संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिरिचक्ररथ देवता प्रकाशन ] [ २५७
मुसलं च हलं हालापात्रं मणिगणार्पितम् । ज्वलन्माणिक्यवलयैर्बिभ्राणाः पाणिपल्लवैः ॥७
श्री हयग्रीव जी ने कहा-किरि चक्र रथेन्द्र के पाँच वर्षों में समाश्रित जो देवता हैं उनके नामों का भी श्रवण कीजिए। हे प्राज्ञ ! जिनके श्रवण करने वालों का जय ही हुआ करता है ।१। प्रथम पर्व बिन्दु नामक है । जिसमें दंड नायिका सम्प्राप्त है। वहाँ पर वह जगत के उदंडों के समुदाय की विनाशिका है ।२। यह नाना प्रकार की ज्वालाओं से जय श्री को नर्तन कराया करती है ।३। उद्दण्ड पौत्र के निर्घात से जिसने उद्धत दानवों को निर्भिन्न कर दिया है। दंष्ट्रा से गल मृगाङ्कांगु के विभावन करने वाली विभावरी है । वर्षा कालीन मेघों के समूह के समान नील वपु वाली लता है । वह किरि चक्र रथेन्द्र की वह सदा अलंकार के समान है। पोत्रिणी पुत्रिता के अशेष विश्व के आवत्तं की कदम्बिका है ।४-५। उसी रथनाभ के द्वितीय पर्व में संश्रय लेने वाली है । दम्भिनी-मोहिनी और स्तम्भिनी-ये तीन ही हैं । विकसित दाड़िमी के समान और सभी दानवों के मदंन करने वाली हैं ।६। ये अपने कर पल्लवों द्वारा जिनमें देदीप्यमान मणियों के वलय है-मुसल-हल और हाला पात्र मणिगणों से समर्पित धारण करने वालों हैं ।७।
अतितीक्ष्णकरालाक्ष्यो ज्वालाभिर्दैत्यसैनिकान् । दहंत्य इव निःशंकं सेवन्ते सूकराननाम् ॥८ किरिचक्ररथेन्द्रस्य तृतीयं पर्व संश्रिताः । अंधिन्याद्याः पञ्च देव्यो देवीयंत्रकृतास्पदाः ॥९ कठोरेणाट्टहासेन भिदंत्यो भुवनत्रयम् । ज्वाला इव तु कल्पाग्नेरंगनावेषमाश्रिताः ॥१० भंडासुरस्य सर्वेषां सैन्यानां रुधिरप्लुतिम् । लिलिक्षमाणा जिह्वाभिर्लेलिहानाभिरुज्ज्वलाः ॥११ सेवंते सततं दंडनाथामुद्दण्डविक्रमाम् । किरिचक्ररथेन्द्रस्य चतुर्थं पर्व संश्रिताः ॥१२ ब्रह्माद्याः पञ्चमीवर्ज्या अष्टमीवर्जिता अपि ।