भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

चार भुजाओं वाली हैं और इनका वर्ण जपा के कुसुम के तुल्य होता है ।४-५। ये चारों करों में चिन्तामणि-कपाल-त्रिशूल और सिद्धि कज्जल धारण किये रहा करती हैं । ये दया से परिपूर्ण होती हैं और योगिजनों के द्वारा सर्वदा सेवित रहा करती हैं ।६। वहाँ पर पूर्वार्ध भाग में ब्राह्मी आदि आठ शक्तियाँ हुआ करती है । उनके नाम ये हैं—ब्राह्मी—माहेश्वरी—कौमारी— वैष्णवी—वाराही—माहेन्द्री और सातवीं चामुण्डा है ।७।

महालक्ष्मीरष्टमी च द्विभुजाः शोणविग्रहाः । कपालमुत्पलं चैव बिभ्राणा रक्तवाससः ॥८ अथ वान्यप्रकारेण केचिद्ध्यानं प्रचक्षते । ब्रह्मादिसदृशाकारा ब्रह्मादिसदृशायुधाः ॥९ ब्रह्मादीनां परं चिह्नं धारयन्त्यः प्रकीर्तिताः । तासामूर्ध्वस्थानगतां मुद्रा देव्यो महत्तराः ॥१० मुद्राविरचनायुक्तैर्हस्तैः कमलकांतिभिः । दाडिमीपुष्पसङ्काशाः पीतांबरमनोहराः ॥११ चतुर्भुजा भुजद्वन्द्वधृतचर्मकृपाणकाः । मदरक्तविलोलाक्ष्यस्तासां नामानि मच्छृणु ॥१२ सर्वसंक्षोभिणी चैव सर्वविद्राविणी तथा । सर्वाकर्षणकृन्मुद्रा तथा सर्ववशङ्करी ॥१३ सर्वोन्मादनमुद्रा च यष्टिः सर्वमहाङ्कुशा । सर्वखेचरिका मुद्रा सर्वबीजा तथापरा ॥१४

महालक्ष्मी आठवीं शक्ति है । इन सबकी दो-दो भुजाएं होती हैं और इनके कलेवर का वर्ण शोण होता है । ये कपाल और उत्पल करों में लिये रहा करती हैं । इनके वस्त्र रक्त वर्ण के होते हैं ।८। अथवा अन्य प्रकार से कुछ लोग इनका ध्यान कहा करते हैं । ये सब ब्रह्मा आदि के सदृश ही आयुधों वाली होती हैं ।९। ये सब ब्रह्मादिक के ही परम चिह्नों को धारण करती हुई कीर्तित की गयी हैं । उनके ऊपर स्थान में रहने वाली मुद्रा देवियां इनसे भी अधिक महान् हैं ।१०। कमल के समान कान्ति वाले मुद्रा विरचना से युक्त हाथों से युक्त होती हैं। इनका वर्ण दाडिमी के पुष्पों