संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचक्ररथ वर्णंस्व देवता नाम प्रकाशन ] [ २५५
राज्ञो विज्ञापना चेति प्रधानद्वारतः कृता ।।८८
यथा खलु फलप्राप्तिः सेवाकानां हि जायते ।
अन्यथा कथमेतेषां सामर्थ्यं ज्वलितौजसः ।।८६
अपधृष्यप्रभावायाः श्रीदेव्या उपसर्पणे ।
सा हि संगीतविद्येति श्रीदेव्याः अतिवल्लभा ।।६०
नातिलंघति च क्वापि तदुक्तं कार्यसिद्धिषु ।
श्रीदेव्याः शक्तिसाम्राज्ये सर्वकर्माणि मन्त्रिणी ।।६१
य गदा-त्रिशूल-दभास्त्र और वज्र को धारण किए हैं । ये सब उस मन्त्रिनाथा का भक्तिभाव से संयुत होते हुए नित्य ही सेवन किया करते हैं ।८५। दुर्दुं रूढ़—विश्व के कंटक भंडासुरों का निहनन करने के वास्ते मन्त्रि नाथा के आश्रय के द्वारा ललिता आज्ञापन के उत्सुक रहा करते हैं ।८६। गीति चक्ररथ के उपान्त में दिक्पालों ने इनको संश्रय दिया था । समस्त देवों की मन्त्रिणी द्वार से की गयी थी ।८७। विज्ञापना यह महादेवी के कार्य की सिद्धि किया करती है । राज्ञी और विज्ञापना ये दो प्रधान द्वार पर की गयी हैं ।८८। जैसी भी फल की प्राप्ति होती है । अन्यथा इनकी क्या सामर्थ्य है । जो ज्वलित ओज वाली और अप्रधृष्य प्रभाव वाली श्री देवी के समीप में सर्पण किया जा सके । वह निश्चय ही संगीत विद्या है जो श्री देवी की अतिवल्लभा है ।८६-६०। कार्यों की सिद्धियों में कहीं पर भी उसके कथित का अतिलंघन नहीं करती हैं । श्रीदेवी के शक्ति के साम्राज्य में वह मन्त्रिणी ही सब कर्मों को किया करती है ।६१।
अकर्त्तु मन्यथा कत्तुं कत्तुं चैव प्रगल्भते ।
तस्मात्सर्वेऽपि दिक्पालाः श्रीदेव्या जय कांक्षिणः ।
तस्याः प्रधानभूतायाः सेवामेव वितन्वते ।।६२
इति श्रीललितादेव्याश्चक्रराजरथोत्तमे ।
पर्वस्थितानां देवीनां नामानि कथितान्यलम् ।।६३
भंडासुरस्य संहारे तस्या दिव्यायुधान्यपि ।
प्रोक्तानि गेयचक्रस्य पर्वदेव्याश्च कीर्तिताः ।।६४