भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 655, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 655

चक्ररथ पर्वस्थ देवता नाम प्रकाशन ] [ २४५

के सदृश होता है और ये सब पीत अम्बर धारण करके परम मनोहर होती हैं ।११। इनकी चार-चार भुजाएँ होती हैं। ये दो-दो भुजाओं में चर्म (ढाल) और कृपाण धारण किये रहा करती हैं। मद से इनके लोचन चञ्चल और रक्त हुआ करते हैं। अब उनके भी नामों का श्रवण कीजिए ।१२। सर्वसंक्षोभिणी—सर्व विद्राविणी--सर्वाकर्षणकृन्मुद्रा—सर्ववशङ्करी—सर्वोन्मादन मुद्रा यष्टिसर्व महाङ्कुशा—सर्वखेचरिका मुद्रा—तथा अपरासर्व-बीजा है ।१३-१४।

सर्वयोनिश्च नवमी तथा सर्वत्रिखंडिका ।
सिद्धिब्राह्म्यादिमुद्रास्ता एताः प्रकटशक्तयः ॥१५॥
भंडासुरस्य संहारं कर्तुं रक्तरथे स्थिताः ।
या गुप्ताख्याः पूर्वमुक्तास्तासां नामानि मच्छृणु ॥१६
कामाकर्षणिका चैव बुद्ध्याकर्षणिका कला ।
अहङ्काराकर्षिणी च शब्दाकर्षणिका कला ॥१७
स्पर्शाकर्षणिका नित्या रूपाकर्षणिका कला ।
रसाकर्षणिका नित्या गन्धाकर्षणिका कला ॥१८
चित्ताकर्षणिका नित्या धैर्याकर्षणिका कला ।
स्मृत्याकर्षणिका नित्या नामाकर्षणिका कला ॥१६
बीजाकर्षणिका नित्या चात्माकर्षणिका कला ।
अमृताकर्षणी नित्या शरीराकर्षिणी कला ॥२०
एताः षोडश शीतांशुकलारूपाश्च शक्तयः ।
अष्टमं पर्वसम्प्राप्ता गुप्ता नाम्ना प्रकीर्तिताः ॥२१

और सर्वयोनि नवमी तथा सर्वत्रिखण्डिका है । सिद्धि ब्राह्मी आदि मुद्रा ये हैं—इतनी शकट शक्तियां हैं ।१५। भण्डासुर के संहार करने के लिये वह रक्त रथ में संस्थित हुई थी । जो गुप्ता नाम वाली पूर्व में कही थीं उनके भी नामों का श्रवण अब आप मुझसे कीजिए ।१६। कामकर्षणिका और बुद्ध्या—कर्षणिका कला—अहङ्कारा कर्षिणका—शब्दाकर्षणिका कला है ।१७। स्पर्शा कर्षिणका नित्या—रूपा कर्षिणका कला । रसा कर्षिणका नित्या नित्या—गन्धाकर्षणिका कला--।१८। चित्ताकर्षणिका नित्या—धैर्या-

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २) · पृष्ठ 655, कुल 893 में से · BharatKosha