संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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इमानि सर्वदेवीनां नामान्याकर्णयंति ये ।
सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते स्युर्विजयिनो नराः ॥६५
जो भी कुछ करने का अथवा नहीं करने का है उस सभी को करने में प्रगल्भ होती हैं । कारण से सभी दिक्पाल श्री देवीकी ही जय की कांक्षा वाले रहा करते हैं । प्रधानभूता उसकी ही सेवा का विस्तार किया करते हैं ।६२। यह श्री ललिता देवी के चक्रराज रथोत्तम में पर्वों में संस्थित देवियों के नाम वर्णित कर दिए गए हैं।६३। भंडासुर के संहार में उसके परम दिव्य आयुधों का भी वर्णन कर दिया है। गेय चक्र और पवभी देवी के वर्णित किए गए हैं। इन समस्त देवियों के नामों का जो भी कोई श्रवण किया करते हैं वे नर समस्त पापों से छुटकारा पाकर विजयी हो जाते हैं ।६४-६५
किरिचक्ररथ देवता प्रकाशन
हयग्रीव उवाच-
किरिचक्र रथेन्द्रस्य पंचपर्वसमाश्रिताः ।
देवताश्च शृणु प्राज्ञ नाम यच्छृण्वतां जयः ॥१
प्रथमं पर्वविद्धाख्यं संप्राप्ता दंडनायिका ।
सा तत्र जगदुद्दण्डकण्टकव्रातघस्मरी ॥२
नानाविधाभिर्ज्वालाभिर्नर्तयंती जयश्रियम् ॥३
उद्दण्डपोत्रि निर्घांतनिर्भिन्नोद्धतदानवाः ।
दंष्ट्राबालमृगांकांशुविभावनविभावरी ॥४
प्रावृषेण्यपयोवाहव्यूहनीलवपुर्लता ।
किरिचक्ररथेंद्रस्य सालंकारायते सदा ।
पोत्रिणी पुत्रिताशेषविश्वावर्तकदंबिका ॥५
तस्यैव रथनाभस्य द्वितीयं पर्व संश्रिताः ।
जृंभिनी मोहिनी चैव स्तंभिनी तिस्र एव हि ।
उत्फुल्लदाडिमीप्रख्यं सर्वदानवमर्दनाः ॥६