्द्व-हल-मुसल देवता के रूप में समास्थित है ।२७-२८।

स्वकीयमुकुटस्थाने स्वकीयायुधविग्रहम् । आबिभ्राणं जगद्द्वेषिघसमरं विबुधैः स्मृतम् ॥२९ एतदायुधयुग्मेन ललिता दंडनायिका । खण्डयिष्यति संग्रामं विषंगं नाम दानहम् ॥३० तस्यैव पर्वणो दण्डनाथाया अग्रसीमनि । वर्त्तमानो महाभीमः सिंहो नादैर्ध्वनन्नभः ॥३१ दंष्ट्राकटकटात्कारवधिरीकृतदिङ्मुखः । चंडोच्चंड इति ख्यातश्चतुर्हस्तस्त्रिलोचनः ॥३२ शूलखड्गप्रेतपाशान्दधानो दीप्तविग्रहः । सदा संसेवते देवीं पश्यन्नेव हि पोत्रिणीम् ॥३३ किरिचक्ररथेन्द्रस्य षष्ठ पर्व समाश्रिताः ।