भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

षडेव देव्यः षट्चक्रज्वलज्जवालाकलेवराः ॥१३ महता विक्रमौघेण पिबंत्य इव दानवान् । आज्ञया दंडनाथायास्तं प्रदेशमुपासते ॥१४

इनके नेत्र अत्यधिक तीक्ष्ण एवं कराल हैं। जिनकी ज्वालाओं से दैत्यों के सैनिकों को दग्धसी कर रही है और निःशंक होकर सूकरानना की सेना किया करती है ।८। ये किरिचक्र रथेन्द्र के तीसरे पर्व में समाश्रय लेने वाली हैं । अन्धिनी आदि पाँच देवियाँ देवी के यन्त्र में अपना आस्पद करने वाली हैं ।६। इनका इतना कठोर अट्टहास होता है जिससे ये तीनों भुवनों का भेदन किया करती हैं । अङ्गना के वेष का आश्रय ग्रहण कर कल्पाग्नि की ज्वालाओं के ही तुल्य होती हैं ।१०। भण्डासुर की समस्त सेनाओं की रुधिर के प्लावन को चाटने की इच्छा करती हुई लेलिहान ज्वालाओं की जिह्वाओं से उज्ज्वल ।११। ये सभी अतीव उद्दण्ड विक्रम वाली दण्डनाथा का निरन्तर सेवन किया करती हैं । किरिचक रथेन्द्र के चौथे पर्व में इनका संश्रय होता है ।१२। ब्राह्मी आदि पाँचवीं से रहित तथा आठवीं से रहित ये छै ही देवियां षट्चक्र की जलती हुई ज्वालाओं के कलेवर वाली हैं ।१३। महान विक्रम के समुदाय के द्वारा दानवों का पान सा करने वाली हैं । दण्डनाथा की ही आज्ञा से ये उसी प्रदेश की उपासना किया करती हैं ।१४।

तस्यैव पर्वणोऽधस्तात्त्वरिताः स्थानमाश्रिताः । यक्षिणी शंखिनी चैव लाकिनी हाकिनी तथा ॥१५ शाकिनी डाकिनी चैव तासामैक्यस्वरूपिणी । हाकिनी सप्तमीत्येताश्चंडदोर्दंडविक्रमाः ॥१६ पिबंत्य इव भूतानि पिबंत्य इव मेदिनीम् । त्वचं रक्तं तथा मांसं मेदोऽस्थि च विरोधिनाम् ॥१७ मज्जानमथ शुक्लं च पिबन्त्यो विकटाननाः । निष्ठुरैः सिंहनादैश्च पूरयंत्यो दिशो दश ॥१८ धातुनाथा इति प्रोक्ता अणिमाद्यष्टसिद्धिदाः । मोहने मारणे चैव स्तंभने ताडने तथा ॥१६