भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २५६

भक्षणे दुष्टदैत्यानामामूलं च निकृन्तने ।
पंडिताः खंडिताशेषविपदो भक्तिशालिषु ॥२०
धातुनाथा इति प्रोक्ताः सर्वधातुषु संस्थिताः ।
सप्तापि वारिधीनूनिर्मालासंचुम्बितांबरान् ॥२१

उसी पर्व के नीचे त्वरिता स्थान के समाश्रित हैं। यक्षिणी-शंखनी-लाकिन-हाकिनी ।१५। शाकिनी-डाकिनी—उनकी एकता के स्वरूप वाली हाकिनी सातवीं हैं—ये प्रचंड दोर्दण्डों के विक्रम वाली हैं।१६। ये समस्त भूतों को पान सा करती हैं तथा सम्पूर्ण मेदिनी का पान सा करती हुई हैं। त्वचा-रक्त-माँस-मेद और विरोधियों की अस्थियों को तथा मज्जा और शुक्र को विकट मुखों वाली पान सा करती हुई थीं। उनके अत्यधिक कठोर सिंहनाद थे जिनसे वे दशों दिशाओं को पूरित कर रही थीं ।१७-१८। अणिमा आदि आठों सिद्धियों को प्रदान करने वाली वे धातुनाथा कही हैं। दुष्ट दैत्यों के मोहन-मारण-स्तम्भन-ताड़न भक्षण और आमूल निकृन्तन में परम पंडित और भक्ति शालियों के विषय में समस्त विपदाओं का खंडन करने वाली थीं ।१९-२०। समस्त धातुओं में संस्थित वे धातुनाथा बतायी गयी हैं। अपनी तरङ्गों की मालाओं से अम्बर को चुम्बित करने वाले सातों सागरों में संस्थित थीं ।२१।

क्षणार्धेनैव निष्पातुं निष्पन्नबहुसाहसाः ।
शकटाकारदन्ताश्च भयंकरविलोचनाः ॥२२
स्वस्वामिनीद्रोहकृतां स्वकीयसमयद्रुहाम् ।
वैदिकद्रोहणादेव द्रोहिणां वीरवैरिणाम् ॥२३
यज्ञद्रोहकृतां दुष्टदैत्यानां भक्षणे समाः ।
नित्यमेव च सेवन्ते पोत्रिणीं दण्डनायिकाम् ॥२४
तस्यैव पर्वणः पार्श्वे द्वितीये दिव्यमन्दिरे ।
क्रोधिनी स्तंभिनी ख्याते वर्तेते देवते उभे ॥२५
चामरे वीजयन्त्यौ च लोलकंकणदोलंते ।
देवद्विषां चमूरक्तहालापानमहोद्धते ॥२६
सदा विघूर्णमानाक्ष्यौ सदा प्रहसितानने ।